लेख

आज ‘जेन-जी’ भगवान, कल कौन?

हाल ही में जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से प्रदर्शन किया गया, तब भारी बवाल हुआ था। युवकों और युवतियों ने जिस तरह से गाली-गलौच की, वह बेहद शर्मनाक थी। लेकिन गाली देने वालों के भी समर्थक निकल आए। कहने लगे कि आखिर बच्चे वही तो सीखते हैं, जो उनके घर वाले करते हैं। कि गालियां स्त्रियों की ताकत को बता रही हैं। दिलचस्प यह है कि ऐसे ही बहुत से लोग अब तक गालियों को पितृसत्ता का वाहक बताते रहे हैं। फिर यदि चूंकि घर में गाली दी जाती थी, तो बच्चों का भी ऐसा करना जायज है, यह कौन-सा तर्क हुआ? एक ने गलत किया, तो दूसरा भी करे?

यही नहीं, जो लोग गाली देने का विरोध कर रहे थे, उनके बारे में बताया जाने लगा कि ये सब-के-सब ठरकी बुड्ढे हैं। खुद तो खूब अपशब्द बोलते हैं, बच्चे ऐसा करने लगें, तो उन्हें टोकते हैं। हाय-हाय करते हैं। कि ये तो ‘बेबी ब्लूमर्स’ हैं। यानी 1946 से 1964 के बीच पैदा हुए हैं। इन अंकल-आंटियों को बदलती दुनिया के बारे में क्या मालूम। यानी जो भी बूढ़े हैं, उम्रदराज हैं, अनुभवी हैं, उन्हें इस बारे में बोलने का अधिकार नहीं है। इस तरह लोग गाली विरोधियों को उम्र की लाठी से पीटने लगे, जैसे कि उम्र सिर्फ इन्हीं के पास आई है। इन्हें ही थकाया है। बाकी लोगों ने उम्र को पकड़ रखा है, वे कभी बूढ़े नहीं होंगे। जिसे आज ‘जेन-काी’ कहा जा रहा है, 10 साल बाद वे कहां होंगे? आज ही जेन-अल्फा, बीटा उनका दरवाजा खटखटा रहे हैं। 

जिन्हें ‘बेबी ब्लूमर्स’ कहा गया, जेन-काी वाले इन्हीं के बाल-बच्चे, नाती-पोते हैं, परिवार में साथ रहते होंगे। तो क्या युवा लोगों को परिवार के बुजुर्ग सदस्यों के बोलने, समझाने, किसी आपदा में सही राह निकालने के अवसर को छीन लेना चाहिए? क्योंकि वे उम्रदराज हैं, इसलिए उनके मामूली अधिकार भी नहीं? क्यों भाई? जिस लोकतंत्र को गा-बजा रहे हो, संविधान की दुहाई सोते-जागते दे रहे हो, वहां कहां लिखा है कि किस उम्र के आदमी को बोलने दिया जाए? और किसके मुंह पर ताला जड़ दिया जाए? 

फिर जेन-काी के युवक-युवतियों को छात्र बताया जा रहा है, वे कहीं पढ़  रहे होंगे। कोई कोर्स कर रहे होंगे। अच्छे कपड़े, स्मार्ट फोन, लैपटॉप, खाना-पीना, रहन-सहन, यात्रा का और जेब खर्च कहां से आता होगा। जाहिर है कि उन्हीं घर वालों की जेब से, जिनके बोलने पर भी आपत्ति इसलिए  है कि वे बेबी ब्लूमर्स हैं। यानी कि जन्म दिया है। माता-पिता के संसाधन तो चाहिएं। ज्यादा से ज्यादा मिलें, तो कितना अच्छा। उनका उत्तराधिकार मिले लेकिन उन्हें बोलने, सलाह देने, किसी आपत्ति से बचाने का कोई हक नहीं। यदि उनका बोलना इतना बुरा है, तो ऐसा करो कि अपना बोरिया-बिस्तर बांधो, अलग रहो। उनसे एक पैसा न लो। तब पता चलेगा कि जो तुम्हें बता रहे हैं कि अपने मालिक खुद ही हो, वे कितनी मदद करने आएंगे। कभी मिल भी जाएं, तो मुंह फेरकर निकल लेंगे। फोन भी न उठाएंगे। ये वे माता-पिता हैं, जिन्होंने अपने जीवन में बेहद कठिनाइयां झेली हैं। हाड़-तोड़ परिश्रम किया है। यह भावना भी मन में रही है कि जो कठिनाइयां इन्होंने झेलीं, उनकी छाया भी बच्चों पर न पड़े। इसलिए हर उस सुविधा को जुटाने का प्रयास किया, जो उन्हें कभी नहीं मिली।  फिर भी वे हंसी उड़ाने लायक हैं। 

जो दल और नेता तुम्हारी वाहवाही कर रहे हैं, जो बुद्धिजीवी तुम्हारे बधाए गा रहे हैं और कह रहे हैं कि तुम और टिके रहते, वे कभी बचाने नहीं आएंगे। तुम्हारे लिए एक पैसा नहीं निकलेगा जेब से। जो करेंगे, वे बस परिवार वाले ही, जिनकी कीमत कुछ नहीं। यूं इन नेताओं के लिए भी जेन-काी तुम्हारी कीमत तभी तक है, जब तक कि तुम उनके वोटर हो। वोट के बाद ये भूल जाएंगे कि तुम कौन। यानी कि सत्ता के द्वार तक पहुंचाने की कुंजी भर हो। एक पुर्जा, जिसे बैलेट बाक्स में फिट भर किया जाना है। 

फिर कुछ लोग कह रहे हैं कि जेन-काी जैसी तो कोई जैनरेशन नहीं। भारत को बंगलादेश, नेपाल बनाना है। बना लो लेकिन यह भी बताओ कि बंगलादेश, नेपाल में क्या हुआ, क्या हो रहा है? बंगलादेश में वे लोग सरकार में हैं, जिनका कट्टरपंथियों पर कोई नियंत्रण नहीं। यूं भी सत्ताधारी दल बी.एन.पी. खालिदा जिया का है, जो कट्टरपंथियों की समर्थक मानी जाती थीं। वहां कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यकों का जीना मुश्किल कर रखा है। यहां भी ऐसा हो जाए, यही चाहिए? और नेपाल, वहां जेन-काी के आंदोलन के बाद बालेन शाह सत्ता में हैं। वहां वही लोग बालेन के खिलाफ हो गए हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता सौंपी थी। आज नेपाल भीषण दंगों की आग में जल रहा है। क्या इसीलिए भारत को नेपाल की तरह बनाना है? क्यों भई? चैन से रहना रास नहीं आता? यूं भी आज का नायक कल खलनायक बना दिया जाता है। आज जेन-काी भगवान है, कल कोई और होगा।-क्षमा शर्मा     

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