राजनीति

पंजाब में भी आत्मघात पर आमादा कांग्रेस

कांग्रेसी भी कांग्रेस को हराते हैं’, यह कहावत जिन्हें मजाक लगती हो, उन्हें पंजाब का हाल देख लेना चाहिए। सीमावर्ती पंजाब उन चंद राज्यों में है, जहां कांग्रेस सत्ता में नहीं है, पर सत्ता की दावेदार अवश्य है। 2022 में अपनी गलतियों से भी पंजाब की सत्ता गंवाने के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने वहां अच्छा प्रदर्शन किया। 

विधानसभा चुनाव में 117 में से 92 सीटें जीत कर इतिहास रचने वाली आम आदमी पार्टी (आप) कांग्रेस को टक्कर भर दे पाई। इसलिए अगले साल फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता की दावेदार तो है। 18 सीटों के साथ ही सही, कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। 1966 में पंजाब विभाजन के बाद के ही आंकड़े देखें तो उसके बाद हुए 13 विधानसभा चुनावों में से उसने 5 जीते हैं। ऑप्रेशन ब्ल्यू स्टार और सिख विरोधी दंगों के बावजूद पंजाब में कांग्रेस प्रासंगिकता बनाए रखने में सफल रही है। एक दल के रूप में पंजाब को सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री कांग्रेस ने ही दिए हैं। कांग्रेस को शिरोमणि अकाली दल ही चुनौती देता रहा है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत पंथक राजनीति मानी जाती है।

लंबी छलांग लगाते हुए ‘आप’ 20 से 92 सीटों पर पहुंच गई, जबकि कांग्रेस 77 से फिसल कर 18 पर आ गई। मात्र 3 सीटों के साथ अकाली दल पहली बार पंजाब की राजनीति में अप्रासंगिक होता नजर आया। अकाली दल से गठबंधन टूटने के चलते अकेले लड़ी भाजपा भी 2 सीटों पर सिमट गई। अकाली दल और भाजपा का यह हश्र इसलिए भी चौंकाने वाला रहा, क्योंकि 2007 और 2012 में लगातार सत्ता का जनादेश दे कर पंजाब के मतदाताओं ने हर चुनाव में सरकार बदल देने की अपनी परंपरा ही बदल दी थी। दरअसल सत्ता का नशा उतारने के लिए मतदाता इसी तरह जोर का झटका धीरे से देते हैं। 

बेअदबी के मामलों से ले कर बेलगाम नशा तस्करी और बिक्री तक के तमाम आरोपों के चक्रव्यूह से अकाली दल निकल ही नहीं पाया। 2017 के चुनावों में भी 77 सीटों के साथ कैप्टन अमरेंद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बन गई। ऐसा दावा नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस सरकार जनता की आकांक्षाओं पर खरी उतरी, पर सत्ता से विदाई की भूमिका खुद कांग्रेस आलाकमान ने लिखी। भाजपा से दरकिनार किए गए नवजोत सिंह सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होते ही आलाकमान उन पर इस कदर मेहरबान हुआ कि पहले तो सुनील जाखड़ को हटा कर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना दिया और फिर उनकी जिद के आगे झुकते हुए अपने सबसे वरिष्ठ नेता अमरेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को मजबूर कर दिया।

सिद्धू ने बिसात तो खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए बिछाई थी लेकिन लॉटरी चरणजीत सिंह चन्नी की खुल गई। अमरेंद्र-जाखड़ की दिग्गज जोड़ी की कांग्रेस से बेआबरू विदाई के बावजूद सिद्धू खफा ही रहे। टिकट वितरण से ले कर चुनाव प्रचार तक साफ दिखी सिद्धू और चन्नी के बीच तनातनी ने रही-सही कसर पूरी कर दी। कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई और ‘ट्रम्प कार्ड’ बताए जा रहे दलित मुख्यमंत्री दोनों सीटों से चुनाव हार गए। चुनावी हार-जीत तो होती रहती है लेकिन कांग्रेस की समस्या है कि वह सबक नहीं सीखती। 

