CBI जांच से क्यों बच रही सोरेन सरकार? समझें कानूनी-सियासी दांव पेच

झारखंड में छात्रों के आंदोलन के 17 दिन पूरे हो चुके हैं. झारखंड सरकार ने JPSC परीक्षा रद्द कर दी और आयोग के सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन CBI जांच की मांग पर छात्रों और सरकार के बीच गतिरोध बरकरार है. सरकार ने 98 फीसदी मांगें मानने का दावा किया है, लेकिन इस एक मांग पर वह क्यों अड़ी है. आखिर सोरेन सरकार CBI जांच से क्यों डर रही है और क्या वाकई CBI बिना राज्य की इजाजत के जांच नहीं कर सकती…
CBI को जांच के लिए राज्य की सहमति क्यों चाहिए?
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) एक्ट, 1946 के तहत काम करती है. इस एक्ट की धारा 6 साफ कहती है कि CBI का कोई भी सदस्य किसी राज्य के इलाके में तब तक जांच के अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकता, जब तक उस राज्य की सरकार की सहमति न मिल जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में एक फैसले में इस बात की पुष्टि की थी कि ‘CBI जांच के लिए राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य है’ और यह प्रावधान संविधान की संघीय व्यवस्था के अनुरूप है. यानी भारत में CBI कोई ‘बिना इजाजत के’ कहीं भी जांच करने वाली एजेंसी नहीं है, कम से कम कानूनी तौर पर तो नहीं. CBI को राज्य से सामान्य या विशेष सहमति लेनी पड़ती है.
‘सामान्य सहमति’ और ‘विशेष सहमति’ में क्या फर्क है?
CBI को राज्य से दो तरह की सहमति मिल सकती है:
- सामान्य सहमति (General Consent): राज्य सरकार CBI को एक बार में ही सभी तरह के मामलों की जांच करने की इजाजत दे देती है. इसके बाद CBI को हर मामले के लिए अलग से अनुमति नहीं लेनी पड़ती.
- विशेष सहमति (Specific Consent): CBI को हर मामले के लिए राज्य सरकार से अलग से इजाजत लेनी होती है.
अब झारखंड की बात करें तो 2020 में हेमंत सोरेन सरकार ने CBI से अपनी ‘सामान्य सहमति’ वापस ले ली थी. इसका मतलब है कि अब झारखंड में CBI को किसी भी मामले की जांच के लिए राज्य सरकार से विशेष सहमति लेनी पड़ती है. जब तक सरकार यह सहमति नहीं देती, CBI वहां जांच शुरू नहीं कर सकती.
तो क्या CBI बिना राज्य की सहमति के बिल्कुल नहीं कर सकती जांच?
पूरी तरह से नहीं, लेकिन कुछ अपवाद हैं…
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2025 में एक अहम फैसला दिया कि CBI को केंद्र सरकार के अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए राज्य की सहमति की जरूरत नहीं होती. अदालत ने कहा कि अगर अपराध किसी केंद्रीय कानून (जैसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) के तहत किया गया है और आरोपी केंद्र सरकार का कर्मचारी है, तो CBI बिना राज्य की सहमति के भी जांच कर सकती है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि झारखंड के छात्र आंदोलन का मामला इस दायरे में नहीं आता. यहां आरोप परीक्षा में अनियमितताओं और पेपर लीक के हैं, जो राज्य के अधिकारियों और निजी लोगों से जुड़े हैं, न कि केंद्र सरकार के अधिकारियों से. इस मामले में CBI को राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य है.
हालांकि, इसमें एक ट्विस्ट और है, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की स्पेशल पावर का, यानी सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ही CBI जांच का आदेश दे सकते हैं. निचली अदालतों, मजिस्ट्रेटों या किसी अन्य न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निकाय के पास यह अधिकार नहीं है.
यह अधिकार अनुच्छेद 32 (सुप्रीम कोर्ट) और अनुच्छेद 226 (हाईकोर्ट) के तहत मिली असाधारण संवैधानिक शक्ति है. निचली अदालतों को यह अधिकार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि CBI जांच का आदेश आखिरी उपाय होना चाहिए, रूटीन नहीं. इसे ‘बहुत सावधानी, संयम और केवल असाधारण स्थितियों’ में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
जब आदेश दिया जा सकता है:
- जब मामले में प्राथमिकता से अपराध का सबूत हो.
- जब निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच के मौलिक अधिकार को खतरा हो.
- जब मामले की जटिलता, बड़े पैमाने या राष्ट्रीय असर हो.
- जब राज्य पुलिस पर भरोसा न होने का पुख्ता कारण हो.
जब आदेश नहीं दिया जा सकता है:
- सिर्फ इसलिए कि किसी को राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं.
- रूटीन मामलों में.
- बिना ठोस सबूत के.
यही वजह है कि छात्र CBI जांच की मांग कर रहे हैं, क्योंकि अगर वे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाते हैं, तो अदालत CBI को बिना राज्य सरकार की सहमति के भी जांच का आदेश दे सकती है. सरकार इसी से डर रही है क्योंकि अगर कोई याचिकाकर्ता हाईकोर्ट जाता है और अदालत को लगता है कि मामला ‘असाधारण’ है, तो वह CBI जांच का आदेश दे सकती है, चाहे सरकार को यह मंजूर हो या नहीं.
