व्यापार

सही नहीं है यूपीआई पर कोई भी शुल्क

गौरतलब है कि हाल ही में संयुक्त राज्य अमरीका व्यापार प्रतिनिधि द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में भारत में यूपीआई लेन-देन के नि:शुल्क होने पर आपत्ति दर्ज की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि शून्य एमडीआर नीति, रूपे कार्ड का प्रमोशन आदि से हमें हानि हो रही है…

लोकसभा में 6 अगस्त 2026 को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 में संशोधन बिल पारित किया है, जिसके अनुसार अब यूपीआई एवं अन्य अधिसूचित इलैक्ट्रानिक भुगतानों पर बैंकों और अन्य पेमेंट प्रदात्ताओं पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाए जाने पर वैधानिक रोक समाप्त हो जाएगी। हालांकि सरकार ने यह कहा है कि उपभोक्ताओं पर इसका असर नहीं होगा और यूपीआई भुगतान देना और प्राप्त करना दोनों ही निशुल्क रहेंगे। जैसा कि बताया जा रहा है कि यूपीआई के माध्यम से 2000 रुपए तक के भुगतान तो नि:शुल्क रहेंगे ही, लेकिन 2000 रुपए से ऊपर के भुगतानों पर बैंकों और अन्य भुगतान प्रदात्ताओं पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट लगाया जा सकेगा, जो भुगतान प्राप्तकर्ता, यानी विक्रेता से वसूला जाएगा। हालांकि कितना शुल्क लगाया जाएगा, यह निश्चित नहीं है, लेकिन जिस प्रकार के प्रस्तावों पर चर्चा हो रही है, उनके अनुसार ऊंचे मूल्य के लेन-देन पर एमडीआर 0.25 से 0.5 प्रतिशत के बीच हो सकता है। हालांकि सरकार ने यह कहा है कि छोटे विक्रेताओं और उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई की सुविधा निशुल्क रहेगी।

क्या है सरकार का तर्क : सरकार द्वारा यूपीआई भुगतान के नियमों में इस बदलाव का जो कारण बताया जा रहा है, वो यह है कि अभी तक यूपीआई निशुल्क है, लेकिन इसकी लागत को किसी न किसी को तो वहन करना पड़ेगा। यूपीआई पर फीस लगाने के समर्थकों का कहना है कि बैंक और नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन आफ इंडिया (एनपीसीआई) और पेमेंट कंपनियां सर्वरों पर ही नहीं, साइबर सुरक्षा और विस्तार पर भी खर्च करती हंै, जिसे किसी को तो वहन करना ही पड़ेगा। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा कहते हैं कि यूपीआई को सुरक्षित एवं भरोसेमंद बनाए रखने के लिए किसी को तो भुगतान करना ही पड़ेगा।

पब्लिक गुड है यूपीआई : अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार कुछ ऐसी सेवाएं होती हैं जिनका इस्तेमाल गैर प्रतिद्वंद्वी यानी ‘नॉन-राइवल’ होता है, यानी किसी एक के इस्तेमाल से दूसरों के इस्तेमाल पर कोई बाधा नहीं आती, और ये बिना किसी रोक-टोक के सभी के लिए उपलब्ध होती हैं, और किसी को इसके इस्तेमाल से रोका नहीं जा सकता। ऐसी सेवा को ‘प्योर पब्लिक गुड’ यानी विशुद्ध सार्वजनिक वस्तु कहा जाता है। कभी-कभी, कुछ सेवाएं गैर प्रतिद्वंद्वी तो होती हैं, लेकिन उनमें लोगों को बाहर रखना मुमकिन होता है। ऐसी चीजों को पब्लिक गुड तो कहा जा सकता है, लेकिन ये ‘प्योर पब्लिक गुड’ नहीं होतीं। प्योर पब्लिक गुड के उदाहरण हैं- कानून-व्यवस्था, सुरक्षा, पार्क, स्ट्रीटलाइट और सडक़ें। यूपीआई पब्लिक गुड की दूसरी श्रेणी में आता है, जो प्रकृति से गैर प्रतिद्वंद्वी तो है, लेकिन कीमत वसूलने पर इससे अन्यों को वंचित किया जा सकता है (यानी कुछ लोगों को इससे बाहर रखा जा सकता है)। आम तौर पर, सार्वजनिक सेवाएं ऐसी होती हैं जो समाज के लिए फायदेमंद तो होती हैं, लेकिन उनमें निजी क्षेत्र का निवेश नहीं आता, भले ही सैद्धांतिक रूप से उन तक पहुंच को सीमित किया जा सकता हो। अगर सरकार ने यूपीआई को बनाया न किया होता, तो कोई भी निजी क्षेत्र की कंपनी इतना शानदार प्रोडक्ट नहीं बना पाती। सरकार पब्लिक गुड में इन्वेस्टमेंट करती है क्योंकि वे लोगों के लिए फायदेमंद होते हैं। यूपीआई भी ऐसा ही एक पब्लिक गुड है, जो प्रकृति में तो गैर प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन हां, इसमें वंचन मुमकिन है।

लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हमें इसके लिए फीस लेना शुरू कर देना चाहिए? ऐसे पब्लिक गुड पर फीस लेने का फैसला ‘हानि-लाभ विश्लेषण’ के आधार पर किया जाना चाहिए। आम तौर पर, हमें यह समझना चाहिए कि अगर लागत की तुलना में फायदे बहुत ज्यादा हैं और लागत बहुत ज्यादा नहीं है, तो इसे मुफ्त रखना ही सबसे अच्छा है। लंबे समय से भारत में लॉजिस्टिक लागत बहुत ऊंची रहती रही है, जिसके कारण हमारे उत्पाद दुनिया के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते थे। लेकिन पिछले एक दशक से ज्यादा समय में लॉजिस्टिक लागत में कम से कम एक प्रतिशत की महत्वपूर्ण कमी दर्ज की गई है। एनसीएएआर और डीपीआईआईटी के आंकड़ों के अनुसार यह लॉजिस्टिक लागत 2014 में जीडीपी का लगभग 9 प्रतिशत होती थी, जो अब घटकर 8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। लॉजिस्टिक लागत के घटने में यूपीआई का निशुल्क होना एक बड़ा कारण है। समझना होगा कि आज भारत में दुनिया के 49 प्रतिशत ऑनलाइन लेन-देन होते हैं, और जो निशुल्क हैं। यदि यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो यह भी पब्लिक गुड की श्रेणी में आता है। जिस प्रकार से सडक़ें, पार्क, स्ट्रीट लाइट, कानून व्यवस्था आदि जीवन को सुगम बनाती है, तो यूपीआई व्यवसाय को सुगम बनाती है। सरकार का दायित्व है कि व्यवसाय की सुगमता (ईज ऑफ डूईंग बिजनेस) सुनिश्चित करे। इसके लिए सरकार विभिन्न प्रकार के प्रयास भी कर रही है। यूपीआई इसमें काफी मदद कर रहा है। देश में सडक़ों के जाल, रेल सुविधा में बेहतरी और सरकार की नई योजनाएं, जैसे कॉरिडोर इत्यादि ने न केवल व्यवसाय को सुगम किया है, बल्कि उससे लॉजिस्टिक लागत में भी भारी कमी आ रही है।

कहीं सरकार अमरीका के दबाव में तो यह नहीं कर रही? : गौरतलब है कि हाल ही में संयुक्त राज्य अमरीका व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में भारत में यूपीआई लेन-देन के नि:शुल्क होने पर आपत्ति दर्ज की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि शून्य एमडीआर नीति, रूपे कार्ड का प्रमोशन, रूपे क्रेडिट कार्ड को यूपीआई के साथ लिंक करने, डाटा स्थानीयकरण नियम और एनपीसीआई द्वारा यूपीआई एप्लिकेशन कंपनियों पर 30 प्रतिशत बाजार भागीदारी की शर्त आदि अमरीकी कंपनियों के व्यवसाय के लिए बाधाएं डाल रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधेयक अमरीका के दबाव में पारित किया गया है, क्योंकि यूपीआई ने अमरीकी कार्ड कंपनियों वीजा और मास्टर कार्ड के व्यावसायिक मॉडल को प्रभावित या यूं कहें कि ध्वस्त कर दिया है। ये कंपनियां विक्रेताओं से लेन-देन की राशि का 1 से 3 प्रतिशत वसूलती हैं, लेकिन अब विक्रेताओं को क्यूआर कोड के माध्यम से बिना किसी लागत के भुगतान मिल जाता है। यही नहीं एनपीसीआई द्वारा शुरू किए गए रूपे कार्ड से यह प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई। क्योंकि रूपे कार्ड और यूपीआई भुगतान पर कोई एमडीआर नहीं है। अब हर विक्रेता अंतरराष्ट्रीय कार्डों की बजाय यूपीआई से ही भुगतान लेना चाहता है। कुछ समय पूर्व रूपे क्रेडिट कार्ड को भी यूपीआई से जोड़ देने के बाद इन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की चिंता और बढ़ गई है। गौरतलब है कि 2023 में रूपे क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी मात्र 3 प्रतिशत थी, जो अभी तक बढ़ते हुए 20 प्रतिशत हो चुका है, उनके द्वारा भुगतान तो 40 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं। इससे समझ में आता है कि अमरीका यूपीआई के निशुल्क होने से क्यों चिंतित है और वो क्यों चाहता है कि यूपीआई भुगतानों पर शुल्क लगाया जाए।

क्या सरकार को हो रहा है बहुत नुकसान : गौरतलब है कि यूपीआई इकोसिस्टम को चलाने में भारत सरकार वर्तमान में मात्र 2200 करोड़ रुपया खर्च कर रही है। जहां तक बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं की बात करें तो उनके द्वारा साइबर सुरक्षा और विस्तार के लिए जो खर्च करना पड़ता है, वो तो उनका ही काम है। यूपीआई तो उन्हें आसानी से लेनदेन करने में सुविधा ही देती है। बल्कि यूपीआई के कारण बैंकों की लागत में खासी कमी हुई है और उनके लाभ लगातार बढ़ रहे हैं। साथ ही साथ, बैंकों ने तो कभी एमडीआर लगाने की मांग भी नहीं की। बहरहाल, कहा जा सकता है कि यूपीआई पर फीस लगाने के कई नुकसान होंगे।-डा. अश्वनी महाजन

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