राजनीति

‘स्ट्रीट’ पर हैं ममता, लेकिन ‘फाइटर’ क्यों कमजोर पड़ गया?

ममता बनर्जी की छवि स्ट्रीट फाइटर की रही है। एक ऐसी जुझारू नेता, जिसने पहले वामपंथियों के शासन का अंत किया और फिर बीजेपी को भी कई सालों तक बंगाल की राजनीति से दूर रखा।

लेकिन ये बात अब पुरानी हो गई है। बंगाल में बीजेपी की सरकार है। प्रचंड जनादेश मिला है। टीएमसी में भगदड़ मची हुई है। पार्टी टूटने का खतरा मंडरा रहा है। नेता बागी हो चुके हैं। 20 के करीब सांसद एनडीए के साथ जाने की बात कर रहे हैं। और ममता बनर्जी अकेली होती दिखाई दे रही हैं।

किसने सोचा था कि जो टीएमसी हमेशा से ही ममता केंद्रित रही, वो अचानक से उन्हीं को चुनौती देने का काम करेगी। ये बात भी हजम करना मुश्किल है कि जो नेता लगातार ममता के पीछे मजबूती से खड़े थे, ममता का नाम पूरे दिन जपते थे, उन्हीं को अपना सबसे बड़ा नेता मानते थे, आखिर एक-सवा महीने में ऐसा क्या हो गया कि वही ममता बनर्जी आंखों में खटकने लगीं।

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असल में टीएमसी के इन नेताओं का यही रवैया बताने के लिए काफी है कि भारतीय राजनीति में यही सबसे बड़ा नियम है। कोई नेता भी तभी तक नेता बना रहता है, जब तक वो जीत रहा होता है। जनता का उस पर विश्वास होता है। लेकिन जैसे ही वो विश्वास डगमगाता है, सब कुछ एक झटके में बदल जाता है।

2011 से लेकर 2026 तक ममता बनर्जी को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। स्ट्रीट फाइटर वाली उनकी छवि बहुत मजबूत थी। पार्टी भी उनके साथ इसलिए खड़ी थी क्योंकि जनता का विश्वास साथ चल रहा था। लेकिन 2021 में नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी से हारना और फिर 2026 में भवानीपुर से भी हार जाना। ये झटका सिर्फ ममता बनर्जी के लिए नहीं था, बल्कि पार्टी के नेताओं को भी संदेश चला गया। दीदी बदल गई हैं। दीदी का कद कमजोर हुआ है। अब वो दौर नहीं रहा, जब उन्हें कोई चुनौती देने वाला नहीं था। अब नए विकल्प खुलने शुरू हो गए हैं। और राजनीति में तो जहां विकल्प होते हैं, वहीं से नए अवसर भी पैदा होते हैं। एक बार फिर यही बात सच साबित होती दिख रही है।

टीएमसी के बागी नए अवसर तलाश रहे हैं। टीएमसी के कुछ नेताओं की अवसरवादी सोच ने ममता की फाइटर छवि को अंदर तक चोट पहुंचाई है। और इसमें काफी हद तक बीजेपी का भी हाथ है। तो ये भी कह सकते हैं कि बीजेपी ने टीएमसी में बगावत की आग जला दी है। और तरीका क्या अपनाया है? वही, जो 2011 से ममता बनर्जी अपनाती रही थीं।

साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति का जिक्र तो कई बार होता है। लेकिन सही मायनों में इसकी परिभाषा अगर किसी ने समझी है, तो वो एक हैं ममता बनर्जी और दूसरी है बीजेपी।

साम का मतलब होता है किसी को समझाना, माहौल बनाना। ममता बनर्जी ने 2011 में क्या किया था? उन्होंने सिर्फ परिवर्तन का नारा नहीं दिया था, बल्कि एक ऐसा नैरेटिव भी सेट कर दिया था कि लेफ्ट का दौर खत्म हो रहा है। उस जमाने में उन्होंने लेफ्ट के कई नेताओं को अपने पाले में खींच लिया था। यानी कि साम वाली रणनीति वहां काफी काम कर रही थी।

