संपादकीय

विकास दर के विरोधाभास

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का आकलन है कि देश में ऐसी ‘आर्थिक सुनामी’ आने वाली है, जैसी किसी ने पहले देखी नहीं होगी। जनता को दबाने के लिए मोदी सरकार ‘आपातकाल’ भी लगा सकती है। राहुल गांधी ने फिर भविष्यवाणी की है कि मोदी सरकार एक साल में गिर जाएगी। पलटवार में प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर तीखे प्रहार किए और कहा कि देश में कुछ निराशावादी लोग हैं, जो आत्मनिर्भर भारत के अभियान का मजाक उड़ाते हैं। प्रधानमंत्री का मानना है कि देश ऐसी अराजकता, निराशा, अनिश्चितता को पसंद नहीं करता, लिहाजा कांग्रेस को बार-बार खारिज कर रहा है। इस ‘जुबानी जंग’ के दौरान भारत सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने 2025-26 की आखिरी तिमाही (जनवरी-31 मार्च) के आंकड़े जारी कर सभी को चौंका दिया। चौथी तिमाही में आर्थिक विकास दर 7.8 फीसदी रही और कुल वित्त-वर्ष की विकास दर 7.7 फीसदी रही। यह विश्व में सर्वाधिक है, हालांकि प्रति व्यक्ति आय में भारत बहुत नीचे है। बहरहाल इस तिमाही के दौरान ईरान युद्ध का एक महीना भी झेलना पड़ा, क्योंकि युद्ध 28 फरवरी को शुरू हो गया था। अर्थव्यवस्था और विकास दर पर भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा का आकलन महत्त्वपूर्ण और नाजुक है कि ईरान युद्ध के कारण सप्लाई चेन बाधित हुई है और भारतीय बाजार में भी अस्थिरता का माहौल है। महंगाई बढ़ेगी और जीडीपी की विकास दर घटेगी। हमारी अर्थव्यवस्था भी वैश्विक उथल-पुथल के दौर में है, लिहाजा रिजर्व बैंक का नया अनुमान है कि 2026-27 (जारी वित्त वर्ष) में विकास दर 6.6 फीसदी रह सकती है, जबकि पहले अनुमान 6.9 फीसदी का था। महंगाई दर 5.1 फीसदी से अधिक हो सकती है, जबकि पहले का अनुमान 4.6 फीसदी का था। रिजर्व बैंक के गवर्नर का यह भी मानना है कि विकास दर के अनुमान पर निगेटिव जोखिम बरकरार रहेगा। विदेशी मुद्रा 4.4 लाख करोड़ रुपए घटी है, फिर भी हम सुखद स्थिति में हैं, लेकिन जीडीपी में जिस मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का योगदान 18 फीसदी तक होता था, वह घट कर करीब 13 फीसदी हो गया है, जबकि मोदी सरकार ने 25 फीसदी योगदान का लक्ष्य तय किया था। कृषि पर आज भी दो-तिहाई परिवार आश्रित हैं, लेकिन पूरे वित्त वर्ष में कृषि की विकास दर 3 फीसदी रही है, जबकि बीते वर्ष के दौरान यह विकास दर 5 फीसदी से भी अधिक थी।

अलबत्ता चौथी तिमाही के दौरान कृषि की विकास दर 3.6 फीसदी रही है। जीडीपी में जो बढ़ोतरी दिख रही है, वह सेवा क्षेत्र, व्यापार, होटल, परिवहन, पर्यटन और बैंकिंग आदि के कारण है। ऊर्जा की महंगाई दर 24.71 फीसदी हो गई है, जिसकी कमी के कारण देश का हरेक तबका, आम आदमी, औसत घर किलकिला रहा है। एक बार फिर घरेलू एलपीजी का सिलेंडर (14.2 किग्रा) 29 रुपए महंगा कर दिया गया है। बीती 7 मार्च को भी 60 रुपए प्रति सिलेंडर दाम बढ़ाए गए थे। देश में रोजगार गायब है, महंगाई लगातार बढ़ रही है, औसत आमदनी यथावत है, आम उपभोक्ता की क्रय-शक्ति बढ़ नहीं पा रही है, तो देश की आर्थिक विकास दर मजबूत कैसे हो सकती है? अर्थव्यवस्था के जो बुनियादी मुख्य कारक हैं, यदि उनमें बढ़ोतरी नहीं है, तो जीडीपी की विकास दर इतनी सशक्त कैसे संभव है? रिजर्व बैंक समेत लगभग सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के ताजा आकलन हैं कि भारतीय जीडीपी की विकास दर 6 फीसदी से कुछ अधिक रहेगी, लेकिन सरकार 7.7 फीसदी के आंकड़े पर ‘बल्ले-बल्ले आर्थिकी’ मान रही है। अर्थव्यवस्था और विकास दर को लेकर ऐसे विरोधाभास गंभीर हैं। यह भी तथ्य गौरतलब और चिंतित करने वाला है कि बीते सालों में 16 लाख से अधिक भारतीय अपनी नागरिकता छोड़ कर विदेशों में क्यों बस गए? जाहिर है कि वे सभी उच्चतम आय-वर्ग के होंगे! इस तरह भारत को व्यापार और विदेशी पूंजी का नुकसान हो रहा है। करीब 2.6 लाख करोड़ रुपए का निवेश हमारे बाजार से अलग होकर चला गया है, जाहिर है कि अब उन निवेशकों को हमारी अर्थव्यवस्था में ज्यादा संभावनाएं नहीं दिख रही हैं! बहरहाल 2025-26 के दौरान भारत की वास्तविक जीडीपी 323.12 लाख करोड़ रुपए की रही, जिसमें भी कमी आई है और 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य और भी दूर चला गया है। भारत को आर्थिक विकास की दृष्टि से अभी कई कुछ करना बाकी है। जब प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी, तभी हम कह सकते हैं कि भारत की आर्थिकी मजबूत चल रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की दृष्टि से अभी भारत को मजबूत नहीं माना जा सकता। महंगाई पर भी सरकारों को नकेल देनी होगी।

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