गर्भवती पत्नी को जलाने के मामले में दोषी पति को बड़ी राहत, HC ने कम की सजा

दिल्ली हाईकोर्ट ने दहेज के लिए गर्भवती पत्नी को जलाने के मामले में दोषी पति और उसके परिवार को बड़ी राहत देते हुए उनकी सजा कम कर दी. कोर्ट ने कहा कि महिला अब अपने पति और परिवार के साथ रह रही है और उसने सबको माफ कर दिया है इसलिए उन्हें दोबारा जेल भेजना परिवार की शांति बिगाड़ सकता है.
करीब 25 साल पुराने इस मामले में दिल्ली के राजापुरी इलाके की रहने वाली सविता को नवंबर 2000 में कथित तौर पर दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था.. आरोप था कि सास और देवर ने सविता को पकड़ा और पति राजू ने उस पर आग लगा दी.. उस समय सविता गर्भवती थी. घटना के बाद उसे अस्पताल ले जाने के बजाय मायके भेज दिया गया जहां उसका घरेलू और आयुर्वेदिक इलाज कराया गया. बाद में उसने एक बच्ची को जन्म दिया.
डिलीवरी के करीब 20 दिन बाद सविता ने 13 अप्रैल 2001 को डाबड़ी थाने में शिकायत दर्ज कराई थी.. इसके बाद पुलिस ने पति राजू, सास बार्दी देवी और देवर शंभू के खिलाफ हत्या की कोशिश, दहेज प्रताड़ना और गलत तरीके से बंधक बनाने समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया था.
ट्रायल कोर्ट ने तीनों को दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी
ट्रायल कोर्ट ने जनवरी 2004 में तीनों को दोषी ठहराते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी, हालांकि तीनों ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील कर केवल सजा कम करने की मांग की.. सुनवाई के दौरान सविता खुद अपने पति और देवर के साथ कोर्ट पहुंची. उसने अदालत को बताया कि परिवार में समझौता हो चुका है और वह अब अपने पति के साथ रह रही है. महिला ने हलफनामा देकर कहा कि वह कोई कार्रवाई नहीं चाहती..कोर्ट को यह भी बताया गया कि घटना के बाद उसके तीन और बच्चे हुए और अब परिवार में कुल पांच बच्चे हैं.
दिल्ली हाईकोर्ट ने दी मामले में अहम नसीहत
हालांकि सरकार की ओर से सजा कम करने का विरोध किया गया. सरकारी वकील ने कहा कि सविता के शरीर पर आज भी जलने के निशान हैं और मानसिक दर्द भी बना हुआ होगा, लेकिन जस्टिस विमल कुमार यादव ने कहा कि कई मामलों में समय के साथ परिवार दोबारा साथ आ जाते हैं और सामान्य जीवन शुरू कर देते हैं.
दिल्ली हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने दहेज प्रथा को समाज की बड़ी बुराई बताते हुए कहा कि लालच इंसानियत को अंधा बना देता है…अदालत ने यह भी कहा कि सविता ने गंभीर पीड़ा सहने के बावजूद अपने पति और ससुराल वालों को माफ कर दिया जो बहुत बड़ी बात है..हाईकोर्ट ने माना कि 25 साल बाद दोषियों को फिर जेल भेजने से परिवार का संतुलन बिगड़ जाएगा और इसका असर सविता व उसके बच्चों पर भी पड़ेगा… इसी आधार पर कोर्ट ने दोषियों की सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया हालांकि उनकी सजा और दोषसिद्धि बरकरार रखी गई..



