संपादकीय

बृजभूषण बरी, … अब न्याय की अगली परीक्षा हाईकोर्ट में

इसमें दोराय नहीं कि कोई निचली अदालत अगर अपने फैसले में किसी आरोपी को बरी कर दे, तो वह उसके लिए राहत की बात हो सकती है। इस लिहाज से देखें तो भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह फिलहाल इसे अपनी जीत मान सकते हैं कि दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें और एक अन्य अभियुक्त विनोद तोमर को महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में बरी कर दिया।

मगर कई बार अदालत में सबूतों की प्रस्तुति किसी मामले में फैसले का आधार बनती है और परिस्थितियों की जटिलता के बीच उसे कसौटी पर भी रखा जाता है। दरअसल, घटना की गंभीरता और पीड़ित पक्ष के आरोपों के बीच कानूनी प्रावधानों की तकनीकी बारीकियों का लाभ भले ही किसी आरोपी को मिल जाए, लेकिन न्याय की मांग का सफर कई बार लंबा भी हो सकता है। यही वजह है कि यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के बावजूद बृजभूषण शरण सिंह के बरी होने के बाद इस मामले में अन्य पीड़ितों ने उच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है।

सही है कि अदालत का फैसला कानूनी प्रावधानों की कसौटी के मुताबिक हो सकता है, लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत होगी कि इस मामले के सामने आने के बाद कई पीड़ित महिला खिलाड़ियों ने आगे आकर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की शिकायत की थी। यह साफ होना बाकी है कि एक गवाह के बयान बदल लेने की वजह से क्या बाकी सभी पीड़ित महिलाओं की शिकायत निराधार हो गई!

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फिर देश में कानूनी प्रावधानों और उनकी व्याख्याओं के बीच कैसे वास्तविक आरोप भी कमजोर पड़ जाते हैं, यह छिपा नहीं है। इसके अलावा, आरोपी की पृष्ठभूमि और राजनीतिक हैसियत अगर मजबूत है, तो उसके खिलाफ पहले ही किसी शिकायत का सामने आ पाना काफी मुश्किल होता है। अगर शिकायत दर्ज भी हो जाए, तो अदालत में उसके टिके रहने को लेकर हमेशा एक संशय बना रहता है।

इसमें आरोप और गवाहों के बयान में अस्थिरता एक पक्ष हो सकता है, लेकिन खासा राजनीतिक प्रभाव रखने वाले आरोपी के सामने एक कमजोर पीड़ित की स्थिति क्या हो सकती है, यह समझना मुश्किल नहीं है। एक सवाल यह भी है कि ठीक उत्पीड़न के समय ठोस सबूत इकट्ठा करने पर ध्यान देना किसी भी पीड़ित के लिए कितना संभव है।

इस मुकदमे में अदालत ने यौन उत्पीड़न की शिकायत करने वाली एक नाबालिग पीड़िता के बयान से पलटने और शिकायतकर्ताओं के विरोधाभासी बयानों के आधार पर अपना फैसला दिया। देश में यौन उत्पीड़न के मामलों में अव्वल तो पीड़ित महिला का सामने आ पाना ही अपने आप में महत्त्वपूर्ण होता है।

फिर कानूनी बारीकियों से लेकर आरोपी के रसूख और प्रभाव के बीच अगर वह अपने बयान से पलट जाती है, तो यह कई बार पूरी तरह अपनी मर्जी से नहीं होता और अदालतें भी इसकी तहों में जाने की पहल आमतौर पर नहीं करतीं। भारतीय न्याय व्यवस्था में यह एक आम स्थिति है, जिसमें पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा तथा उनका संरक्षण हमेशा ही एक कमजोर कड़ी साबित हुई है।

सही है कि अदालतों के फैसले ही किसी मामले की अंतिम स्थिति को तय करते हैं, लेकिन यह देखने की बात होगी कि महिला पहलवानों के यौन शोषण के मामले में अन्य पीड़ित अगर उच्च न्यायालय में अपील करती हैं, तो क्या निचली अदालत के फैसले, साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया की फिर से समीक्षा संभव हो सकेगी?

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