फिर उलझ गया दस्तावेजों का सिस्टम…

विदेश में उच्च शिक्षा ग्रहण करने, रोजगार पाने या फिर भ्रमण का सपना संजोने वाले लोगों को अब पासपोर्ट बनवाने के लिए अपनी जेब और अधिक ढीली करनी पड़ेगी। सरकार ने पासपोर्ट के आवेदन शुल्क में बढ़ोतरी कर दी है, जिसके तहत अब 36 पन्नों के सामान्य पासपोर्ट के लिए 1,500 रुपए की जगह 2,500 रुपए का भुगतान करना होगा, जबकि तत्काल सेवा के लिए 3,500 रुपए के बजाय 5,000 रुपए देने होंगे।
सरकार की ओर से शुल्क बढ़ोतरी का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है, लेकिन इसका असर निश्चित रूप से उन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर पड़ेगा, जिनके बच्चों को विदेश में उच्च शिक्षा हासिल करने के अवसर मिलते हैं। साथ ही उन श्रमिकों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो विदेश में रोजगार के जरिए अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते हैं। इसी के साथ पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण न मानने को लेकर भी विवाद पैदा हो गया है। सड़कों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह सवाल उठने लगा है कि आखिर नागरिकता साबित करने के लिए कौन सा दस्तावेज जरूरी है।
इसमें दो राय नहीं कि भारतीय विद्यार्थियों का विदेश जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने में खासा रुझान देखा जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में 12 लाख से अधिक भारतीय विद्यार्थी विभिन्न देशों में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे थे, लेकिन अब इन छात्रों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है। विदेशी शिक्षा संस्थानों में बढ़ती फीस और वीजा नियमों में की जा रही सख्ती से देश के छात्रों के कदम ठिठक रहे हैं। ऐसे में पासपोर्ट के आवेदन शुल्क में बढ़ोतरी उनके इरादों को और कमजोर कर सकती है।
इसी तरह विदेश में रोजगार के लिए जाने वाले श्रमिक वर्ग पर भी इसका विपरीत असर पड़ने की आशंका है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में करीब साढ़े तीन लाख भारतीय श्रमिक विदेश गए थे। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या आर्थिक स्थिति के आधार पर पासपोर्ट आवेदन शुल्क में रियायत नहीं दी जा सकती है। सरकार का मकसद केवल राजस्व अर्जित करना ही नहीं, बल्कि आम लोगों की आर्थिक सुरक्षा पर ध्यान देना भी होना चाहिए।
यही नहीं, पासपोर्ट के नागरिकता का प्रमाण न होने को लेकर एक नई बहस भी छिड़ गई है। विपक्षी दलों का कहना है कि पासपोर्ट, आधार कार्ड, राशन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र अगर नागरिकता को साबित नहीं करते, तो फिर इसके लिए कौन सा दस्तावेज जरूरी है। यह विचित्र बात है कि एक तरफ सरकार का दावा है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है और यह कभी भी नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं रहा है, तो दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए पात्रता साबित करने हेतु जिन 12 वैध दस्तावेजों की जरूरत होती है, उनमें पासपोर्ट भी शामिल है।
यह बात भी सामने आती है कि देश भर में हो रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग की ओर से नागरिकता की आंशिक रूप से जांच की जा रही है। ऐसे में अब यह मांग भी उठ रही है कि सरकार को कानूनी ढांचे में संशोधन कर पासपोर्ट और आधार कार्ड दोनों को भारतीय नागरिकता का वैध और निर्णायक प्रमाण घोषित करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज भी कई देशों में पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाणिक दस्तावेज माना जाता है।



