कौन लिख रहा है स्कूली बच्चों के प्रदर्शन की अदृश्य पटकथा?

सुधीर जे कुमार
हम भी कभी जेन-अल्फा थे। हमारे जमाने के स्कूल तो बाबा-आदम के युग की ‘सुविधाओं’ वाले थे। बरसात में टपकती छतें, टूटा-फूटा फर्नीचर, न कंप्यूटर, न ढंग की प्रयोगशाला और न साफ-सुथरे टॉयलेट। स्मार्ट क्लासेज क्या होती हैं, हम जानते भी नहीं थे।
कुछ था तो बस गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और पिटाई के तौर पर नियमित मिलने वाला आशीर्वाद। फिर भी हम अपने स्कूल की समस्याओं को सड़क पर लाने के बजाय अपने हेडमास्टर पर भरोसा करते थे, और हमारी सुनवाई भी होती थी।
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इसके उलट आज उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की तस्वीर में आमूल-चूल परिवर्तन दिखाई देता है। ऑपरेशन कायाकल्प ने इन स्कूलों को शिक्षा व सुविधाओं के स्तर पर प्राइवेट स्कूलों की टक्कर में खड़ा कर दिया है। कुछ स्थानों पर अवश्य दिक्कतें हो सकती हैं, लेकिन उनका समाधान अपने पैरेंट्स को बताकर स्कूल प्रबंधन से कराने का प्रयास करने के बजाय बच्चों का सीधे सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करना कुछ और ही कहानी कह रहा है।
सामान्यतः स्कूली जीवन का दायरा कक्षाओं, खेल के मैदानों, परीक्षाओं और गृहकार्य तक ही सीमित होता है। यदि बच्चों को स्कूल प्रशासन या व्यवस्था से कोई शिकायत होती भी है, तो उसका समाधान अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम), प्रधानाचार्य को दिए गए प्रार्थना पत्र या अभिभावकों के हस्तक्षेप से हो जाता है।
स्कूली बच्चे अमूमन अपनी समस्याओं को लेकर नारेबाजी करते हुए सड़कों पर नहीं उतरते, न ही वे सीधे ज़िलाधिकारी जैसे शीर्ष अधिकारियों को मौके पर बुलाने की हठ करते हैं। लेकिन हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में जिस तरह से नाबालिग स्कूली बच्चों का सड़कों पर आना, विरोध प्रदर्शन करना और प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर बुलाने की मांग करना बेहद असामान्य है। यह स्थिति न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि किसी गहरी राजनीतिक साजिश का इशारा करती है।
अस्वाभाविक विरोध प्रदर्शन और बदलता ढर्रा
नाबालिग बच्चों का संगठित होकर सड़क जाम करना, बैनर-पोस्टर लेकर नारेबाजी करना और परिपक्व आंदोलनकारियों की तर्ज पर मांगें रखना किसी भी दृष्टि से सामान्य व्यवहार नहीं है। 12 से 16 वर्ष की आयु के बच्चों में इतनी प्रशासनिक समझ या रणनीतिक क्षमता नहीं होती कि वे सीधे ज़िला स्तर के सबसे बड़े अधिकारी की उपस्थिति की मांग पर अड़ जाएं।
जब बच्चे कहते हैं कि “जब तक डीएम साहब खुद नहीं आएंगे, हम रास्ता नहीं छोड़ेंगे,” तो यह भाषा उनकी अपनी नहीं प्रतीत होती। यह किसी मंझे हुए आंदोलनकारी या परदे के पीछे बैठे रणनीतिकार की सिखाई गई भाषा लगती है। जाहिर है कि कोई परदे के पीछे से इन बच्चों को कठपुतलियों की तरह नचा रहा है।
मासूमियत का इस्तेमाल और ‘ह्यूमन शील्ड’ की राजनीति
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और संवेदनशील राज्य में मासूम बच्चों को विरोध प्रदर्शनों के अग्रिम मोर्चे पर खड़ा करना एक खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है। इसके पीछे दो मुख्य उद्देश्य हो सकते हैं। पहला सहानुभूति और प्रशासनिक दबाव। जब सड़कों पर छोटे बच्चे बैठते हैं, तो पुलिस और प्रशासन के हाथ बंध जाते हैं। पुलिस न तो बल प्रयोग कर सकती है और न ही कड़ा रुख अपना सकती है।
