अंतर्राष्ट्रीय

अमरीका ने चीन को अपने ही प्रभुत्व को चुनौती देने में कैसे मदद की

मिखाइल गोर्बाचेव के 25 दिसम्बर, 1991 को दिए गए इस्तीफे ने सोवियत साम्राज्य के पतन पर मुहर लगा दी थी। अमरीका उस वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था का एकमात्र सर्वोच्च नेता बन गया, जिसे उसने और उसके सहयोगियों ने 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में स्थापित किया था। लेकिन उससे 20 साल पहले, 1971 में, जब अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन व हेनरी किसिंजर ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (पी.आर.सी.) के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए चीन का दौरा किया, तो अमरीका ने खुद ही एक नई वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था के उद्भव का रास्ता साफ कर दिया था, जिसमें चीन आगे चलकर अमरीका के वर्चस्व को चुनौती देगा। 

पी.आर.सी. को चीन के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देकर, निक्सन-किसिंजर मिशन ने कई दरवाजों में से पहला दरवाजा खोला, जो अंतत: चीन को पश्चिम के प्रभुत्व वाली वैश्विक आॢथक व्यवस्था में पूर्ण प्रवेश की ओर ले गया। निक्सन की यात्रा के बाद, पी.आर.सी. ने 1971 में संयुक्त राष्ट्र और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ताइवान स्थित रिपब्लिक ऑफ चाइना (आर.ओ.सी.) की जगह ले ली। 1980 तक, पी.आर.सी. ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) और विश्व बैंक में भी आर.ओ.सी. को प्रतिस्थापित कर दिया था, जो अमरीका के नेतृत्व वाली वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के 3 स्तंभों में से 2 हैं। 11999 में चीन और अमरीका ने एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बाजार पहुंच समझौते पर हस्ताक्षर किए। दिसम्बर 2001 में चीन डब्ल्यू.टी.ओ. में शामिल हो गया।

तीन दशकों की इस यात्रा के दौरान चीन के भीतर भी बहुत कुछ बदल गया। 1976 में माओत्से तुंग के बाद सत्ता में आए देंग शियाओपिंग ने 1978 में ‘गाइगे काइफैंग’ यानी ‘सुधार और खुलापन’ कार्यक्रम शुरू किया। इसके कारण चीन की आॢथक प्रणाली में मौलिक परिवर्तन आया और नई चुनौतियां भी सामने आईं। वैश्विक अर्थव्यवस्था और उसके संस्थानों तक बढ़ती पहुंच ही वह सहारा बनी, जिसने चीन को इन व्यापक आंतरिक परिवर्तनों से निपटने और निर्यात में सफलता हासिल करने के लिए खुद को मजबूती से स्थापित करने में सक्षम बनाया। इसने आक्रामक व्यापारिक नीतियां अपनाईं, विशेष रूप से अवमूल्यित (कम आंकी गई) मुद्रा। 

2001 तक, जब चीन डब्ल्यू.टी.ओ. में शामिल हुआ, तो वह पहले से ही ‘दुनिया की फैक्ट्री’ के रूप में उभर चुका था। लेकिन वह हमेशा के लिए केवल निर्यात-आधारित रणनीतियों पर निर्भर नहीं रह सकता था। निर्यात पर अत्यधिक निर्भरता, उच्च-बचत और उच्च-निवेश वाली विकास रणनीति से घरेलू खपत-संचालित रणनीति की ओर जाने का उसका प्रयास (जहां निवेश और बचत दरें कम होती हैं) सफल नहीं हुआ। चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्यात पर ही निर्भर बनी रही। अब पूंजी निर्यात की रणनीति भी अपनाई जा रही है। शी जिनपिंग द्वारा 2013 में शुरू की गई बैल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बी.आर.आई.) के तहत, चीन की अतिरिक्त बचत का उपयोग लगभग 150 (मुख्यत:) विकासशील देशों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विशाल पोर्टफोलियो को वित्तपोषित करने के लिए किया जा रहा है, जिसमें चीन की अतिरिक्त पूंजीगत वस्तुओं के निर्माण की क्षमता का लाभ उठाया जा रहा है।

क्रय शक्ति समता के मामले में चीन पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और संभावना है कि यह कुछ दशकों के भीतर पारंपरिक जी.डी.पी. के मामले में भी अमरीका को पीछे छोड़ देगा। लेकिन आर्थिक मोर्चे के अलावा, चीन अब प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अमरीकी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। कृत्रिम बुद्धिमता (ए.आई.) तकनीकी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का एक प्रमुख उदाहरण है। यहां, डीप सीक, क्वेन, किमी और अन्य, जैसे ओपन-सोर्स चीनी ए.आई. मॉडल, चैटजीपीटी, जेमिनी और क्लाऊड जैसे तुलनीय अमरीकी संस्करणों की तुलना में एक-तिहाई से 10वें हिस्से की कम कीमत पर उपलब्ध हैं, ठीक उसी तरह जैसे चीनी इलैक्ट्रिक वाहनों (ई.वी.) ने अन्य ई.वी. को कीमत के मामले में पीछे छोड़ दिया है। 

ऐसा कैसे हो रहा है? दशकों से, हजारों चीनी छात्र प्रमुख अमरीकी विश्वविद्यालयों से स्नातक हुए हैं, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एस.टी.ई.) में विशेषज्ञता प्राप्त की है। हालांकि कुछ यहीं रुक गए लेकिन अधिकांश चीन लौट आए और चीनी प्रयोगशालाओं और उद्यमों में प्रतिद्वंद्वी उत्पादों के उत्पादन में लगे हुए हैं। साथ ही, कई अमरीका शिक्षित विशेषज्ञ चीनी विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं, जिससे स्वदेशी रूप से अगली पीढ़ी के विशेषज्ञों का उत्पादन हो रहा है। चीन जिस तीसरे मोर्चे पर अमरीकी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है, वह है वैश्विक वित्तीय प्रणाली। 2015 में चीन ने डॉलर आधारित स्विफ्ट प्रणाली के विकल्प के रूप में रेनमिनबी आधारित चीनी सीमा पार अंतरबैंक भुगतान प्रणाली (सी.आई.पी.एस.) शुरू की। इसकी पहुंच अभी भी सीमित है लेकिन चीन अपने सांझेदारों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है और यह लगातार बढ़ रही है। अमरीका जितना अधिक प्रतिबंधों का सहारा लेता है, उतना ही वह दुनिया भर के व्यवसायों को सी.आई.पी.एस. का उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है।-सुदीप्तो मुंडले

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