चुनौतियों के बावजूद आर्थिक साख बरकरार

इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, वैश्विक ऋण भुगतान व प्रबंधन आसान होगा और घरेलू बाजार में महंगाई को नियंत्रित रखना संभव हो सकेगा। इन विभिन्न आर्थिक अनुकूलताओं के बावजूद चालू वित्त वर्ष में भारत के सामने कई आर्थिक एवं वित्तीय चुनौतियां उभर कर दिखाई दे रही हैं…
हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजेंसी ‘फिच रेटिंग्स’ ने भारत की सावरेन रेटिंग को ‘बीबीबी माइनस’ पर स्थिर परिदृश्य के साथ यथावत रखा है। फिच ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी हलचलों और तेल बाजार के उतार-चढ़ाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई दीर्घकालिक या स्थायी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। हाल के वर्षों में भारत ने कई बड़े वैश्विक झटकों का सफलतापूर्वक सामना किया है और अपनी मजबूत घरेलू बाजार क्षमता के बल पर सकारात्मक आर्थिक वृद्धि बनाए रखी है। फिच के द्वारा भारत की रेटिंग तय करते समय नीतिगत विश्वसनीयता, बाहरी वित्तीय ढांचे और ऋण वहन करने की क्षमता का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। भारत के मामले में इन सभी मानकों पर सकारात्मक स्थिति देखने को मिली है। कहा गया है कि भारत की विकास संभावनाएं और बाहरी वित्तीय संरचना इसे अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक सुरक्षित और आकर्षक बनाती हैं। निरंतर सुधरती नीतिगत विश्वसनीयता और सुदृढ़ आर्थिक नीतियों ने देश की बाजार क्षमता को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया है। उच्च विकास दर के बल पर सरकार के कुल ऋण अनुपात को नीचे लाने में सफलता मिल रही है, जो वित्तीय साख को नई मजबूती प्रदान करता है। चालू वित्तीय वर्ष 2026- 27 के बजट में सरकार ने ऋण और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात 55.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो बीते वर्ष के 56.1 प्रतिशत की तुलना में बेहतर स्थिति को दर्शाता है। केंद्र सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य मार्च 2031 तक इस अनुपात को और घटाकर 50 प्रतिशत के स्तर पर लाना है। इस दिशा में उठाया गया हर कदम देश की वित्तीय स्थिति को अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ बनाएगा। उल्लेखनीय है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच की तरह कई प्रमुख साख निर्धारण संस्थाओं ने भारत की आर्थिक साख को निवेश योग्य श्रेणी में बनाए रखा है।
एसएंडपी ग्लोबल ने भारत की दीर्घकालिक साख को पॉजिटिव दृष्टिकोण के साथ ‘बीबीबी माइनस’ की श्रेणी में रखा है। इसके पीछे मुख्य आधार भारत का शानदार आर्थिक प्रदर्शन और सरकार की सुदृढ़ नीतिगत दिशा है। मूडीज रेटिंग्स ने भारत की साख को स्थिर दृष्टिकोण के साथ ‘बीएए3’ के स्तर पर रखा है, जो सुरक्षित निवेश श्रेणी का परिचायक है। इन साख निर्धारणों के मूल में भारत का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, घरेलू मांग में जारी तेजी और संतुलित बैंकिंग प्रणाली है। हालांकि, सरकारी कर्ज का ऊंचा स्तर और राजकोषीय घाटा अभी भी साख में और अधिक सुधार के मार्ग में प्रमुख रुकावट बने हुए हैं, जिन पर निरंतर बजटीय अनुशासन के माध्यम से ध्यान दिया जा रहा है। नि:संदेह जिस तरह पश्चिम एशिया के जारी तनाव और वैश्विक व्यापारिक गतिरोधों के बावजूद भारत की आर्थिक साख अडिग बनी हुई है, उसी तरह भारत की विकास दर भी सराहनीय स्तर पर बनी हुई है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठनों के अनुसार चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर 6.4 प्रतिशत से 6.7 प्रतिशत के बीच रहने की पूरी संभावना है। भारतीय रिजर्व बैंक ने मजबूत घरेलू संकेतों के आधार पर विकास दर के अपने अनुमान को बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इसे 6.4 प्रतिशत पर आकलित किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात की गति धीमी होने के बावजूद, भारत की विशाल आंतरिक मांग, स्थिर निजी खपत और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में बढ़ता उपभोग अर्थव्यवस्था की वास्तविक शक्ति बने हुए हैं। देश का सेवा क्षेत्र और औद्योगिक गतिविधियां लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, जिससे मुद्रास्फीति के दबाव और बाहरी अनिश्चितताओं को बेअसर करने में मदद मिल रही है। भारत की विकास दर को गति देने में तीन प्रमुख कारकों की मुख्य भूमिका रही है। केंद्रीय बैंक द्वारा नीतिगत दरों को स्थिर और संतुलित रखने से व्यापारिक गतिविधियों और निजी निवेश को बड़ा प्रोत्साहन मिला है।
सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे और पूंजीगत विकास पर लगातार किए जा रहे बड़े खर्च ने आर्थिक पहिये को थमने नहीं दिया है। विशाल घरेलू उपभोक्ता आधार के कारण वैश्विक उतार-चढ़ाव का प्रभाव भारतीय बाजारों पर सीमित रहा है। भारत आज दुनिया भर के निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि भारत विदेशी पूंजी आकर्षित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। करीब दो माह पूर्व 8 जून से लागू भारतीय रिजर्व बैंक की नई रियायती स्वैप सुविधा को वैश्विक स्तर पर व्यापक समर्थन मिला है। 31 जुलाई तक देश के बैंकों ने इस योजना के माध्यम से रिकॉर्ड 41 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटा ली है। इस योजना ने महज दो महीने से भी कम समय में वर्ष 2013 का (34 अरब डॉलर फंड जुटाने का) रिकॉर्ड तोड़ दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक की रियायती स्वैप सुविधा का मुख्य उद्देश्य देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाना और भुगतान संतुलन को मजबूत करना है। इस योजना के तहत बैंकों को जिन तीन प्रमुख माध्यमों से विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद मिलती है उनमें प्रमुख रूप से विदेशों से ली जाने वाली जमा योजनाएं, विदेशी मुद्रा ऋण और बाहरी वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) शामिल हैं। विदेशी जमाओं के लिए यह सुविधा 30 सितंबर तक और अन्य ऋण माध्यमों के लिए 31 दिसंबर तक उपलब्ध कराई गई है। हाल ही में प्रकाशित ‘एसबीआई रिसर्च’ की रिपोर्ट के अनुसार, स्वैप योजना की समयावधि समाप्त होने तक कुल विदेशी फंड प्रवाह 80 से 85 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। साथ ही इस समय भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की वापसी के स्पष्ट संकेत देखने को मिल रहे हैं।
लंबे समय तक बिकवाली के बाद विदेशी निवेशक एक बार फिर भारत जैसे स्थिर और सुरक्षित बाजारों को प्राथमिकता दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि 14 अगस्त तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढक़र 716 अरब डॉलर से अधिक के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। यह विशाल विदेशी मुद्रा कोष वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है तथा भविष्य के आयात और विदेशी ऋण के प्रबंधन में देश की वित्तीय स्थिरता को और अधिक सुदृढ़ बनाता है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, वैश्विक ऋण भुगतान व प्रबंधन आसान होगा और घरेलू बाजार में महंगाई को नियंत्रित रखना संभव हो सकेगा। इन विभिन्न आर्थिक अनुकूलताओं के बावजूद चालू वित्त वर्ष में भारत के सामने कई आर्थिक एवं वित्तीय चुनौतियां उभर कर दिखाई दे रही हैं। भारत के सामने वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और लगभग 55.6 प्रतिशत का कर्ज-जीडीपी अनुपात प्रमुख चुनौतियां हैं। इन सब के साथ-साथ देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और बढ़ती मिलावटखोरी जैसी आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों पर भी नियंत्रण किया जाना होगा। ऐसा किए जाने पर ही देश की सावरेन रेटिंग और विकास दर को बढ़ाया जा सकेगा। साथ ही 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाने के लक्ष्य के मद्देनजर देश की अर्थव्यवस्था को 30 से 35 ट्रिलियन डॉलर और प्रति व्यक्ति आय को 18000 डॉलर तक बढ़ाने के लिए लगातार करीब 9 प्रतिशत विकास दर के साथ आगे बढऩे की संभावनाएं मु_ी में ली जा सकेंगी।-डा. जयंती लाल भंडारी