इसे एक रणनीतिक ‘ह्यूमन शील्ड’ (मानव ढाल) की तरह इस्तेमाल किया जाता है, ताकि प्रशासन पर नैतिक दबाव बनाया जा सके। दूसरा मीडिया और नैरेटिव का खेल। बच्चों के आंसुओं, उनकी नारेबाजी और सड़क पर बैठने के दृश्यों को मीडिया और सोशल मीडिया पर भुनाना बेहद आसान होता है। इससे राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की छवि को तुरंत नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
साजिश की आशंका की ठोस वजहें
यदि यह प्रदर्शन केवल स्कूल की स्थानीय समस्याओं (जैसे फीस वृद्धि, शिक्षकों की कमी या बुनियादी ढांचे से जुड़ी दिक्कतें) तक सीमित होते, तो इनका स्वरूप भी स्थानीय होता। लेकिन जिस तरह से इन प्रदर्शनों में एक समान पैटर्न, अचानक भीड़ का जुटना, छपे हुए पोस्टरों का प्रयोग और सोशल मीडिया पर त्वरित कवरेज देखने को मिलती है, उससे स्वतःस्फूर्त आंदोलन का तर्क खारिज हो जाता है।
इसके पीछे कई निहित स्वार्थ हो सकते हैं। कई बार स्कूल प्रबंधनों, ट्रस्टों या स्थानीय राजनीति में वर्चस्व की लड़ाई के लिए बच्चों को मोहरा बनाया जाता है।
लेकिन, उत्तर प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनाव को देखते इसकी आशंका सबसे ज्यादा है कि यह शासन-प्रशासन को अस्थिर करने का सुनियोजित लेकिन ढका-छिपा राजनीतिक प्रयास है। यह ‘चित भी मेरी-पट भी मेरी’ जैसा हमला है। यानी, इन विरोध प्रदर्शनों से नैरेटिव बनेगा कि सरकार बेसिक स्कूलों व भावी पीढ़ी की कोई चिंता नहीं है। और, यदि प्रशासन सड़क जाम या प्रदर्शन कर रहे बच्चों के खिलाफ बल-प्रयोग करेगा तो प्रतिक्रिया में उत्तेजित अभिभावक भी आंदोलन में कूद पड़ेंगे।
बचपन और शिक्षा पर पड़ता प्रतिकूल प्रभाव
स्कूली बस्तों के पीछे छिपकर सरकार पर हमला करने वाले लोग अपने स्वार्थ में इतने अंधे हो गए हैं कि इस पूरी कवायद में वे सबसे बड़ा नुकसान उन मासूम बच्चों का कर रहे हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए अपनी कक्षाओं में होना चाहिए था।
जब बच्चों को कम उम्र में ही विरोध प्रदर्शनों, चक्का-जाम और प्रशासनिक टकराव का हिस्सा बनाया जाता है, तो उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है। वे अनजाने में कानून को ठेंगा दिखाने की प्रवृत्ति और उग्रता का शिकार होने लगते हैं, जो उनके भविष्य के लिए बेहद घातक है।
जांच और कड़े कदमों की आवश्यकता
उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य पुलिस प्रशासन को इस मामले को केवल एक साधारण छात्र आंदोलन मानकर खारिज नहीं करना चाहिए। इस बात की गहन और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कि इन बच्चों के पीछे कौन से संगठन, राजनीतिक तत्व या व्यक्ति सक्रिय हैं? प्रदर्शनों के लिए संसाधन (बैनर, लाउडस्पीकर, परिवहन) कौन उपलब्ध करा रहा है? क्या बच्चों को डरा-धमका कर या बहला-फुसला कर सड़कों पर लाया जा रहा है?
यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि बच्चों का इस्तेमाल किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत एजेंडे को साधने के लिए किया जा रहा है, तो ऐसे तत्वों पर बाल संरक्षण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराओं के तहत सख्त से सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
लोकतंत्र में अपनी मांगों को उठाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसके लिए मासूम स्कूली बच्चों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश में स्कूली बच्चों के इन असामान्य प्रदर्शनों के पीछे छिपे ‘सूत्रधारों’ का बेनकाब होना बेहद जरूरी है, ताकि प्रदेश के बच्चों का बचपन, उनकी शिक्षा और कानून-व्यवस्था सुरक्षित रह सके।



