लेख

स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या का मामला

4 जून 2024 को विधानसभा के चुनाव परिणाम आए थे और नवीन पटनायक की पार्टी चुनाव हार गई थी। इसी दिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने गृह मंत्रालय से आई सभी फाइलें वापस कर दी। नई सरकार ने कार्यभार संभाला। स्वामी जी की हत्या की जांच कमीशन की रपट की खोज शुरू हुई। गृह मंत्रालय की अलमारियां छानी जाने लगीं। लेकिन रपट कहीं नहीं मिली। पूरी जांच करने के बाद गृह मंत्रालय ने पाया कि चार जून को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाकी सब फाइलें तो वापस आ गई थीं लेकिन स्वामी जी की हत्या की जांच वाली फाइल वापस नहीं आई थी। तब मुख्यमंत्री कार्यालय की आलमारियों की जांच शुरू हुई। रिकॉर्ड में यह तो पाया गया कि फाइल गृह मंत्रालय से मुख्यमंत्री के कार्यालय में आई थी। यह भी पता चल गया कि फाइल वापस गृह मंत्रालय को नहीं भेजी गई। लेकिन अब वह फाइल मुख्यमंत्री के कार्यालय में नहीं है। वह फाइल कहां गई? फाइल किस ने चुराई या गायब करवाई? स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के हत्यारों को कौन बचाना चाह रहा है…

बहुत लोगों को अभी भी ज्ञात होगा कि 2008 में जन्माष्टमी के दिन ओडीशा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या कर दी गई थी। स्वामी जी का आश्रम ओडीशा के सबसे पिछड़े जिले कन्धमाल में था। वे वहां के पिछड़े कन्ध समुदाय के लोगों की शिक्षा, कृषि का प्रसार कर रहे थे। इस क्षेत्र में विदेशी ईसाई मिशनरियां भी सक्रिय हैं। वे कन्ध समाज के लोगों को ईसाई पंथ में दीक्षित कर रही हैं और कुछ सीमा तक उन्हें इसमें सफलता भी मिली। लेकिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी के सक्रिय हो जाने से, मिशनरियों के पास अकूत विदेशी धन होने के बावजूद कन्ध समाज में उनका प्रभाव घटने लगा। कन्धमाल में एक ओर विदेशी ईसाई मिशनरियां सक्रिय थीं और दूसरी ओर नक्सलवादी गिरोहों ने अपने कदम जमा लिए थे।

कन्ध जन इन दोनों के बीच फंस कर अपना अस्तित्व, पहचान और संस्कृति खोने के कगार पर पहुंच गए थे। लेकिन इसी बीच कन्धमाल में कन्ध जनों के पक्ष में स्वामी जी आ गए। एक ओर कन्ध जन और दूसरी ओर नक्सलवादी व विदेशी ईसाई मिशनरियां! दोनों के बीच सीना तान कर खड़े स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती। स्वामी जी के कारण कन्ध जनों में भी एक नई ऊर्जा का संचार होने लगा था। लेकिन ईसाई मिशनरियां और नक्सलवादी अपने अपने कारणों से स्वामी जी के बीच में आ जाने से क्षुब्ध थे। उन्होंने स्वामी जी को ही बीच में से हटाने का फैसला कर लिया। 2008 की जन्माष्टमी के दिन चकापाद गांव में वे स्वामी जी के आश्रम में घुस गए और अत्यन्त नृशंसता से उन्होंने स्वामी जी की कुल्हाडिय़ों से काट कर हत्या कर दी। यह बताने की जरूरत नहीं कि तब नवीन पटनायक ओडीशा के मुख्यमंत्री थे। कुछ लोग पकड़े भी गए। कुछ को कुछ सजाएं भी मिलीं। लेकिन हत्या के पीछे असली लोग कौन थे, कि उन्होंने स्वामी जी की हत्या की योजना बनाई थी। पैसा किसने मुहैया करवाया? क्या इस हत्या के लिए विदेशी ईसाई मिशनरियां और नक्सलवादी आपस में मिल गए थे? ये सब प्रश्न थे जिनका उत्तर केवल कन्ध जन ही नहीं, बल्कि पूरा देश मांग रहा था।

