राजनीति

क्या ‘दिमागी नक्सलवाद’ ज्यादा खतरनाक है?

हिंसक अराजकता और संविधान के विरोध को बौद्धिक समर्थन देने वाले ‘दिमागी नक्सल’ होते हैं। 15 अगस्त 2026 को अपने 12वें भाषण में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के नागरिकों से दिमागी नक्सलवाद से बचने की अपील की। दिमागी नक्सल आम नक्सलियों की तरह जंगल में हथियार लेकर नहीं घूमते बल्कि ये हमारे आस-पड़ोस में ही रहकर, लोगों को संविधान, सरकार और समाज के प्रति भड़काते हैं। ये लोगों को अपनी बौद्धिक क्षमता का प्रयोग करके अपनी बातों के जाल में फंसाकर उन्हें भ्रमित करते हैं। इस शब्द का उपयोग उन लोगों के लिए किया जाता है जो सीधे हथियार नहीं उठाते, बल्कि वामपंथी उग्रवाद की विचारधारा का समर्थन करते हैं। सरकार और समर्थकों का मानना है कि ये लोग जटिल नैरेटिव घड़कर युवाओं को गुमराह करते हैं।  चूंकि यह एक वैचारिक स्रोत है, इसलिए ज्यादा खतरनाक भी है। 

विचार शाश्वत  होते हैं। व्यक्ति समाप्त हो जाते हैं। विचारों में पुन: व्यक्ति निर्माण की क्षमता होती है। ये सकारात्मक और  नकारात्मक दोनों प्रकार के व्यक्ति और संगठनों को जन्म दे सकते हैं। वामपंथी आतंकवाद, को नक्सलवाद का नाम दिया गया है। एक राज्य और समाज के विरुद्ध छेड़ा गया अराजक विद्रोह है, जिसकी कुछ राजनीतिक मांगें और मान्यताएं भी हैं। इसकी कार्य पद्धति भी आतंकवादी संगठनों जैसी ही है। नक्सलवाद का बीजारोपण लोगों के दिमाग में सबसे पहले किया जाता है। मार्च 2026 को लक्ष्य बनाकर गृहमंत्री अमित शाह ने जंगली नक्सलवाद की कमर तोड़ दी, अब वह लगभग समाप्त हो गया है। लेकिन दिमागी नक्सल वे रक्तबीज हैं जो फिर से नए हाथों में बंदूक थमा देंगे। 

दिमागी नक्सल ‘टूलकिट’ :  नक्सली आतंकवाद दोमुंहे सांप की तरह  है। जिसका एक सिर तो जंगलों में रहकर  राज्य, संविधान, सरकार और समाज के विरुद्ध सशस्त्र हिंसा में लिप्त होता है, तो दूसरा सिर शहरी  समाज में घुल-मिल जाता है। वे आम जीवन जीते हुए, ज्यादातर सरकारी खजाने से वेतन, अनुदान या अन्य प्रकार का मानधन लेकर  बड़ी मौज का जीवन जीते हैं। ये ‘व्हाइट कॉलर’ रोजगार को अपना लक्ष्य बनाते हैं। इन्हें आप डॉक्टर, वकील, शिक्षक, पत्रकार, जज, एन.जी.ओ. संचालक और कार्यकत्र्ता, वामपंथी राजनीतिक झुकाव वाले नेता जैसे किसी भी रूप में  छुपकर  नक्सलियों को बौद्धिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय सहायता, सूचना और नैटवर्क उपलब्ध करवाते हैं। चूंकि ये प्रत्यक्ष सशरीर नक्सलवाद में शामिल नहीं होते, इसलिए ये अपने दिमाग में हिंसा, हत्या, षड्यंत्र, बौद्धिक स्वीकृति निर्माण करने का कार्य करते रहते हैं। ये बड़ी होशियारी से लोगों की भावनाओं को तोड़ कर उन्हें  नाटक, कविता, कहानी,  चर्चा मंडलों,  गोष्ठियों इत्यादि कला और बौद्धिक माध्यमों से आकर्षित करते हैं। चूंकि उपरोक्त समाज का अभिन्न अंग हैं तो आम जन को इसमें कोई समस्या  नहीं दिखती। इसी को दिमागी नक्सलवाद कहा जाता है। ये जंगल में लड़ रहे नक्सली से ज्यादा खतरनाक हैं। 

