राजनीति

जंतर-मंतर के बाद बेहतरी के लिए हर बदलाव संभव लगता है

जंतर -मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.) द्वारा शुरू किए गए आंदोलन ने वह सबक सिखाया है, जिसे भारत की लोकतांत्रिक राजनीति के 79 वर्षों में राजनीतिक दलों ने नहीं सीखा। इस ‘सबक’ का पहला संकेत इस साल की शुरुआत में ही दिख गया था लेकिन उस पर थोड़ी देर बाद बात करेंगे।

अब तक, इतिहास ने हमें सिखाया है कि राजनीतिक दल संघर्ष और चुनाव जीतकर बदलाव ला सकते हैं। वह सबक आज भी सच है। कांग्रेस ने उस आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसने आजादी दिलाई। लगातार चुनाव जीतकर, कांग्रेस ने भारतीय लोकतंत्र के कई स्तंभ खड़े किए, जैसे कि संवैधानिक शासन, धर्मनिरपेक्षता, आरक्षण, भाषाई राज्य, एक स्वतंत्र केंद्रीय बैंक, संसाधनों का हस्तांतरण आदि। क्षेत्रीय दलों, उदाहरण के लिए, द्रविड़ दलों, ने राज्यों में चुनाव जीते और राज्य की भाषा, राज्यों के अधिकार, सांस्कृतिक पहचान, भूमि सुधार आदि की प्रधानता को स्थापित किया। 1975 में जे.पी. के नेतृत्व वाले आंदोलन ने एक केंद्र सरकार को बदल दिया और स्वतंत्रता के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपाय लागू किए। 1978 में ए.ए.एस.यू. आंदोलन ने सीमा पार से होने वाले प्रवास को नियंत्रित करने के लिए कानूनी प्रावधानों को प्रेरित किया। वास्तव में, यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि भारत के शासन में सभी प्रमुख परिवर्तन राजनीतिक दलों द्वारा संघर्ष और चुनावों के माध्यम से लाए गए थे।

असामान्य योग्यताएं : सी.जे.पी. पारंपरिक अर्थों में कोई राजनीतिक दल नहीं है। इसका जन्म एक व्यक्ति, अभिजीत दीपके की गुस्से भरी प्रतिक्रिया से हुआ था। जाहिर है, दीपके और उनके कुछ दोस्त एक उकसाने वाली प्रतीत होती टिप्पणी से बहुत आहत थे। दीपके ने एक मंच शुरू किया और पूछा ‘क्या होगा अगर सभी कॉकरोच एक साथ आ जाएं?’ उन्होंने घोषणा की कि कोई भी उस मंच में शामिल हो सकता है जो ‘बेरोजगार, आलसी, लगातार ऑनलाइन रहने वाला और पेशेवर रूप से बड़बड़ाने की क्षमता रखने वाला हो।’ जाहिर है, ऐसे कई छात्र और विद्वान हैं जो इन असामान्य योग्यताओं को पूरा करते हैं! ऐसे भी कई लोग हैं जो नौकरीपेशा हैं लेकिन लगातार ऑनलाइन रहते हैं और पेशेवर रूप से बड़बड़ा सकते हैं। इनमें कलाकार, शिक्षक, डॉक्टर, नर्स, वकील, व्यवसायी, पत्रकार, अन्य पेशेवर और कनिष्ठ सरकारी कर्मचारी जैसे सम्मानित पुरुष और महिलाएं शामिल हैं। इस मंच के पास एक संस्थापक-नेता, प्रवक्ता, साहस है। जहां तक ज्ञात है, कोई संगठन नहीं है, कोई सदस्यता नहीं है, कोई पंजीकरण नहीं है, नीतियों की कोई घोषणा नहीं है, या राजनीतिक दल की कोई अन्य विशेषता नहीं है। फिर भी, 35 दिन के विरोध प्रदर्शन के माध्यम से, सी.जे.पी. ने 2 कैबिनेट मंत्रियों को बातचीत के लिए मजबूर किया है, एक मंत्री का इस्तीफा लिया है, सरकार को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले वापस लेने के लिए मजबूर किया और सरकार से लिखित प्रतिबद्धताएं प्राप्त की हैं। यह अभूतपूर्व है।

