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भारत की अर्थव्यवस्था पर दोहरा दबाव: अमेरिकी शुल्क,महंगाई, कमजोर मानसून ने बढ़ाई चिंता

देश के आर्थिक परिदृश्य में बहुआयामी चुनौतियों का दायरा बढ़ता जा रहा है। ईंधन का संकट अभी पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ था कि कमजोर मानसून, बढ़ती महंगाई और अमेरिकी शुल्क संबंधी नई मुश्किलों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हाल में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद देश में महंगाई, आर्थिक स्थिति और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि से जुड़ी तस्वीर पेश की है।

रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई का अनुमान 5.0 फीसद कर दिया है। जीडीपी की वृद्धि का अनुमान 6.7 फीसद कर दिया गया है। खास तौर से रेपो रेट (वह ब्याज दर जिस पर बैंक रिजर्व बैंक से कर्ज लेते हैं) को लगातार चौथी बार 5.25 फीसद के स्तर पर यथावत रखा गया है। आरबीआइ ने यह भी कहा है कि आने वाले दिनों में अल नीनो के प्रभाव, मानसून के कमजोर रहने और पश्चिम एशिया में संघर्ष की वजह से खाने-पीने की वस्तुएं और ईंधन महंगे हो सकते हैं।

निस्संदेह इस समय पश्चिम एशिया संकट और अमेरिका की आर्थिक नीतियों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर चौतरफा दबाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए-नए आर्थिक और व्यापारिक संरक्षणवादी कदमों से भारत के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं। यह स्थिति मुख्य रूप से अमेरिका के व्यापार, कृषि, बौद्धिक संपदा और श्रम बाजार से जुड़ी नीतिगत बदलावों के कारण उत्पन्न हुई है। आयात पर अतिरिक्त शुल्क लागू करने और नीतियों को कठोर बनाने से भारतीय निर्यात प्रभावित हो रहा है।

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इसके साथ ही अमेरिका अपने कृषि और दुग्ध उत्पादों के लिए भारतीय बाजार में अधिक पहुंच की मांग कर रहा है। अमेरिका की वीजा नीतियों में कड़ाई और शुल्क वृद्धि से भारतीय सूचना-प्रौद्योगिकी कंपनियों एवं पेशेवरों के समक्ष अनिश्चितता पैदा हो रही है। वीजा प्राथमिकताओं में बदलाव और प्रशासनिक बाधाओं के कारण कुशल प्रतिभाओं की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है, जिससे सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

हाल ही में अमेरिकी संसद के उच्च सदन (सीनेट) ने रूस से कच्चा तेल तथा प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ एक कठोर विधेयक पारित किया है। यदि यह विधेयक निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) से मंजूर हो जाता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत और चीन जैसे प्रमुख तेल खरीदार देशों पर सौ फीसद तक का शुल्क लगाने का अधिकार मिल जाएगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाना तथा उनके युद्ध प्रयासों के वित्तीय स्रोतों को सीमित करना है।

इसमें दोराय नहीं है कि अमेरिका की ओर से रूस पर संभावित नए और सख्त प्रतिबंध भारतीय बाजार के लिए एक बड़ा वैश्विक जोखिम बन सकते हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी है, क्योंकि रूस सस्ते कच्चे तेल का प्रमुख स्रोत है। पश्चिमी देशों के बढ़ते प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने इस वर्ष जुलाई में लगातार दूसरे महीने रूस से कच्चे तेल का रिकॉर्ड आयात किया है। ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने जुलाई में 5.5 अरब यूरो (28 लाख बैरल प्रतिदिन) का रूसी कच्चा तेल खरीदा।

यह भारत के कुल पचास लाख बैरल प्रतिदिन के आयात का पचपन फीसद से अधिक है। ऐसे में नए प्रतिबंधों के कारण रूस से तेल आयात में रुकावट आती है, तो इससे घरेलू कंपनियों की लागत और देश का कुल आयात खर्च बढ़ सकता है।

