संपादकीय

क्या दुनिया अब ट्रंप की बातों पर भरोसा कर सकती है?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आए दिन कोई न कोई ऐसा बयान देते हैं, जिसके बाद कई स्तर पर उथल-पुथल हो जाती है। हालांकि आमतौर पर कुछ ही समय के बाद वे या तो अपनी बात से उलट कुछ नया कह देते हैं या फिर उसे वापस ले लेते हैं। विडंबना यह है कि वैश्विक कद के मद्देनजर ट्रंप के बयानों को बिल्कुल बेमानी मान लेना भी संभव नहीं होता और उनके विचारों को स्थिर मानना भी मुश्किल होता है।

दरअसल, कई बार बेहद हड़बड़ी में की गई उनकी टिप्पणियों की वजह से ऐसी स्थितियां पैदा हुईं, जिनका वैश्विक स्तर पर व्यापक असर हुआ, लेकिन वे खुद अपनी बातों को लेकर गंभीर नहीं दिखे। मसलन, करीब दो महीने पहले जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत नाकाम हुई थी, तब ट्रंप ने युद्ध की आग ज्यादा भड़कने को लेकर लगातार कई धमकियां दी थीं।

इसके बाद शेयर बाजार में 4500 से ज्यादा अंकों की तेज गिरावट दर्ज की गई थी। मगर जब भी वे हमलों के धीमा पड़ने या बातचीत को लेकर सकारात्मक बयान देते हैं, तो उसके बाद शेयर बाजार में भारी उछाल देखा जाता है।

इसके अलावा, पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की वजह से दुनिया के ज्यादातर देशों की आपूर्ति शृंखला बाधित है और वे भी ट्रंप के रुख को लेकर फिक्रमंद रहते हैं। ट्रंप जब कहते हैं कि युद्ध खत्म करने या विराम को लेकर सहमति बन सकती है, तो उससे शेयर बाजार में राहत के साथ-साथ प्रभावित देशों के भीतर शांति और स्थिरता की उम्मीद पैदा हो जाती है। मगर इससे बेखबर ट्रंप अगले ही दिन इसके उलट या भ्रम पैदा करने वाला कोई और बयान दे देते हैं।

गौरतलब है कि गुरुवार को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी की कि बहुत जल्द ईरान के तेल-गैस उद्योगों और खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लिया जाएगा और इसके लिए अमेरिका आज रात ईरान पर व्यापक पैमाने पर हमला करेगा। जाहिर है, इसके बाद युद्ध के और जटिल शक्ल अख्तियार करने को लेकर व्यापक आशंका पैदा हुई। मगर इसके कुछ ही घंटे बाद उन्होंने कहा कि ईरान के साथ बातचीत आगे बढ़ रही है और इस वजह से उस पर बमबारी रद्द कर दी गई है।

यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है, बल्कि जब से ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल ने साझा हमला किया, तब से वे कई बार इसी तरह के बयान दे चुके हैं और उससे पलट चुके हैं।

यह समझना मुश्किल है कि अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी जिस युद्ध की वजह से न केवल इन देशों के नागरिक, बल्कि कई अन्य देश भी बुरी तरह प्रभावित हैं और व्यापक ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं, उसके बारे में ट्रंप इतने हल्के अंदाज में कैसे कोई भी बयान दे देते हैं। उनके अगंभीर रवैये की वजह से कई बार ऐसे हालात बन जाते हैं, जिनका कुछ देशों की आर्थिक स्थिति पर बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अफसोस की बात यह है कि जल्दबाजी भरे बयानों और उनमें स्थिरता न रहने के कारण उनकी विश्वसनीयता में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। वे व्यापार से लेकर कूटनीति तक के मामले में भारत को अपना सहयोगी बताने में पीछे नहीं रहते, लेकिन भारतीय नाविकों वाले जहाजों को निशाना बनाने में अमेरिका को कोई हिचक नहीं हुई। हालांकि भारत की तीखी आपत्ति के बाद ट्रंप ने आरोपों का रुख ईरान की ओर मोड़ने की कोशिश की।

सवाल है कि क्या युद्ध को खत्म करने और वैश्विक शांति के लिए ट्रंप किसी स्पष्ट तथा स्थिर नीति के तहत अपने कदम आगे नहीं बढ़ा सकते, जिससे उनकी विश्वसनीयता भी मजबूत हो सके?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को अचानक बड़ा दावा करते हुए कहा कि ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले रद्द कर दिए गए हैं। ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में एक समझौते पर सहमति बन गई है और अब दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। यह बयान ऐसे समय आया जब सिर्फ कुछ घंटे पहले ही डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर और भी भारी बमबारी करने और उसके तेल निर्यात केंद्र खार्ग आइलैंड पर नियंत्रण की बात कही थी।

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