मुख्यमंत्री पद के महत्वाकांक्षी सिद्धू ने चुनाव के बाद ही कांग्रेस से दूरियां बढ़ा ली थीं लेकिन आलाकमान ने राज्य में नया नेतृत्व और मजबूत संगठन तैयार करने की दिशा में कुछ नहीं किया। ‘आप’ के अलावा जमीन पर कांग्रेस ही दूसरा दल रही, इसलिए लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन अच्छा रहना ही था, पर आलाकमान उसी पर आत्ममुग्ध हो गया। ‘आप’, अकाली दल और भाजपा की सक्रियता बढ़ती देख कांग्रेस ने भी संगठनात्मक बदलाव का संकेत तो दिया, पर दरबारी संस्कृति के वशीभूत आलाकमान साहस नहीं जुटा पाया। अमरिंदर सिंह राजा वडिंग़ को प्रदेश अध्यक्ष बरकरार रखते हुए चन्नी को प्रचार समिति प्रमुख और सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी प्रमुख जैसे प्रयोगों द्वारा अन्य दिग्गजों को साधने की कोशिश की गई तो अंतर्कलह सतह पर आ गई।

प्रदेश अध्यक्ष या फिर मुख्यमंत्री चेहरा बनने पर आमादा चन्नी ने बगावती तेवर दिखाते हुए समर्थकों की बैठक बुला ली, तो रंधावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिल आए। सांसद मनीष तिवारी ने भी अपना दर्द सोशल मीडिया पर जाहिर किया। राजनीतिक विरोधी इसे चुनाव पूर्व ही टूट की संभावना के रूप में देख रहे हैं, पर कांग्रेस को उम्मीद है कि राहुल गांधी के विदेश यात्रा से लौटने पर सब कुछ ठीक हो जाएगा। क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा लेकिन पंजाब के कांग्रेसी आत्मघात पर आमादा नजर आ रहे हैं। ज्यादा अतीत में न भी झांकें तो 2 तरह के उदाहरण हैं-राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे राज्यों में नेताओं का सत्ता संघर्ष ही कांग्रेस को ले डूबा, जबकि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में एकजुटता से उन्होंने भाजपा से सत्ता छीन ली। जाहिर है, मुख्यमंत्री तो एक ही नेता बनेगा। हां, उप मुख्यमंत्री बना कर एक-दो और नेताओं का अहं तुष्ट किया जा सकता है लेकिन उससे पहले चुनाव जीत कर बहुमत हासिल करना होगा और उसके लिए पहली अनिवार्यता है कि कांग्रेस एकजुट हो कर चुनाव लड़े और अच्छे उम्मीदवार उतारे। 

माना कि अनेक कारणों से ‘आप’ का ग्राफ गिर रहा है लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार उसने बहुमत के आंकड़े से भी 33 सीटें ज्यादा जीती थीं। दूसरी ओर शिरोमणि अकाली दल और भाजपा भी लगातार अपनी ताकत बढ़ाने में लगे हैं। हर चुनाव के मुद्दे और उनके आधार पर मतदाताओं का फैसला अलग रहता है लेकिन हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में ‘आप’ 1977 में से 945 सीटें ही जीत पाई। पिछले 11 सालों में ऐसा पहली बार हुआ कि सत्तारूढ़ दल 1000 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाया। दूसरी ओर कांग्रेस 380, अकाली दल 191 और भाजपा 169 सीटें जीतने में सफल रहीं। 

जाहिर है, 2021 में मात्र 59 सीटें जीतने वाली भाजपा अपने इस प्रदर्शन से बेहद उत्साहित है। ‘आप’ के जो 7 राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हुए हैं, उनमें से 6 पंजाब से ही हैं। केवल सिंह ढिल्लों को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाने वाली भाजपा अन्य दलों से असरदार नेताओं को लाने में भी जुटी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की पंजाब में लगातार सक्रियता भी अकारण नहीं है। पंजाब का राजनीतिक इतिहास और सामाजिक समीकरण भाजपा की चुनावी संभावनाओं को ज्यादा बल नहीं देता, पर अकाली दल से पुन: गठबंधन की संभावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। अलग-अलग चुनाव लड़ कर दोनों को अपनी असली ताकत पता चल चुकी है। कहना नहीं होगा कि अकाली-भाजपा गठबंधन से चुनावी परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा।-राज कुमार सिंह

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button