कन्धमाल में तो जनजीवन ही ठप्प हो गया था। भगवान जगन्नाथ की भूमि पर एक संन्यासी की हत्या हो गई थी। ऐसा नहीं कि स्वामी जी की अचानक हत्या कर दी गई। वे लम्बे समय से मिशनरियों के निशाने पर थे। उन पर अनेक बार जानलेवा हमले हो चुके थे। हत्या से करीब एक साल पहले तो वे एक ऐसे ही हमले में बाल-बाल बचे थे। सरकार ने उस हमले के पीछे के षड्यन्त्र का पता लगाने के लिए न्यायमूर्ति पाणिग्रही की अध्यक्षता में एक कमीशन भी बिठाया था, लेकिन उसकी रपट का कुछ अता पता नहीं चला। लेकिन उसके बाद तो ये षड्यंत्रकारी स्वामी जी की हत्या करने में सफल हो गए। अंतत: जनता के जवाब में सरकार ने हत्या की जांच के लिए न्यायमूर्ति शरत महापात्र जांच आयोग का गठन किया। वे जांच के लगभग अंतिम चरण में पहुंच गए थे। कुछ पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि ऐसे कमीशन प्राय: सरकार की इच्छानुसार ही रपटें देते हैं। तब उन्होंने कहा था कि जब मेरी रपट आएगी तब सभी को पता चल जाएगा कि षड्यंत्र की जड़ें कहां हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ समय बाद उनका देहांत हो गया। तब नवीन पटनायक ने उनके स्थान पर एएस नायडू की नियुक्ति की। नायडू ने 2016 में अपनी रपट ओडीशा सरकार के गृह मंत्रालय को सौंप दी। गृह मंत्रालय ने वह रपट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दी। लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय इस रपट पर सो गया।

न तो उसे विधानसभा पटल पर रखा, न ही उसे सार्वजनिक किया और न ही रपट के आधार पर स्वामी जी की हत्या के लिए चिन्हित किए गए षडयंत्रकारियों पर कोई कार्रवाई की। ओडीशा की जनता बार बार इसकी मांग करती रही। लेकिन नवीन बाबू चुप रहे। चुनावों में भी स्वामी जी की हत्या का मुद्दा किसी न किसी रूप में उभरता रहा। नई सरकार बन जाने पर पूरे देश को विश्वास था कि अब स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी के असल हत्यारे अपने किए का फल भुगतेंगे। 4 जून 2024 को विधानसभा के चुनाव परिणाम आए थे और नवीन पटनायक की पार्टी चुनाव हार गई थी। इसी दिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने गृह मंत्रालय से आई सभी फाइलें वापस कर दी। नई सरकार ने कार्यभार संभाला। स्वामी जी की हत्या की जांच कमीशन की रपट की खोज शुरू हुई। गृह मंत्रालय की अलमारियां छानी जाने लगीं। लेकिन रपट कहीं नहीं मिली। पूरी जांच करने के बाद गृह मंत्रालय ने पाया कि चार जून को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाकी सब फाइलें तो वापस आ गई थीं लेकिन स्वामी जी की हत्या की जांच वाली फाइल वापस नहीं आई थी।

तब मुख्यमंत्री कार्यालय की आलमारियों की जांच शुरू हुई। रिकॉर्ड में यह तो पाया गया कि फाइल गृह मंत्रालय से मुख्यमंत्री के कार्यालय में आई थी। यह भी पता चल गया कि फाइल वापस गृह मंत्रालय को नहीं भेजी गई। लेकिन अब वह फाइल मुख्यमंत्री के कार्यालय में नहीं है। वह फाइल कहां गई? फाइल किस ने चुराई या गायब करवाई? स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के हत्यारों को कौन बचाना चाह रहा है! क्या ईसाई मिशनरियों की पहुंच मुख्यमंत्री कार्यालय तक भी थी? क्या नवीन पटनायक इन सभी प्रश्नों का जवाब देंगे। जब फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय में नहीं मिली तो दो दिन पहले मुख्यमंत्री कार्यालय ने थाना में फाइल की चोरी को लेकर एफआईआर दर्ज करवा दी है। आशा करनी चाहिए कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के हत्यारों के चेहरे से नकाब उतरेगा ही। और कौन उनकी रक्षा कर रहे थे, उनके चेहरे से भी। इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। हत्या जैसे मामले में ढिलाई नहीं होनी चाहिए। यह तथ्य भी सामने आता है कि भारत में विदेशी ताकतें भी सक्रिय रहती हैं। इन ताकतों के गलत कारनामों पर से पर्दा हटना चाहिए और गलत काम करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। यह भी एक तथ्य है कि भारत में सक्रिय ईसाई मिशनरियों को विदेशों से फंड मिलते रहते हैं। यह फंड किसलिए मिलता है, इसका खुलासा भी होना चाहिए। विदेशी ताकतों के हमारे देश में क्या मंसूबे हैं, इस पर से पर्दा हटना चाहिए।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button