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दिल्ली हाईकोर्ट ने एडल्टरी की सजा रद्द की, महाभारत की नियोग प्रथा का किया जिक्र

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में व्यभिचार (एडल्टरी) की सजा रद्द कर दी, जिसमें अदालत ने घटनाक्रम को महाभारत काल की ‘नियोग प्रथा ‘के आधुनिक रूप जैसा बताया। कोर्ट ने कहा कि शादी से बाहर प्रेम संबंधों से जुड़ी आईपीसी की धारा 497 को सुप्रीम कोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है, इसलिए उसके तहत दी गई सजा अब बरकरार नहीं रह सकती।

जस्टिस विमल कुमार यादव ने 11 मई को सुनाए गए अपने एक फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ’ मामले में 2018 में धारा 497 को रद्द कर दिया था। सर्वोच्च अदालत ने माना था कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है। हाई कोर्ट ने कहा कि जब कोई कानून असंवैधानिक घोषित हो जाता है, तो उसे सजा का आधार नहीं बनाया जा सकता।

मामले के तथ्य भी असामान्य थे। अपीलकर्ता, जो शिकायतकर्ता महिला का पूर्व किराएदार था, ने दावा किया कि महिला और उसके पति की सहमति से उसके और महिला के बीच संबंध बने थे। उसका कहना था कि पति संतान पैदा करने में सक्षम नहीं था और उसे गर्भवती करने के लिए कहा गया था।

अदालत में महाभारत के नियोग प्रथा का किया जिक्र

कोर्ट ने इस दावे का जिक्र करते हुए कहा कि यह स्थिति महाभारत काल की ‘नियोग प्रथा’ के आधुनिक रूप जैसी प्रतीत होती है। प्राचीन भारतीय समाज में नियोग प्रथा के तहत संतान प्राप्ति के लिए पति की अनुमति से किसी अन्य पुरुष की सहायता ली जाती थी।

हालांकि, अभियोजन पक्ष का आरोप था कि महिला को नशीला ‘गाजर का हलवा’ खिलाकर उसके साथ रेप किया गया। लेकिन निचली अदालत ने आरोपी को बलात्कार और जबरन वसूली के आरोपों से बरी कर दिया था। इसके बावजूद उसे धारा 497 के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल कैद की सजा सुनाई गई थी।

धारा 497 अब कानून का हिस्सा नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 497 अब कानून का हिस्सा नहीं है और जोसेफ शाइन फैसले का प्रभाव पिछली तारीख से लागू होता है। इसलिए आरोपी की सजा को कायम नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने उसे सभी आरोपों से बरी करते हुए उसकी जमानत से जुड़ी शर्ते भी खत्म कर दीं।

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