अब सत्ता ही है राजनीति की वास्तविक विचारधारा

किसी राष्ट्र को सस्ते राजनेता से अधिक महंगा कुछ नहीं पड़ता। यह कहावत आज के राजनीतिक मौसम में पूरी तरह चरितार्थ होती दिखती है, जहां दल-बदल का दौर अपने चरम पर है। यह समझना कठिन हो गया है कि कौन किसके साथ है, कौन किसका साथ छोड़ रहा है, कौन किस दल में प्रवेश कर रहा है और कौन किससे समझौते कर रहा है। सब कुछ केवल सत्ता प्राप्ति के लिए हो रहा है। यह समस्या ममता बनर्जी की पार्टी के लिए भी चुनौती बनी हुई है, जिसने कई सांसदों और विधायकों को खोया। इसी प्रकार केजरीवाल की पार्टी तथा महाराष्ट्र में अन्य दलों को भी टूट-फूट का सामना करना पड़ा।
एक दल-बदल कर चुके नेता ने स्वीकार किया, ‘‘जब भाजपा राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर एक प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी, तो हमें एक अधिक संसाधन-संपन्न प्रतिद्वंद्वी के दबाव का सामना करना पड़ा। ऐसे में केवल प्रासंगिक बने रहना ही नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व बचाना भी चुनौती बन गया। इसलिए हमने दल बदलने का निर्णय लिया।’’
प्रश्न यह है कि किसी राजनीतिक दल का उद्देश्य क्या होता है? क्या वह अपनी पहचान और विचारधारा को सुरक्षित रखने के लिए होता है? क्या वह बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए होता है? या फिर राजनीति का अंतिम लक्ष्य केवल चुनाव जीतकर सत्ता प्राप्त करना ही है? नि:संदेह, जब सत्ता राजनीति का अंतिम लक्ष्य बन जाती है, तब विचारधारा के लिए बहुत कम स्थान बचता है। सत्ता वह माध्यम है, जिसके द्वारा दल अपनी नीतियों को लागू करते हैं। सत्ता के बिना विचारधारा केवल विचारों का संग्रह बनकर रह जाती है। किंतु जब सत्ता की प्राप्ति ही सर्वोपरि उद्देश्य बन जाए, तब विचारधारा गौण, लचीली अथवा त्याज्य बन जाती है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि सत्ता प्राप्ति के लिए विचारधारा से कितना समझौता स्वीकार्य है? सांसदों और विधायकों का अपने मतदाताओं से क्या संबंध है? क्या वे केवल प्रतिनिधि हैं या उनके बीच कोई नैतिक दायित्व भी है, जिसे अब भुला दिया गया है?
जब नेता चुनाव प्रचार करते हैं, तो वे अपने आपको एक विशेष विचारधारा और मूल्यों के साथ प्रस्तुत करते हैं। वे वादे करते हैं और अपने दल के प्रति निष्ठा का भरोसा देते हैं। मतदाता इन्हीं आधारों पर उन्हें वोट देते हैं। ऐसे में जब वही नेता दल बदल लेते हैं, तो क्या यह उनके मतदाताओं और दल के साथ विश्वासघात नहीं? व्यक्तिगत स्वार्थ, अवसरवादिता और सत्ता में हिस्सेदारी की चाह ही आज कई नेताओं को एकजुट रखती है। आज राजनीति में अपनी आत्मा को सबसे ऊंची बोली लगाने वाले के हाथ बेच देने वालों को चतुर कहा जाता है। लगभग हर दल और उसके नेता अपने समर्थकों और विरोधियों को भ्रमित करने की कला में निपुण हो चुके हैं। इससे लोकतंत्र और मतदाताओं के प्रति उनकी वास्तविक सोच उजागर होती है। यह राजनीति के उस स्वरूप को सामने लाता है, जिसमें नैतिकता का ह्रास और लालच का विस्तार दिखाई देता है। व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और चरित्रहनन लोकतांत्रिक राजनीति की पहचान बनते जा रहे हैं। सांझी विचारधारा और सामूहिक उद्देश्यों का अभाव स्पष्ट है। यही आज की राजनीति की सच्चाई है।
दुर्भाग्यवश, नेताओं की विश्वसनीयता लगातार गिर रही है। सत्ता की लालसा इतनी प्रबल हो गई है कि नेता विपक्ष में रहते हुए विचारधारा की दुहाई देते हैं लेकिन सत्ता सामने आते ही उसे किनारे रखने को तैयार हो जाते हैं। कथनी और करनी के बीच का यही अंतर इस निष्कर्ष को जन्म देता है कि राजनीति की वास्तविक विचारधारा अब सत्ता ही है। फिर भी क्या इसे केवल राजनीतिक कलियुग कहकर टाल देना पर्याप्त है? यदि सत्ता की राजनीति ने विचारधारा को पीछे छोड़ दिया है, तो समाधान राजनीति को त्यागने में नहीं, बल्कि सत्ता को पुन: उद्देश्य से जोडऩे में है। राजनीतिक दलों को ऐसे मूलभूत सिद्धांत निर्धारित करने होंगे, जिन पर कोई समझौता न किया जा सके। रणनीति, गठबंधन और नीतियों में लचीलापन हो सकता है लेकिन मूल मूल्य नहीं छोड़े जाने चाहिएं।
आदर्श रूप से कोई भी दल कुछ विचारों, नीतियों और जनहितों को आगे बढ़ाने का माध्यम होता है, केवल अपने संगठनात्मक अस्तित्व को बनाए रखने का साधन नहीं। व्यवहार में, दलों के सामने 2 विकल्प होते हैं-अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना या चुनावी सफलता के लिए समझौते करना। जो दल किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करते, वे सिद्धांतवादी तो बने रहते हैं, परंतु नीति-निर्माण को प्रभावित करने में कठिनाई महसूस करते हैं। लोकतांत्रिक राजनीति इन दोनों के बीच संतुलन का निरंतर प्रयास है। आज भारत एक नैतिक चौराहे पर खड़ा है। झूठ, छल और भ्रम के इस खेल में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सभी दल एक कड़वी सच्चाई को प्रतिङ्क्षबबित करते हैं-सत्ता ही सब कुछ है। लेकिन मतदाताओं के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है-यदि नेता आसानी से राजनीतिक सीमाएं लांघ सकते हैं और फिर भी नैतिक श्रेष्ठता का दावा कर सकते हैं, तो हम आखिर वोट किसे दे रहे हैं? किसी विचारधारा को, किसी सिद्धांत को, या सत्ता की बड़ी सौदेबाजी के एक क्षण को? विचारधारा कहां है? सिद्धांत कहां हैं? या फिर हवा जिस दिशा में बहती है, हम भी उसी ओर मुड़ जाते हैं?-पूनम आई. कौशिश



