लेख

ग्रोथ पर केंद्रित है रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति

वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, रिजर्व बैंक नीतिगत उपायों और विदेशी मुद्रा बाजारों में सीधे हस्तक्षेप के सही तालमेल के जरिए, कम समय में 4 प्रतिशत से ज्यादा की भारी गिरावट के बाद भी, रुपए को काफी हद तक स्थिर रखने में कामयाब रहा है। इनमें सट्टेबाजी वाली गतिविधियों पर रोक लगाना भी शामिल है, जो ऐतिहासिक रूप से रुपए के मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव का एक बड़ा कारण रही हैं। अब, रिजर्व बैंक के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि युद्धों और संघर्षों से विकास की संभावनाओं पर कोई बुरा असर न पड़े…

अप्रैल माह में प्रथम सप्ताह में रिजर्व बैंक द्वारा घोषित मौद्रिक नीति में, रेपो रेट और अन्य नीतिगत ब्याज दरों को समान रखने और साथ ही अपने रुख को भी यथावत ‘न्यूट्रल’ यानी तटस्थ रखते हुए केंद्रीय बैंक ने एक मजबूत संदेश दिया है कि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, सप्लाई चेन में बाधाओं, अंतरराष्ट्रीय मार्ग अवरुद्ध होने और विश्व में उथल-पुथल के बावजूद भारत के नीति निर्माता देश के बुनियादी बातों (फंडामेंटल्स) के बारे में तो आश्वस्त है ही, साथ ही साथ देश में ग्रोथ के वातावरण को बनाए रखने के लिए भी प्रतिबद्ध है। हालांकि मौद्रिक नीति घोषणा से पूर्व यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि 2025 के दौरान रेपो रेट में लगातार कमी का जो मार्ग अपनाया गया था, उसमें अवरोध आ सकता है और मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं के चलते रेपो रेट में वृद्धि हो सकती है अथवा कम से कम मौद्रिक नीति रुख को डाउनग्रेड कर उसे तटस्थ से उदार, यानी ‘एकोमोडेटिव’ किया जा सकता है। लेकिन उन आशंकाओं को निर्मूल सिद्ध करते हुए रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था का जो खाका देश के समक्ष प्रस्तुत किया है वह यह बताता है कि वैश्विक उथल-पुथल, बढ़ती तेल कीमतों और उन वैश्विक समस्याओं के बावजूद अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है और उसके ग्रोथ के मार्ग को प्रशस्त रखते हुए रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत ही रखना एक उचित नीति है। गौरतलब है कि मौद्रिक नीति में रेपो रेट को कम रखते हुए देश में निवेश, चिरस्थाई वस्तुओं और घरों की मांग को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, जिससे ग्रोथ बढऩे का मार्ग प्रशस्त होता है। लेकिन रेपो रेट को घटाने की पहली शर्त यह होती है कि देश में मुद्रास्फीति कम हो। यदि मुद्रास्फीति अधिक हो अथवा भविष्य में मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं ज्यादा हों, तो रेपो रेट को घटाने से मुद्रास्फीति और अधिक बढ़ सकती है। इसलिए केंद्रीय बैंक (भारतीय रिजर्व बैंक) मुद्रास्फीति अधिक होने की स्थिति में रेपो रेट घटाने का जोखिम नहीं ले सकता। लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक स्थितियों और मुद्रास्फीति बढऩे के डर और बाधित सप्लाई चेन के बावजूद रिजर्व बैंक ने सोच-समझकर जोखिम उठाते हुए रेपो रेट को स्थिर रखने का कठिन फैसला लेकर, ग्रोथ के इंजन को चालू रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

मुद्रास्फीति और ग्रोथ अपेक्षाएं

मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान यह है कि यह वर्ष 2026-27 में 4.5 प्रतिशत से 4.6 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि यह 2025-26 की मुद्रास्फीति 2.1 प्रतिशत से काफी अधिक है, फिर भी यह मौद्रिक नीति समिति के लिए निर्धारित लक्ष्य 2 से 6 प्रतिशत के बीच ही रहने का अनुमान है। मौद्रिक नीति अप्रैल 2026 के अनुसार, मौद्रिक नीति बनाते हुए इस बात का ध्यान रखना होगा कि यह मुद्रास्फीति की सीमा 4 प्रतिशत, जमा-घटा 2 प्रतिशत के बीच ही रहे। और ऐसे में जैसे ही यह सीमा के उल्लंघन होने का खतरा हो, रेपो रेट को बढ़ाना और मुद्रा के संकुचन के अन्य उपाय अपनाना आवश्यक हो जाता है। इसीलिए चूंकि मुद्रास्फीति, मौद्रिक नीति समिति के लिए निर्देशित सीमा में ही होने के कारण रिजर्व बैंक ने रेपो रेट स्थिर रखने का निर्णय लिया।

