संपादकीय

आंदोलन या जंग के टकराव

यह किसान आंदोलन है अथवा किसी जंगी टकराव के दृश्य हैं? हरियाणा-पंजाब की सीमाओं पर, दोनों तरफ, जेसीबी और पोकलेन सरीखी बड़ी मशीनें तैनात की गई हैं। आखिर किसके विध्वंस की रणनीति है यह? टै्रक्टरों को युद्ध के उपकरण के तौर पर मॉडिफाइड किया गया है। पत्थर जमा किए गए हैं। तलवारें चमक रही हैं। बोरियों में रेत-मिट्टी भर कर मोर्चेबंदी की गई है। आखिर किसान किसके खिलाफ जंग छेडऩे को लामबंद हो रहे हैं? सीमाओं पर 14,000 से अधिक किसान या कोई मुखौटाधारी क्यों मौजूद हैं? बातचीत तो किसानों के मु_ी भर नेता करते रहे हैं। जन-शक्ति का ऐसा प्रदर्शन किसके खिलाफ है? जिन टै्रक्टरों को खेतों में होना चाहिए था, ऐसे 1200 से अधिक टै्रक्टर शंभू बॉर्डर पर क्यों हैं? या कलेक्टर के दफ्तर में उनके जरिए किसान हमलावर क्यों है? आंदोलन के दौरान जन-शक्ति के तो मायने हैं, लेकिन बॉर्डर के करीब 300 से ज्यादा निजी कारें और मिनी बसें कहां घूमने को तैनात की गई हैं? इनसे खौफनाक तो यह है कि खनौरी बॉर्डर पर किसानों ने पराली में आग लगाई और उसमें लाल मिर्च का पाउडर डाल दिया, नतीजतन जहरीली हवा ने पुलिस कर्मियों को बेहोश कर दिया। पुलिस पर पथराव और लाठियों से भी प्रहार किए गए। हरियाणा पुलिस के मुताबिक, 12 पुलिस कर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं। बेशक कानून-व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस और सुरक्षा बलों को, किसानों की भीड़ छितराने के लिए, आंसू गैस के गोले दागने पड़े हैं। एक युवा किसान की मौत भी हुई है। यह आंकड़ा 3 किसानों और 3 सुरक्षा कर्मियों का बताया गया है।

आंकड़ा अधिक भी हो सकता है। ऐसा संवाद का माहौल है अथवा कोई उपद्रव मचाया जा रहा है? क्या आक्रामक और हमलावर होकर भी, अपनी आजीविका से जुड़ी, मांगों को मनवाया जा सकता है? संविधान ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन का अधिकार तो दिया है, लेकिन जंग के हालात पैदा करना, राजमार्गों पर सडक़बंदी थोप देना, आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देना, आपराधिक हरकत है। किसान कोई अपवाद नहीं हैं। वे गरीब, कर्जदार हैं, तो करोड़ों भारतीय गरीबी-रेखा के तले जीने को अभिशप्त हैं। क्या वे भी हथियारबंद होकर सडक़ों पर उतर आएं और सरकार सुरक्षा बलों के जरिए सुरक्षा के बंदोबस्त भी न करे? एक दिन देश अराजकता की स्थिति में पहुंच जाएगा। यकीनन 60-65 करोड़ किसान देश के ‘अन्नदाता’ हैं, खाद्य सुरक्षा के बुनियादी सूत्रधार हैं, लेकिन वे देश के सिर पर सवार नहीं हो सकते। देश को मजबूर नहीं कर सकते। कानून-व्यवस्था को तितर-बितर नहीं कर सकते। बेशक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी के कानून की मांग एक लंबे अंतराल से लटकी है, लेकिन कोई भी मंत्री या प्रधानमंत्री आंख मूंद कर यह मांग स्वीकार या लागू नहीं कर सकता। मौजूदा सरकार ने अपने 10-साला कार्यकाल के दौरान गेहूं का एमएसपी 51 फीसदी, धान का 66 फीसदी, चने का 64 फीसदी, तुअर का 87 फीसदी, मसूर का 103 फीसदी बढ़ाया है। हालांकि यह दीगर सवाल है कि सरकारी खरीद कितनी हो पाती है। केंद्र सरकार ने जुलाई, 2022 में एमएसपी पर विचार करने को एक विशेष समिति का गठन भी किया था। उसकी 37 बैठकें भी हुई हैं। यह सवालिया स्थिति है कि उसने अभी तक कोई भी अनुशंसा क्यों नहीं की है? उसका जवाब हिंसा से मिलने वाला नहीं है। सरकारें भी कमजोर नहीं होतीं, अलबत्ता वे विनम्र और लचीली जरूर होती हैं, क्योंकि लोकतंत्र में सरकारें जनमत से ही चुनी जाती हैं।

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