…ए.आई.’ कहीं मानव जाति की दुश्मन न बन जाए!

आज के तकनीक प्रधान विश्व में ए.आई. (अर्थात कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के आने से लोगों को बहुत सुविधा हुई है, परंतु इसके संभावित दुरुपयोग की आशंका से कई लोगों के मन में भय भी बैठा हुआ है। लोगों की ङ्क्षचता का एक कारण तो यह है ही कि ए.आई. की वजह से एक-दूसरे के डाटा बेस में घुस कर लोगों के डाटा निकाले जा रहे हैं जो नहीं होना चाहिए। जैसे-जैसे ए.आई. का विकास हो रहा है, उसी अनुपात में लोगों की निजता समाप्त होती जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार ए.आई. लोगों के बारे में इतनी जानकारी जुटा सकती है कि उन्हें पता भी नहीं चलेगा कि उनसे सम्बन्धित कितनी जानकारी ए.आई. तक पहुंच गई है।
यूरोपीय संघ ने 2024 में एक कानून बना कर तय कर दिया था कि ए.आई. की सहायता से क्या-क्या किया जा सकता है। इसके अनुसार फेक वीडियो बनाने वाले या ए.आई. की सहायता से कुछ लिखने वाले व्यक्ति को यह लिखना पड़ेगा कि वह फेक वीडियो है या ए.आई. से बनाया गया है। यदि कोई व्यक्ति सामान्य सलाह या मैडीकल सलाह दे रहा है तो उसे लिखना पड़ेगा कि यह ए.आई. द्वारा दी गई सलाह है। यहां तक कि सरकारों के लिए भी कुछ नियम तय किए गए हैं कि सरकार किसी व्यक्ति की गोपनीयता के अधिकार का अतिक्रमण नहीं कर सकती, चाहे कोई व्यक्ति हो या सरकार।
अलबत्ता सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि आपराधिक केसों में वे एक्शन ले सकते हैं परंतु तभी यदि अदालत इस बात का फैसला कर दे कि अमुक व्यक्ति अपराधी है। इस तरह के हालात के बीच यदि अमरीका में कोई कानून नहीं बनता है और भारत, एशिया आदि में ए.आई. सम्बन्धी कानून नहीं बनेंगे तो सारी दुनिया में बहुत अधिक फेक सामग्री तैयार की जाने लगेगी जिससे मानव जाति की ही हानि होगी क्योंकि सबके सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। हालांकि ए.आई. से मैडीकल रिसर्च में बहुत मदद मिलेगी क्योंकि ए.आई. ऐसे काम भी बड़ी आसानी से कर लेती है जिन्हें करने में आम तौर पर बहुत देर लगे या ए.आई. की सहायता से कोई भी गणना बड़ी जल्दी की जा सकती है परंतु ए.आई. के इस्तेमाल के साथ बड़े जोखिम भी जुड़े हुए हैं।
ए.आई. के कारण बड़ी संख्या में बेरोजगारी तो बढ़ेगी ही, क्योंकि विश्व के तमाम देशों अमरीका, यूरोप, चीन आदि ने रोबोट्स का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। अत: स्किल्ड या अनस्किल्ड लेबर सब पर इसका प्रभाव पड़ेगा परंतु सर्वाधिक प्रभाव मानव जाति की सोचने की प्रक्रिया, संवेदनशीलता आदि पर पड़ेगा क्योंकि गलत डाटा से पैदा होने वाली भावनाएं किसी गलत निष्कर्ष पर ही पहुंचेंगी। यदि ए.आई. मशीनों को सोचने की शक्ति दे दी गई तो वे हमारे विरुद्ध भी जा सकती हैं? अभी यह सिर्फ अनुमान है परंतु यदि ए.आई. स्वयं विकसित होना शुरू कर दे और मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हो जाए तो यह खतरनाक हो सकता है। कुछ नियमों को निर्धारित किए बिना ही यदि यह प्रणाली लागू हो गई तो फिर यह मानव जाति के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। आखिर हम किस दिशा में जाना चाहते हैं? या क्या हम चाहते हैं कि सोचना बंद कर दिया जाए? क्या हम काम करना बंद करना चाहते हैं? अनेक देशों ने यह भी कर लिया है कि यदि बेरोजगारी आ गई तो वे अपनी जनता को एक निर्धारित रकम देंगे।
अब यहां प्रश्र उत्पन्न होता है कि क्या हमारे जैसे देश इस सिलसिले में अपनी विशाल जनसंख्या को प्रति मास दो-दो, अढ़ाई-अढ़ाई लाख रुपए और खाना-रहना मुफ्त दे सकेंगे? ऐसा नहीं कि आप ए.आई. का इस्तेमाल न करें, नई तकनीक को न आने दें, परंतु आवश्यकता यह है कि उसे नियंत्रित करने के लिए सरकार और जनता दोनों के लिए विशेष कानून होने चाहिएं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ए.आई. जल संकट का कारण बन रही है। ए.आई. मॉडल चलाने वाले शक्तिशाली कम्प्यूटर चिप्स अत्यधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं और प्रत्येक प्रोसैसर 700 वॉट तक बिजली की खपत करता है। इनको ठंडा रखने के लिए गर्म हवा गीले पैडों के माध्यम से खींची जाती है, जिससे प्रतिदिन लाखों लीटर स्वच्छ पेयजल वाष्प बनकर वातावरण में उड़ जाता है।
अमरीका के डाटा सैंटरों ने 2023 में अनुमानित 17 अरब गैलन (लगभग 64.35 अरब लीटर) पानी की खपत की और अनुमान है कि 2028 तक यह खपत बढ़कर 68 अरब गैलन (257.41 अरब लीटर) प्रतिवर्ष तक पहुंच जाएगी। एक मध्यम आकार का 100 मैगावाट डाटा सैंटर प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर पानी की खपत कर सकता है, जिससे स्थानीय नगरपालिका जल आपूर्ति पर दबाव पड़ता है और क्षेत्रीय भूजल स्तर में गिरावट आती है। इस पर भी गंभीर विचार करने की जरूरत है।



