क्या राजनीति सबसे तेजी से अमीर बनने का रास्ता बन गई है?

चलिए इस सप्ताह बात करते हैं भ्रष्टाचार की। इस विषय पर सोच ही रही थी कि एक उदाहरण प्रकट हुआ मेरे सामने। मुंबई में पिछले सप्ताह इस साल की पहली बारिश हुई थी और छप्पर फाड़ कर आसमान से पानी बरसा। जैसा अक्सर होता है, जब तेज बारिश होती है, गाड़ियों की पार्किंग उतनी ही मुश्किल होती है, जितना टैक्सी या ऑटो का मिलना। हुआ यूं कि मैं पैदल चलकर ट्राइडेंट होटल में गई थी किसी से मिलने, लेकिन घर लौटना मुश्किल था, क्योंकि बारिश बहुत तेज हो रही थी। मैंने अपने एक दोस्त से बात करके उसकी गाड़ी मंगवाई। जब उसका ड्राइवर मुझे लेने आया, तो काफी देर तक उसको ऊपर आने नहीं दिया गया, क्योंकि गाड़ियों की लंबी कतार लग चुकी थी।
वैसे भी दिक्कत बरसात की वजह से थी, लेकिन जाम लगने का सबसे बड़ा कारण यह था कि कई बहुत बड़ी और बहुत महंगी गाड़ियां होटल के बरामदे में बिना किसी चालक के खड़ी थीं। मैंने जब एक दरबान से पूछा कि उन गाड़ियों को वहां लगाने क्यों दिया जा रहा है, तो उसने परेशान आवाज में कहा, ‘जी, यह सब मंत्रियों की गाड़ियां हैं। जब भी विधानसभा का सत्र चलता है, ये लोग इस होटल में आकर ठहरते हैं और अपनी गाड़ियां दिन भर यहीं छोड़कर जाते हैं।’
मैं जानती हूं कि अपने इस भारत देश में फटाफट, बिना मेहनत किए अमीर होने का सबसे आसान रास्ता राजनीति में आना है, लेकिन उन गाड़ियों को देखकर और उन मंत्रियों की शान देखकर मैं हैरान रह गई। पहली बात तो इतनी महंगी गाड़ियां खरीदते कैसे हैं हमारे जनसेवक और दूसरी बात, पांच सितारा होटलों में रहते कैसे हैं? सरकारी तनख्वाह से ये पैसे नहीं आ सकते, तो कहां से आते हैं? क्या इसको भ्रष्टाचार नहीं कहा जाए?
भ्रष्टाचार की बातें इस सप्ताह इसलिए करना चाहती हूं, क्योंकि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने खोजी पत्रकारिता के जरिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के बारे में ढूंढ़ निकाला है कि उन्होंने उज्जैन में अपने लिए और अपने पूरे परिवार के लिए शहर के उन जगहों पर जमीन खरीदी है, जिनकी कीमत अचानक उस समय बढ़ जाएगी, जब उन इलाकों का विकास किया जाएगा। यह खुलासा भी किया गया है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार की उज्जैन में जमीन की कीमत दोगुनी हो गई है, जब से वे मुख्यमंत्री बने हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री के परिवार ने 168 एकड़ जमीन पर 137 प्लॉट खरीदे हैं।
मुख्यमंत्री ने अपनी सफाई में कहा है कि इस रिपोर्ट में कोई सच्चाई नहीं है और उनके समर्थक तथा भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता कहते नहीं थके हैं कि राजनीति में आने से पहले उनका जमीन-जायदाद का कारोबार था। रहा होगा उनका कारोबार, लेकिन मुख्यमंत्री बन जाने के बाद अगर इस तरह उनके परिजनों ने उज्जैन में इतनी सारी जमीन खरीदी है, तो क्या इसलिए नहीं कि उनको जानकारी थी कि कौन से इलाकों में नए रिहायशी और व्यावसायिक क्षेत्र बनने वाले हैं? इसको भ्रष्टाचार नहीं कह सकते हैं, तो किसको कह सकते हैं? मोहन यादव पहले ‘डबल इंजन’ मुख्यमंत्री हैं, जिनके बारे में इस तरह की बातें सामने आई हैं, लेकिन सच यह है कि बहुत दिनों से बहुत सारी बातें होती रही हैं भाजपाइयों के भ्रष्टाचार की।
मेरी जानकारी के कई लोग हैं महाराष्ट्र में, जो सत्ता में आने से पहले अमीर नहीं थे, लेकिन अचानक इतने अमीर हो गए हैं कि अब निजी हवाई जहाजों में घूमते हैं और जिनकी निजी विदेशी गाड़ियां करोड़ों की हैं। वे देसी गाड़ियों में चलते ही नहीं हैं। इस तरह की भ्रष्ट राजनीतिक सभ्यता दशकों से चली आ रही है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी कहा था, ‘ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा।’ सो, जब उनके मंत्री और मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त दिखते हैं, तो कुछ ज्यादा तकलीफ तो होती ही है।
उज्जैन की खबर आने से पहले खबर आई थी अयोध्या से, जहां रामजी के मंदिर से चढ़ावा चोरी हुआ है और इस पैमाने पर कि जिन्होंने इसको होने दिया है, उनको कभी न कभी हिसाब देना पड़ेगा। वैसे ही जैसे चोरी करने वालों से हिसाब मांगा जा रहा है। हीरों के हार चोरी हुए हैं, सोना चोरी हुआ है और नकद पैसा करोड़ों में। यह भी मालूम हुआ है कि यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि चढ़ावे की गिनती लापरवाही से की जाती थी। मंदिर के प्रशासकों को कई बार कहा गया था कि इतना पैसा जब आता है, तो उसको गिनने का काम किसी अनुभवी कंपनी को देना चाहिए, न कि मंदिर के सेवकों को। अब जो चोरी पकड़ी गई है, तो क्या बुलडोजर बाबा उनके घरों पर भी बुलडोजर चलाएंगे? छोटे-मोटे चोरों के घर अगर ढहाए जा सकते हैं, तो उनके क्यों नहीं, जिन्होंने भगवान के घर से चोरी की है?
तो क्या भ्रष्टाचार को हम कभी रोक पाएंगे अपने इस बदनसीब, बेहाल देश में? रोकना ही होगा, वरना हमें विश्वगुरु बनने का सपना भूल जाना चाहिए। उन देशों में, जहां इस पैमाने पर भ्रष्टाचार फैल जाता है, उनके विकसित होने का सवाल नहीं होता। निवेशक ऐसे देशों में निवेश करने से घबराते हैं। ऐसा नहीं है कि भ्रष्ट राजनेता और आला अधिकारी सिर्फ भारत में हैं। विकसित देशों में भी भ्रष्ट लोग होते हैं, लेकिन फर्क यह है कि वहां उन लोगों को आसानी से दंडित किया जा सकता है, क्योंकि उन देशों में कानून व्यवस्था आधुनिक तरीकों से चलती है। अपने देश में तो आतंकवादियों को सजा देने में ही कई दशक लग जाते हैं, सो आर्थिक अपराधों की बारी देर से आती है। भ्रष्टाचार आम लोगों के लिए बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है, लेकिन लगता है कि यह खबर दिल्ली के ऊंचे तख्तों तक नहीं पहुंची है।-तवलीन सिंह



