संपादकीय

एक थोपे युद्ध का अंत

दुनिया ने राहत की सांस महसूस की होगी! आर्थिक मंदी, ऊर्जा-खाद्य संकट और तबाही की भयावहता अब नहीं डराएगी। ईरान का 47 साल लंबा वैश्विक वनवास और पाबंदियां अब समाप्त होंगी। होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग से ईरान के 11 जहाज कच्चा तेल लेकर गुजरे। कतर की एलएनजी के टैंकर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के जहाज भी गुजरने लगे हैं। युद्ध से पहले जो होर्मुज था, उसका वही स्वरूप और रास्ता खुलने लगा है। अमरीका ने भी होर्मुज-ओमान खाड़ी में अपनी सैन्य नाकेबंदी हटा ली है। अमरीकी सेनाएं भी धीरे-धीरे लौट जाएंगी। यह अमरीका-ईरान के बीच समझौते के मसविदे पर हस्ताक्षर कर सहमति देने के बाद के माहौल, उल्लास, निष्कंटक आवाजाही के दृश्य हैं। अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप ने पेरिस के ‘वर्साय पैलेस’ में, जी-7 सम्मेलन के दौरान ही, समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए और फिर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने दस्तखत किए। इसी के साथ 110 दिन से जारी ईरान युद्ध समाप्त हो गया। बमबारी, मिसाइल, ड्रोन की भयानक आवाजें, विस्फोट, आग की लपटें और धुआं, अंतत: विध्वंस का दौर थम गया। मानवता जिंदा रह सकेगी, फिलहाल यह तय किया गया है। अब आगे के 60 दिन वार्ताओं के दौर जारी रहेंगे। अंतिम समाधान और सहमति तय की जाएगी, लेकिन यह निश्चित है कि राष्ट्रपति टं्रप अब युद्ध का आदेश नहीं देंगे। इस युद्ध ने उनकी कई गलतफहमियां दूर की हैं, युद्ध के बारे में वह आत्ममंथन कर रहे होंगे, शायद क्यूबा को भी बख्श देंगे और इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हरेक देश वेनेजुएला नहीं होता। यह युद्ध-समाप्ति बेहद त्रासद रही है, क्योंकि कुल 7500 से अधिक मौतें हुईं। पेंटागन और ईरान वॉर कॉस्ट टै्रकर के मुताबिक, दोनों देशों को करीब 162 लाख करोड़ रुपए का नुकसान झेलना पड़ा है। दुनिया के वे देश, जिनका युद्ध से प्रत्यक्ष संबंध नहीं था, उन्हें भी करीब 112 लाख करोड़ रुपए की चपत लगी।

खाड़ी देशों को करीब 194 अरब डॉलर का नुकसान ही झेलना नहीं पड़ा, बल्कि करीब 36 लाख नौकरियां/रोजगार खत्म हो गए। करीब 40 लाख लोग गरीबी-रेखा के नीचे जाने को विवश हुए। अमरीका-इजरायल ने ईरान पर करीब 2500 हमले किए और उसे खंडहर बना दिया। अकेले ईरान को करीब 30 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ और अमरीका को भी करीब 10.64 लाख करोड़ रुपए फूंकने पड़े। उसकी 10 लाख करोड़ रुपए की मिसाइलें और ड्रोन ईरान ने तबाह कर दिए। अमरीका के 15 सैनिक भी मारे गए और खाड़ी देशों में उसके सैन्य ठिकानों को भी नष्ट कर दिया गया है। ‘सुपर पॉवर’ की छवि, बेशक, खंडित हुई है। यह माना जा सकता है कि राष्ट्रपति टं्रप को इस समझौते के लिए तैयार होना पड़ा, कदाचित झुकना पड़ा। उन्होंने जी-7 बैठक के दौरान यह स्वीकार कर सभी को चौंका दिया कि चार सप्ताह में रिजर्व खत्म हो जाते। दुनिया भर के रिजर्व भी खत्म हो जाते। तेल-गैस खत्म हो जाते, तो दुनिया में अराजकता फैल जाती। महत्वपूर्ण और घातक हथियारों के भंडार भी खत्म हो रहे थे। उन्हें आगामी तीन सालों में भी भरा नहीं जा सकता। आर्थिक मंदी मंडरा कर डराने लगी थी, लिहाजा युद्ध समाप्त करने के अलावा, कोई और विकल्प नहीं था। बेशक ईरान के 3 परमाणु स्थल और 5 मिसाइल सेंटर क्षतिग्रस्त हुए। देश के सुपीम लीडर खामेनेई समेत 40 शीर्ष चेहरे और कमांडर आदि मारे गए, लेकिन ईरान बिखरा नहीं। हुकूमत के प्रति जुड़ा रहा और दुश्मन का कड़ा विरोध किया। बेशक ईरान का एक बड़ा हिस्सा ‘कब्रिस्तान-सा’ हो गया, फिर भी ईरान इस युद्ध का ‘सिकंदर’ बनकर उभरा है। उसकी नैतिक जीत हुई है, क्योंकि अमरीका-इजरायल के जो भी मकसद और मंसूबे थे, वे अधूरे रहे, धराशायी हो गए। ईरान का परमाणु कार्यक्रम यथावत है, संवर्धित यूरेनियम उसके पास सुरक्षित है, अलबत्ता उसने परमाणु हथियार न बनाने की जरूर घोषणा की है। यह बड़े खामेनेई का आदेश भी था। अब ईरान औसतन 15 लाख बैरल कच्चा तेल हररोज बेच सकेगा। भारत जैसे बड़े ग्राहक देश के साथ नया करार कर सकेगा। उसकी जब्त संपत्तियां भी जारी होंगी। अमरीका और खाड़ी देशों की कंपनियां पुनर्निर्माण के लिए 28 लाख करोड़ रुपए से अधिक, 300 अरब डॉलर, का फंड बनाएंगी। ईरान अब खाड़ी का नया ‘बॉस’ होगा, क्योंकि अमरीकी सुरक्षा से खाड़ी देशों का मोहभंग हो चुका है। बहरहाल फिर भी स्थायी शांति की दरकार है।

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