आखिर हेमंत सोरेन सरकार CBI जांच से क्यों बच रही है?
CSDS के संजय कुमार के मुताबिक, हेमंत सोरेन सरकार का CBI जांच से बचने की 4 बड़ी वजहें हैं:
1. CBI पर ‘केंद्र की एजेंसी’ होने का आरोप
हेमंत सोरेन की पार्टी JMM विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का हिस्सा है. विपक्षी दलों का लंबे समय से यह आरोप रहा है कि CBI और ED जैसी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल केंद्र सरकार विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए करती है.
द प्रिंट के मुताबिक, ‘मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन CBI या ED पर भरोसा नहीं करते, क्योंकि केंद्रीय जांच एजेंसियों में भरोसा घटता जा रहा है.’ यानी सरकार को डर है कि अगर मामला CBI को गया तो वह राजनीतिक रंग ले सकता है और सरकार के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है.
2. CBI की जगह CID जांच पर जोर
सोरेन सरकार चाहती है कि जांच राज्य की क्रिमिनल इन्वेस्टिंग डिपार्टमेंट (CID) करे. छात्रों का कहना है कि CID पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि 2024 में JSSC की परीक्षा में भी इसी तरह की अनियमितताओं की जांच CID ने की थी और छात्रों को उस पर भरोसा नहीं है.
सोरेन सरकार का तर्क है कि JSSC-CGL परीक्षा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई थी, इसलिए CBI जांच संभव नहीं है. हालांकि, छात्र इसे सरकार की ‘टालमटोल’ करार दे रहे हैं.
3. पहले भी CBI से हो चुका है टकराव
झारखंड सरकार और CBI के बीच यह पहला टकराव नहीं है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें राज्य में अवैध कोयला खनन मामले की CBI जांच का निर्देश दिया गया था. तब भी सरकार ने यही दलील दी थी कि झारखंड ने CBI से सामान्य सहमति वापस ले ली है और बिना सहमति के CBI जांच नहीं कर सकती.
4. सियासी नुकसान का डर
अगर CBI जांच में कोई बड़ा घोटाला सामने आता है, जिसमें सरकारी अधिकारियों या मंत्रियों के नाम आते हैं, तो 2029 के विधानसभा चुनाव से पहले यह JMM सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक झटका हो सकता है. बीजेपी नेता पहले ही ‘हेमंत सोरेन के कार्यकाल में हुई सभी प्रतियोगी परीक्षाओं की CBI जांच’ की मांग कर चुके हैं.
क्या CBI के लिए नया कानून बन रहा है?
संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि CBI को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता’ से जुड़े मामलों में बिना राज्य की सहमति के जांच करने का अधिकार देने वाला नया कानून बनाया जाए. समिति के मुताबिक, आठ राज्यों ने CBI से सामान्य सहमति वापस ले ली है, जिससे CBI की जांच क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है. इन राज्यों में झारखंड, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, पंजाब, कर्नाटक और मेघालय शामिल हैं. गौर करने वाली बात यह है कि मेघालय और बंगाल को छोड़कर बाकी सभी राज्य गैर-NDA दलों के शासन वाले हैं.
अगर यह कानून बनता है तो CBI को राज्यों की सहमति की जरूरत खत्म हो जाएगी, लेकिन अभी यह कानून पास नहीं हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में CBI की जांच शक्तियों को सीमित किया है:
- 2020 का फैसला: राज्य सरकार की सहमति CBI जांच के लिए अनिवार्य है.
- 2025 का फैसला: केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ CBI को राज्य की सहमति की जरूरत नहीं.
सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी दुबे कहते हैं कि झारखंड के मामले में दोनों ही फैसले पूरी तरह लागू नहीं होते. क्योंकि यह मामला केंद्र सरकार के कर्मचारियों से जुड़ा नहीं है, इसलिए 2025 का फैसला लागू नहीं होगा. राज्य सरकार ने सामान्य सहमति वापस ले ली है, इसलिए CBI को विशेष सहमति चाहिए. कानूनी तौर पर CBI इस मामले में तब तक जांच शुरू नहीं कर सकती, जब तक झारखंड सरकार उसे इजाजत न दे.’
तो इस मामले में अब आगे क्या?
बीजेपी इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ हथियार बना रही है. राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा है. ऐसे में सरकार के सामने दो विकल्प हैं:
- CBI जांच को मंजूरी देना: इससे राजनीतिक नुकसान हो सकता है लेकिन छात्रों का आंदोलन खत्म हो जाएगा.
- CBI जांच से इनकार करना: इससे आंदोलन लंबा खिंच सकता है और सरकार की छवि को नुकसान हो सकता है.
फिलहाल तो ऐसा लग रहा है कि CBI जांच की मांग पर सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं है. इसी पेंच में फंसा है झारखंड का यह आंदोलन. कानूनी दायरे में CBI बिना सहमति के कुछ नहीं कर सकती और सरकार सहमति देने को तैयार नहीं. यह गतिरोध अभी कुछ दिन और चल सकता है.-ज़ाहिद अहमद



