राजनीति

साहित्य और राष्ट्रबोध शब्दों से निर्मित होती है राष्ट्र की आत्मा

प्रो. दयानंद तिवारी

-‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’
अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रबोध का शाश्वत उद्घोष है।
साहित्य किसी भी राष्ट्र की आत्मा का सबसे सशक्त दर्पण होता है। इतिहास तलवारों से लिखा जा सकता है, शासन कानूनों से चलाया जा सकता है, परंतु किसी राष्ट्र की चेतना केवल साहित्य ही निर्मित करता है। जब समाज अपने मूल्यों, संस्कृति, भाषा और परंपराओं से दूर होने लगता है, तब साहित्य उसे उसकी जड़ों का स्मरण कराता है। यही साहित्य का सबसे बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है।
राष्ट्रबोध का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा या राजनीतिक विचारधारा नहीं है। राष्ट्रबोध उस भाव का नाम है जिसमें मातृभूमि के प्रति सम्मान, संविधान के प्रति निष्ठा, संस्कृति के प्रति गर्व, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और मानवता के प्रति करुणा समाहित हो। साहित्य इन सभी भावों और मूल्यों को शब्द देता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन्हें जीवित रखता है।
भारतीय साहित्य की परंपरा इसी राष्ट्रचेतना से अनुप्राणित रही है। वैदिक ऋचाओं से लेकर रामायण, महाभारत, भक्ति साहित्य, आधुनिक हिंदी कविता और स्वतंत्रता आंदोलन तक साहित्य ने समाज को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि जीवन का मार्ग भी दिखाया। तुलसीदास ने मर्यादा का संदेश दिया, कबीर ने सामाजिक समरसता का, सूरदास ने भक्ति का, भारतेंदु हरिश्चंद्र ने राष्ट्रीय जागरण का और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने स्वाभिमान का। इन सबकी लेखनी ने भारत की आत्मा को शब्द दिए।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियां आज भी हमें झकझोरती हैं।
‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।’
यह केवल कविता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का घोष है।
आज का समय अभूतपूर्व परिवर्तन का समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल माध्यम, वैश्वीकरण और त्वरित संचार ने दुनिया को निकट तो ला दिया है, किंतु मनुष्य को अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाए रखने की चुनौती भी दी है। ऐसे समय में साहित्य की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि साहित्य अपने समाज, अपनी भाषा, अपने लोकजीवन और अपने सांस्कृतिक मूल्यों से विमुख हो जाएगा, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट जाएंगी। राष्ट्रबोध का अर्थ किसी अन्य संस्कृति का विरोध नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति का सम्मान है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देने वाला भारत विश्व को सदैव समरसता, सह-अस्तित्व और मानवता का मार्ग दिखाता रहा है। इसलिए भारतीय साहित्य का राष्ट्रबोध संकीर्ण नहीं, बल्कि उदार, समावेशी और विश्वकल्याण की भावना से प्रेरित है।
महाकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है कि – ‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध;
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।’
यह संदेश आज के साहित्यकारों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। साहित्य केवल घटनाओं का दर्शक नहीं हो सकता; उसे समाज की चेतना जगानी होगी, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी और सत्य, न्याय तथा नैतिकता के पक्ष में खड़ा होना होगा।
आज आवश्यकता ऐसे साहित्य की है जो युवाओं में पढ़ने की संस्कृति विकसित करे, उन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़े, विज्ञान और आधुनिकता के साथ संस्कारों का संतुलन स्थापित करे तथा राष्ट्रहित को मानवहित से जोड़कर देखने की दृष्टि प्रदान करे। साहित्य तभी सार्थक होगा जब वह व्यक्ति को बेहतर नागरिक, संवेदनशील मनुष्य और उत्तरदायी समाज-निर्माता बनाए।
अंतत: यह स्मरण रखना होगा कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा का नाम नहीं है। राष्ट्र अपने लोगों की स्मृतियों, संस्कारों, भाषा, संस्कृति और साहित्य से निर्मित होता है। जब तक साहित्य जीवित रहेगा, राष्ट्र की आत्मा भी जीवित रहेगी। इसलिए साहित्यकार का दायित्व केवल लिखना नहीं, बल्कि युग का नैतिक मार्गदर्शक बनना है।
‘धर्मो रक्षति रक्षित:।’
जब हम अपने साहित्य, संस्कृति और राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा करते हैं, तब वही मूल्य हमारी पहचान, हमारी एकता और हमारे भविष्य की रक्षा करते हैं। यही साहित्य का राष्ट्रबोध है और यही उसकी सबसे बड़ी साधना।
प्रोफेसर डॉ दयानंद तिवारी

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