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‘इज्जत बचाने के लिए माता-पिता दर्ज कराते हैं केस’, POCSO एक्ट के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

 नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर किशोरों के आपसी सहमति से बने रिश्तों में पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के गलत इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है। जस्टिस बीवी नागरथना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि जब टीनेज लड़कियां अपने पार्टनर्स के साथ परिवार वालों के बिना अनुमति के शादी करने लेतीं हैं, तो माता-पिता अक्सर अपनी तथाकथित ‘इज्जत’ बचाने के लिए आपराधिक मामले दर्ज करा देते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त लहजे में सवाल किया कि कोई राज्य किसी लड़के और लड़की को भागने से कैसे रोक सकता है? पॉक्सो एक्ट बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न और शोषण को रोकने के लिए है। 15 से 18 साल की उम्र एक संवेदनशील उम्र होती है, क्या ऐसे मामलों को सच में पॉक्सो के तहत लाना सही है?

यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?

बता दें कि यह सुनवाई किशोरों के ‘निजता के अधिकार’ को लेकर कोर्ट द्वारा खुद शुरू किए गए (Suo Motu) एक मामले पर हो रही थी। दरअसल, कुछ समय पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक विवादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि किशोर लड़कियों को रिश्तों में पड़ने के बजाय अपनी इच्छाओं पर काबू रखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में हाई कोर्ट के इस फैसले को खारिज कर दिया था।

कोर्ट में सामने आया एक ऐसा मामला

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने कोर्ट को बताया कि जिस मामले की वजह से कलकत्ता हाई कोर्ट ने वह टिप्पणी की थी, उसमें एक नाबालिग लड़की 25 साल के व्यक्ति के साथ भागगर शादी कर ली थी। वह लड़की अब उस व्यक्ति के साथ पत्नी की तरह खुशी-खुशी रह रही है और उनका एक बच्चा भी है।

वहीं सोशल वर्कर्स की एक कमेटी ने रिपोर्ट दी है कि ऐसे मामलों में हमारा सिस्टम पूरी तरह फेल साबित हो रहा है, क्योंकि 17-18 साल के लड़कों को जेल भेज दिया जाता है।

मामले में सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

मामले में कोर्ट ने आगे कहा कि 16 से 18 साल के किशोर आपस में रिश्ता बनाकर चले जाते हैं। माता-पिता कानूनी कार्रवाई का सहारा लेते हैं, लेकिन आखिर में हमें उन्हें बरी ही करना पड़ता है।

बता दें कि साल 2012 में सहमति से संबंध बनाने की उम्र 16 से बढ़ाकर 18 साल की गई थी। मामले में इस बात को आधार बनाते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं है कि यह बदलाव 2012 के बाद आया है, यह पहले भी बाल विवाह की तरह होता था। लेकिन उम्र 18 साल तय होने से अब यह गैरकानूनी हो जाता है। मामले में अदालत ने साफ किया कि ऐसे मामलों में सरकार और कोर्ट के निर्देश व्यावहारिक होने चाहिए ताकि किसी का भविष्य बर्बाद न हो।

सरकार का सुझाव- स्कूल से ही दी जाए जागरूकता

वहीं इस मामले में केंद्र सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि इस समस्या से निपटने के लिए एक बड़ा प्लान तैयार किया गया है। केंद्र सरकार के वकील के अनुसार कक्षा 6 से ही बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से पॉक्सो एक्ट और किशोर शिक्षा के बारे में जागरूक किया जाएगा।

हालांकि जब वकील ने सुझाव दिया कि पॉक्सो मामलों की निगरानी के लिए केंद्र सरकार का एक डैशबोर्ड होना चाहिए, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर हाई कोर्ट के पास पहले से ही बाल अधिकारों के लिए एक कमेटी है और राज्य सरकारें इसकी निगरानी कर सकती हैं। इसमें केंद्र सरकार को शामिल करने की क्या जरूरत है? गौरतलब है कि इस बेहद संवेदनशील मामले पर सुप्रीम कोर्ट अब अगली सुनवाई 17 जुलाई को करेगा।

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