नई घटना का संकेत : जैसा कि मैंने कहा, राजनीतिक दलों से परे और बाहर इस तरह के स्थान का पहला संकेत 2026 में तमिलनाडु में देखा गया था। जोसेफ विजय ने फरवरी 2024 में एक राजनीतिक दल (तमिलगा वेट्री कजगम या टी.वी.के.) की घोषणा की थी लेकिन इसने एक नियमित पार्टी का ‘रूप’ नहीं लिया। हर लिहाज से यह एक निराकार ‘फैंस एसोसिएशन’ बना रहा। ज्यादातर, फैंस एसोसिएशन के पदाधिकारी ही विभिन्न स्तरों पर टी.वी.के. के पदाधिकारी बन गए। टी.वी.के. के उम्मीदवारों का चयन पारंपरिक राजनीतिक ज्ञान को धता बताते हुए किया गया-जाति, धर्म, ङ्क्षलग, विरासत, धन आदि को नजरअंदाज करते हुए। 234 में से 200 से अधिक उम्मीदवारों के पास पैसा नहीं था और न ही उन्होंने खर्च किया। कई टी.वी.के. उम्मीदवार संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के लिए अजनबी थे और उनके पास बहुत कम बूथ एजैंट, पोलिंग एजैंट या काऊंटिंग एजैंट थे। 

विजय ने कुछ रोड शो किए और कम सभाओं में बात की। जाहिर है, मतदाताओं के लिए केवल ‘विजय’ और ‘सीटी’ का निशान मायने रखता था। इसका जादूगर सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम और यूट्यूब) था-विजय हर जगह दिखाई दे रहे थे और हर घर में उनकी आवाज सुनी जा रही थी। टी.वी.के. ने डी.एम.के. और ए.आई.डी.एम.के. की 2 जबरदस्त राजनीतिक और चुनावी मशीनों के खिलाफ 108 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की और 35 प्रतिशत वोट हासिल किए। किसी राजनीतिक दल, किसी नेता, किसी पत्रकार और किसी चुनाव विश्लेषक ने टी.वी.के. की जीत की भविष्यवाणी नहीं की थी। जब चुनाव परिणाम आए, तो इसे टी.वी.के. द्वारा उतना ही आश्चर्य से प्राप्त किया गया, जितना कि स्थापित राजनीतिक दलों द्वारा झटके के साथ। तमिलनाडु में राजनीतिक परिवर्तन उन नागरिकों द्वारा लाया गया जो राजनीतिक दलों से परे और बाहर के स्थान पर कब्जा कर रहे थे। तमिलनाडु के उदाहरण का पालन करते हुए, यह कल्पना से परे नहीं है कि परिवर्तन उन नागरिकों द्वारा लाया जा सकता है, जो एक-दूसरे को नहीं जानते होंगे, एक-दूसरे से बात नहीं कर सकते होंगे, किसी संगठन से संबंधित नहीं हो सकते होंगे लेकिन एक ही तरीके से वोट करेंगे और सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रतिनिधियों को चुनेंगे।


राजनीतिक दलों के लिए चुनौती : राजनीतिक दलों को तमिलनाडु में चुनाव परिणाम की घटना और जंतर-मंतर विरोध के परिणाम की बारीकी से जांच करनी चाहिए। संगठित राजनीतिक दल शायद अप्रचलित न हों लेकिन ‘हाई कमान’, ‘कार्यकारी समिति’, ‘महा सभा’, सदस्यता और पार्टी चुनाव जैसी पारंपरिक अवधारणाएं अप्रासंगिक हो सकती हैं। ‘वोट बैंक’ जैसा आपत्तिजनक वाक्यांश गायब हो सकता है।
मोबाइल, ट्विटर (अब एक्स), फेसबुक और इंस्टाग्राम के कारण नागरिकों ने चुप्पी तोड़ दी है। अब, ऐसा लगता है कि उन्होंने डर भी त्याग दिया है। खाकी या नीला, पुलिस, लाठी, आंसू गैस, बंदूकें और गिरफ्तारी-हिरासत अब युवाओं को डराते नहीं हैं और वृद्ध नागरिक भी इसका अनुसरण कर सकते हैं। मेरी कामना है कि राजनीतिक दलों से परे और बाहर का राजनीतिक स्थान बड़ा हो।
जेन-काी और अन्य प्रदर्शनकारियों के सामने आगे चुनौतीपूर्ण कार्य हैं :
-सबसे पहले, उन्हें विश्वविद्यालयों को मध्ययुगीनता और अंधविश्वास से बाहर निकालना होगा।
-उन्हें वर्दीधारी पुलिस, नैतिक पुलिसिंग और बजरंग दल जैसे ‘प्रवर्तकों’ के कठोर बल का सामना करना होगा।
-उन्हें विधायी नैतिकता और भेदभाव के खिलाफ लडऩा होगा।
-जेन-काी को स्थानीय राजस्व और पंजीकरण कार्यालयों, अस्पतालों, राशन की दुकानों, स्थानीय निकायों आदि में व्याप्त दमनकारी भ्रष्टाचार को रोकना होगा।
जंतर-मंतर के बाद, बेहतरी के लिए हर बदलाव संभव लगता है।-पी. चिदम्बरम

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