ग्रोथ दृष्टिकोण

रिजर्व बैंक ने 2026-27 में ग्रोथ संभावनाओं को 6.2 प्रतिशत पर रखा है। गौरतलब है कि 2025-26 में जीडीपी ग्रोथ 7.4 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि ग्रोथ में थोड़ी ही सही, कुछ कमी होने की संभावना है। ध्यातव्य है कि वैश्विक उथल-पुथल का ग्रोथ पर पडऩे वाला प्रभाव रिजर्व बैंक को विचलित नहीं कर सका। इसका कारण यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है और वैश्विक हलचल भारत की ग्रोथ संभावनाओं को प्रभावित नहीं कर पाएगी।

तरलता प्रबंधन

समझना होगा कि तरलता को इष्टतम स्तर पर रखना भी उतना ही जरूरी है, जितना रेपो रेट को नीचे रखना, ताकि अल्पकाल में ब्याज दरें, रेपो रेट के आसपास बनी रहे। ऐसा करने हेतु रिजर्व बैंक खुले बाजार की क्रियाओं, परिवर्तनशील रेपो रेट और परिवर्तनशील रिवर्स रेपो रेट जैसे उपकरणों की मदद से तरलता का प्रबंधन करता है। इन उपकरणों के माध्यम से रिजर्व बैंक यह सुनिश्चित करता है कि उपयुक्त तरलता (न कम न अधिक) बनी रहे, ताकि कॉल दर, खासतौर पर भारित औसत कॉल दर भी रेपो रेट से 0.10 से 0.15 से ज्यादा न होने पाए। कॉल दर, वो ब्याज दर होती है जिस पर बैंक अन्य बैंकों से अल्पकाल में उधार लेता है। आजकल भारतीय बैंक के लिए एक बड़ी समस्या यह बनी हुई है कि इसकी उधार की ग्रोथ जमाओं की ग्रोथ से काफी ऊंची बनी हुई है। इस अंतर की भरपाई के लिए बैंकों को ब्याज से ऊंचे ब्याज पर ऋण लेना पड़ता है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि क्योंकि पिछले कुछ समय से बैंकों में जमा करने की बजाय लोग अपनी बचत को म्युचुअल फंड में डाल रहे हैं। इस समस्या का समाधान भी रिजर्व बैंक को खोजना पड़ेगा। समझना होगा कि रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति के माध्यम से विभिन्न प्रकार के लक्ष्य और उद्देश्यों को साधने का प्रयास करता है। संतोष की बात यह है कि उपयुक्त नीतिगत उपायों से भारतीय बैंक ‘एनपीए’ यानी गैर निष्पादित परिसंपत्तियों की समस्या से लगभग निजात पा चुके हैं। बैंकों की सेहत अच्छी हो रही है। मौद्रिक नीति के माध्यम से एक ओर महंगाई पर काबू पाया जा रहा है तो दूसरी ओर ग्रोथ भी बेहतर हो रही है। डिजिटलीकरण बैंकों की लागतों को कम कर रहा है, ऐसे में विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की ओर ले जाने में रिजर्व बैंक की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। आत्मनिर्भरता के लक्ष्य की पूर्ति के लिए बैंकों को उधार का उपयुक्त प्रवाह भी सुनिश्चित करना होगा और साथ ही उस उधार की अदायगी भी होती रहे, ऋणों को देया क्षमता की कसौटी पर कसना भी होगा। अप्रैल माह की मौद्रिक नीति विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति में सहयोगी होगी, ऐसी आशा की जा सकती है।

वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, रिजर्व बैंक नीतिगत उपायों और विदेशी मुद्रा बाजारों में सीधे हस्तक्षेप के सही तालमेल के जरिए, कम समय में 4 प्रतिशत से ज्यादा की भारी गिरावट के बाद भी, रुपए को काफी हद तक स्थिर रखने में कामयाब रहा है। इनमें सट्टेबाजी वाली गतिविधियों पर रोक लगाना भी शामिल है, जो ऐतिहासिक रूप से रुपए के मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव का एक बड़ा कारण रही हैं। अब, रिजर्व बैंक के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि युद्धों और संघर्षों, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में रुकावटों, और बाधित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों वाले वैश्विक परिदृश्य से विकास की संभावनाओं पर कोई बुरा असर न पड़े। एक मजबूत मौद्रिक नीति, जो स्थिरता के साथ विकास पर केंद्रित हो, ब्याज दरों में बढ़ोतरी को रोककर, विकास को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त तरलता उपलब्ध कराकर, और साथ ही मुद्रास्फीति की प्रवृत्तियों को नियंत्रण में रखकर, इस काम में अहम भूमिका निभाएगी। पर्याप्त ऋण प्रवाह सुनिश्चित करना, तरलता का प्रबंधन करना, मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना और विकास को गति देना- ये सभी रिजर्व बैंक के लिए एक बड़ी और कठिन चुनौती होंगे।-डा. अश्वनी महाजन

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button