ममता की यही साम रणनीति बीजेपी ने भी अपना ली। टीएमसी के कई नेताओं को ये विश्वास दिला दिया कि ममता में अब पुरानी वाली ताकत नहीं रही है। उनका करिश्मा फीका पड़ना शुरू हो चुका है। अभिषेक बनर्जी पार्टी में ज्यादा ताकतवर हो गए हैं। नतीजा क्या हुआ? ऋतब्रत बनर्जी जैसे नेताओं ने इस मौके का फायदा उठाया और ममता के खिलाफ बगावत कर दी।

राजनीति का दूसरा सिद्धांत, जो कभी ममता का हथियार बना और अब उनके खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है, वो है दाम। 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने लेफ्ट और कांग्रेस दोनों के कई नेताओं को टीएमसी में शामिल किया। कई जगहों पर तो पूरी-की-पूरी निकाय टीएमसी के पाले में चली गईं।

कुछ ऐसा ही बीजेपी ने 2026 में करने का काम किया है। टीएमसी के बागी गुटों और उनके समर्थक विधायकों को ये विश्वास दिलाया गया है कि अगर वो इस समय बगावत करेंगे तो उन्हें राजनीतिक फायदा जरूर मिलेगा। इसी वजह से ऋतब्रत बनर्जी के साथ-साथ कई विधायकों का समर्थन भी दिखाई दे रहा है।

राजनीति के तीसरे सिद्धांत दंड ने भी किसी जमाने में ममता बनर्जी को सियासी फायदा पहुंचाया था। और आज वही उनके पतन का एक मुख्य कारण बनकर भी सामने आया है। 2011 में लेफ्ट शासन को पराजित करने के बाद न जाने लेफ्ट और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर कितने मामले दर्ज हुए थे। इन पार्टियों के कई दफ्तर बंगाल में बंद करवा दिए गए थे। कुछ तो ऐसे भी रहे, जहां तृणमूल वालों ने अपना झंडा लगा दिया। कई जगहों पर स्थानीय निकाय और पंचायतों में नेताओं को रातों-रात पाला बदलवा दिया गया।

बीजेपी ने भी इसी दंड सिद्धांत का इस्तेमाल करते हुए ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर सियासी वार किया है। ईडी उनके दरवाजे पर खड़ी है। और दूसरी तरफ बागी खेमे के नेता अपने साथ कई विधायकों को ले जाने की कोशिश में हैं।

ममता बनर्जी ने राजनीति के चौथे स्तंभ भेद का भी बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया था। 2011 के बाद उन्होंने कांग्रेस के अंदर ही ऐसी अंदरूनी कलह शुरू करवाई कि बंगाल में उसके मजबूत गढ़ माने जाने वाले मालदा और मुर्शिदाबाद में भी टीएमसी की पकड़ मजबूत होती चली गई। इसके अलावा कई बड़े नेताओं को तोड़कर भी स्पष्ट संकेत दे दिया गया।

अब टीएमसी के साथ भी यही खेल हो चुका है। पार्टी ओल्ड गार्ड बनाम यंग गार्ड के बीच फंसी हुई है। पुराने वफादार नेता, जैसे शोभनदेव चट्टोपाध्याय और फरहाद हकीम, अभिषेक बनर्जी से सीधे टक्कर ले रहे हैं। वो उनकी युवा टीम के रवैये से खुश नहीं हैं।

यानी कि राजनीति के इन साम, दाम, दंड, भेद सिद्धांतों ने भी ममता की स्ट्रीट फाइटर छवि को धूमिल करने का काम किया है। किसी जमाने में वो जरूर इसी के जरिए बीजेपी का शिकार करती थीं। लेकिन अब खुद शिकारी शिकार बन चुकी हैं। और शिकार करने वाला कोई और है।-सुधांशु

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