भ्रष्ट और बेईमान तंत्र का योगदान: इस बात को नकारना नहीं है कि अभी तक हमारी सरकारों ने समाज को शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने में सफलता नहीं पाई है। मुख्यधारा की लोकतांत्रिक राजनीति ने सत्ता का दुरुपयोग करके गरीब, किसान, मजदूर, वनवासी समुदायों के साथ बड़ा अन्याय किया है। प्रशासन तंत्र उनके रक्षक कम, भक्षक अधिक हैं। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा लोकतंत्र आमजन के लिए बेमानी साबित होता है। राजनीतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य वोट पाकर सत्ता पाना भर रह जाने से लोकतंत्र के विकास का फल कुछ धनी, उद्योगपतियों और सत्ताधारी लोगों तक सीमित रह जाता है। यह भी उतना ही खतरनाक है, जितनी नक्सल हिंसा। 

देश में 79 वर्षों की आजादी के बाद भी भूख, भय, भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद इस तरह  हावी है  कि आम गरीब, दलित, आदिवासी  आजादी  को स्वतंत्रता और संविधान दोनों  ही निरर्थक लगते हैं। उसकी इसी निराशा का लाभ उठाते हुए, नक्सलवादी आतंकी संगठन इन्हें त्वरित न्याय के लिए उकसाते हैं। लोगों (खासकर युवाओं)  का ‘ब्रेनवॉश’  करके उन्हें हथियार उठाने को प्रेरित करते हैं। यह काम करने वाला बुद्धिजीवी वर्ग है, जो शहरी भागों में रहता है। इसे ‘अर्बन नक्सल’ कहा जाता है। 

नक्सली उद्देश्य: इनका उद्देश्य नीतियों को प्रभावित करना और देश की आर्थिक प्रगति में बाधा डालना बताया  गया है। इसके माध्यम से वे राष्ट्र विरोधी और समाज विनाशक शक्तियों के लिए समर्थन और संसाधन दोनों जुटाते हैं। कोई भी देश या समाज पूरी तरह दुरुस्त नहीं होता। उनमें कमियां रहती हैं, या समय के साथ कई चीजें अप्रासंगिक होकर बदलाव की मांग करती हैं। उसका समाधान भारत की संवैधानिक व्यवस्था और समाज में उपलब्ध है। लेकिन ये आधी-अधूरी बातों, अर्धसत्य भरे  विश्लेषणों से लोगों को दिग्भ्रमित करके उन्हें हिंसा और अराजकता के लिए भड़काते हैं। मजेदार बात यह है कि ये स्वयं सरकारी खर्चों और समाज के संसाधनों का प्रयोग करके ऐशो-आराम से जीते हैं। इनके बच्चे शायद ही इस प्रकार की बातों में शामिल होते हैं। इसलिए आम जनता  को  इनसे सतर्क रहने की जरूरत है। 
दिमागी नक्सल अपने  जहरीले एजैंडे को लागू करने  के लिए लोगों से वैचारिक समर्थन की अपील करते हैं। इसे भी तय लक्ष्य के साथ समाप्त करना होगा। 

दिमागी नक्सलवाद मानव शरीर में कैंसर सैल की तरह मुखौटा लगाकर समाज और सरकारों को  धोखे में  रखकर धीरे-धीरे समाप्त करके एक दिन मार देता है। सिर्फ जंगल के बंदूकधारी नक्सली के सरैंडर या उन्मूलन से वामपंथी आतंकवाद समाप्त नहीं होगा। इसे एक वैचारिक युद्ध के स्तर पर भी लड़ा जाना उतना ही आवश्यक है। बस एक बात की सावधानी रहे, कि इसकी आड़ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकारों और राजनेताओं की आलोचना, सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठती आवाजों के दमन का विचार भी न बनने दें।-रवि रमेशचंद्र (जे.एन.यू.) 

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