जरा हट के

क्या इंसान अमर हो सकता है? वैज्ञानिकों की रिसर्च से खुलासा, आदर्श स्थितियों में भी 146 से 194 साल ही है उम्र की सीमा

Human Maximum Age Limit: इंसान अमर होने का कितना भी इलाज ढूंढ ले, लेकिन ये नामुमकिन है. जानिए रूसी वैज्ञानिकों के नए गणितीय मॉडल ने उम्र की सीमा को लेकर क्या बड़ा खुलासा किया है. स्कोलटेक और AIRI के रिसर्चर्स का कहना है कि, अगर दुनिया से सारी बीमारियां खत्म भी हो जाएं, तब भी इंसान 146 से 194 साल से ज्यादा नहीं जी सकता. इसकी सबसे बड़ी वजह हमारे दिमाग और दिल की वो सेलस हैं, जो समय के साथ खुद को बदल नहीं पातीं. नई स्टडी ने साफ कर दिया है कि शरीर को कितना भी फिट रख लिया जाए, फिर भी एक समय के बाद सांसें थमना तय है. इंसानी शरीर की अपनी एक तय सीमा है, जिसे पार करना फिलहाल नामुमकिन नजर आता है.

अमर होना क्यों है नामुमकिन? (Why Humans Cannot Live Forever?)

स्कोलकोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी यानी स्कोलटेक (Skoltech) और आर्टिफिशिअल इंटेलिजेंस रिसर्च इंस्टीट्यूट (AIRI) के वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च को मिलकर पूरा किया है. उनका कहना है कि अगर हम कैंसर, दिल की बीमारी जैसी हर जानलेवा बीमारी का इलाज खोज लें, तब भी इंसान की उम्र करीब 156 साल के आसपास ही रहेगी. ज्यादा से ज्यादा कोई व्यक्ति 194 साल तक खींच सकता है. इसकी मुख्य वजह हमारे शरीर के अंदर जमा होने वाले सोमैटिक म्यूटेशन (Somatic Mutations) हैं.

डीएनए में होने वाले ये बदलाव लेते हैं जान (How Somatic Mutations Direct Human Lifespan)

अब आप सोच रहे होंगे कि, आखिर सोमैटिक म्यूटेशन है क्या? दरअसल, ये डीएनए में होने वाले वो छोटे छोटे अनचाहे बदलाव हैं जो उम्र बढ़ने के साथ शरीर में जमा होते रहते हैं. हमारी स्किन या लिवर के सेल तो नई बनती रहती हैं, जिससे वो लंबे समय तक खुद को बचा लेती हैं, लेकिन हमारे दिमाग के न्यूरॉन्स और दिल की मांसपेशियां एक बार बनने के बाद दोबारा डिवाइड नहीं होतीं. यही वजह है कि इन ऑर्गन में लोस लगातार बढ़ता जाता है और आखिर में शरीर काम करना बंद कर देता है.

फ्यूचर के इलाज के लिए कितनी जरूरी है ये स्टडी? (Why Is This Research So Important For Future Therapies?)

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस रिसर्च से हमें ये समझने में मदद मिलेगी कि एंटी-एजिंग रिसर्च में सबसे ज्यादा ध्यान किस चीज पर देना चाहिए. सिर्फ बीमारियों को रोकना काफी नहीं है, बल्कि दिल और दिमाग के सेलस को कमजोर होने से बचाना असली चैलेंज है. आने वाले समय में वैज्ञानिक इस मॉडल में माइटोकॉन्ड्रिया की खराबी और टेलोमेयर के छोटे होने जैसे कारणों को जोड़कर इंसानी उम्र पर और गहरा अध्ययन करेंगे.

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button