हाल में अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने एच-1बी और एल-1 वीजा के विस्तार आवेदनों पर अतिरिक्त शुल्क लागू करने की घोषणा की है। इस वर्ष नौ सितंबर से लागू होने वाले इस नियम के तहत एच-1बी वीजा विस्तार के लिए 4,000 डॉलर (लगभग 3.68 लाख रुपए) और एल-1 विस्तार के लिए 4,500 डॉलर (लगभग 4.2 लाख रुपए) शुल्क देना होगा। यह नियम पचास या उससे अधिक कर्मचारियों वाली उन बड़ी कंपनियों पर लागू होगा, जिनके पचास फीसद से अधिक कर्मचारी इन्हीं वीजा के आधार पर नियुक्त हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में पिछले माह अमेरिकी संसद में कार्य वीजा पर तीन साल तक रोक लगाने संबंधी एक नया और सख्त विधेयक पेश किया गया है। इस विधेयक के लागू होने से तकनीकी क्षेत्र के भारतीय पेशेवरों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। नए प्रस्तावों में एक लाख डॉलर (लगभग 85 से 95 लाख रुपए) तक का भारी-भरकम शुल्क और कठोर न्यूनतम वेतन मानदंड शामिल हैं। इसके अलावा वीजा धारकों के आश्रितों और परिजनों पर भी कई पाबंदियां लगाने का प्रस्ताव है।

अमेरिका ने पिछले माह भारत समेत 17 देशों से आने वाले सामान पर दस फीसद का अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा की थी। अमेरिका ने यह कदम उन देशों के खिलाफ उठाया है, जिनके उत्पादों के निर्माण में जबरन मजदूरी की शिकायतें मिली थीं। शुरुआत में भारत पर 12.5 फीसद शुल्क लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन भारत की ओर से अपनी विदेश व्यापार नीति में सुधार करने पर इसे घटाकर दस फीसद कर दिया गया।

इसके अलावा अमेरिका ने जेनेरिक दवाओं के आयात पर चरणबद्ध तरीके से शुल्क लागू करने का फैसला किया है। इसके तहत अगस्त, 2028 से 31 जुलाई 2029 तक दवाओं के मूल्य पर सौ फीसद और उसके बाद इसे बढ़ाकर दो सौ फीसद कर दिया जाएगा। ऐसे में अब भारत को अमेरिका के साथ आगे बढ़ रहे द्विपक्षीय व्यापार समझौते में अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के प्रति अत्यंत सतर्क रहना होगा।

इन आर्थिक और व्यापारिक चुनौतियों के बीच एशियाई विकास बैंक की ओर से हाल में जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम एशियाई संकट और लॉजिस्टिक खर्च में बढ़ोतरी का भारत की विकास दर पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। रिपोर्ट में भारत की वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पूर्व में निर्धारित 6.9 फीसद की विकास दर को घटाकर 6.6 फीसद कर दिया गया है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी वर्ष 2026-27 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान घटाकर 6.4 फीसद कर दिया है। जबकि पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 7.7 फीसद की शानदार दर से वृद्धि दर्ज की थी।

हालांकि इस समय भारत आपूर्ति चुनौतियों से निपटने के लिए पहले से बेहतर स्थिति में है, फिर भी चालू वित्त वर्ष में देश की आर्थिक विकास दर को सात फीसद तक ले जाने के लिए रणनीति पूर्वक नए आर्थिक उपायों के साथ आगे बढ़ना होगा। सरकार को ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ के फार्मूले को और बेहतर ढंग से उपयोग में लाना होगा। केंद्रीय बैंक को अब महंगाई पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ विकास की गति को थमने से बचाना होगा। आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने के लिए सरकार को अपने पूंजीगत व्यय को लक्ष्य के अनुरूप तेजी से कारगर बनाना होगा।

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