समझौता तय, लेकिन कब?

राष्ट्रपति टं्रप का बीती 14 जून को जन्मदिन था। वह 80 वर्ष के हो गए हैं। फिर भी उन्हें शुभकामनाएं देने और उनके लिए दुआएं करने का मन नहीं है। बेशक वह ‘सुपर पॉवर’ अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति हैं, लेकिन मानसिकता से वह एक शातिर, मुनाफाखोर व्यापारी हैं, वैश्विक आक्रांता हैं, कब्जेबाज हैं, सनकी और अस्थिर भी हैं तथा दुनिया को उपनिवेश मानने वाले नेता हैं। चूंकि अब ईरान युद्ध पर समझौते के आसार बार-बार उभर रहे हैं, लिहाजा माना जा सकता है कि युद्ध समाप्ति की ओर है। यह स्थिति करीब 110 दिन के बाद लग रही है। राष्ट्रपति टं्रप का अहंकार, उनकी अकड़ समझ में आती है, क्योंकि वह किसी भी देश को मिट्टी-मलबे में तबदील करने की सामरिक ताकत रखते हैं। ईरान का अधिकांश हिस्सा खंडहर हो चुका है। सरकारी ही सही, सार्वजनिक आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि युद्ध के दौरान ईरान में 3636 मौतें हो चुकी हैं, करीब 26,500 घायल हुए हैं, ईरान के 155 नौसेना जहाज और हजारों ड्रोन अमरीकी सेना ने तबाह कर दिए हैं, हजारों मिसाइल हमलों में खर्च हो चुकी हैं, ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई समेत 40-45 शीर्ष नेता और मंत्री, विभिन्न कमांडर, सलाहकार आदि एक ही हमले में मार दिए गए थे। एक अमरीकी डॉलर की कीमत 13.75 लाख रियाल से अधिक है, महंगाई दर 77 फीसदी को पार कर चुकी है, आईएमएफ के मुताबिक, ईरान की जीडीपी में 6 फीसदी से अधिक की गिरावट आ चुकी है। भुखमरी के पूरे आसार हैं, क्योंकि लोगों को ऋण लेकर अंडा, चिकन, भोजन का बंदोबस्त करना पड़ रहा है। वहां ‘ईएमआई पर भोजन’ के बिलबोर्ड लगे हैं।
ऐसे हालात के बावजूद ईरान समझौते को लेकर जिद और खोखला अहंकार दिखा रहा है। अद्भुत और आश्चर्य….! उसे सोचना चाहिए कि युद्ध के कारण दुनिया में आर्थिक मंदी, ऊर्जा और खाद्य-संकट के हालात बन रहे हैं। हैरानी की बात है कि ईरान का एक तबका सडक़ों पर, विदेश मंत्रालय के दफ्तर के सामने, विरोध-प्रदर्शन पर उतर आया है। ये सामूहिक नारे भी लगा रहे हैं कि समझौते के पैरोकारों-विदेश मंत्री अरागची और संसद स्पीकर कालीबाफ- को ‘मौत’ दी जाए। उन्होंने अमरीका के सामने सरेंडर किया है! ऐसा आभास होता है कि ईरान के कट्टरपंथी चेहरे फिलहाल युद्ध को समाप्त करने के पक्षधर नहीं हैं, लिहाजा वे ऐसे विरोध-प्रदर्शनों को भडक़ा रहे हैं! बहरहाल राष्ट्रपति टं्रप अपने जन्मदिन का तोहफा तो नहीं ले सके, क्योंकि ईरान समझौते की तारीख को अभी खारिज कर रहा है। अब नई तारीख 19 जून सामने आई है। खबर है कि उस दिन स्विट्जरलैंड में डील पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं। वैसे इसी दौरान प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी ‘रॉयटर्स’ ने ईरान के वरिष्ठ अधिकारी के सौजन्य से समझौते के कुछ बिंदु सार्वजनिक किए हैं। मसलन-ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा और न ही परमाणु अस्त्र हासिल करने की कोशिश करेगा।
ईरान धीरे-धीरे सवंर्धित यूरेनियम को कम करेगा। होर्मुज को खोला जाएगा, लेकिन अमरीका को पहले सैन्य नाकेबंदी हटानी होगी। अमरीका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा, बल्कि ईरान को कच्चा तेल निर्यात करने की छूट देगा। रॉयटर्स का यह भी दावा है कि अमरीका ईरान की 24-25 अरब डॉलर की जब्त संपत्तियों को जारी करेगा। समझौता होने के बाद 60 दिनों के अंतराल में अमरीका और ईरान आपस में बातचीत करेंगे और विवादों को आसान करने की कोशिश करेंगे। आश्चर्य है कि जिस अमरीका ने इजरायल के साथ मिल कर 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर हमला किया था और युद्ध थोपा था, उस इजरायल को समझौते और संवाद की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। हालांकि ईरान की प्रमुख मांग रही है कि लेबनान और गाजा में इजरायली हमले बंद कराए जाएं, लेकिन लगता है कि इजरायल ने अमरीका की बात माननी भी बंद कर दी है। बहरहाल यह समझौता अमरीका और शेष विश्व के हित में भी है, क्योंकि युद्ध में अमरीका का भी 2.4-3.3 लाख करोड़ रुपए का नुकसान आंका गया है। उसके लड़ाकू विमान, वायु रक्षा प्रणालियां, रडार, ड्रोन आदि भी ईरान ने तबाह किए हैं। खाड़ी देशों में अमरीका के सैन्य बेस भी विनष्ट किए गए हैं, लिहाजा अमरीका की ‘सुपर पॉवर’ वाली छवि सवालिया हुई है। विश्व को इस वक्त शांति और विकास की जरूरत है। इसके लिए सभी सक्षम देशों को दोनों पक्षों को समझा-बुझा कर शांति समझौते के लिए राजी करवाना चाहिए। अगर शांति होगी, तभी विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा सकता है।



