संपादकीय

भाजपा तोड़ रही तृणमूल

अब यह सरेआम, स्पष्ट हो चुका है कि भाजपा ही तृणमूल कांग्रेस को तोड़ रही है। इसका यह साक्ष्य ही पर्याप्त है कि तृणमूल के 12-14 बागी सांसद केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा के बंगाल प्रभारी भूपेन्द्र यादव के आवास पर इक_ा हुए। बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी भी उस बैठक और विमर्श में शामिल थे। सोमवार शाम को मुख्यमंत्री सुवेन्दु बागी सांसदों की कथित उपनेता शताब्दी रॉय के आवास पर भी पहुंचे। वहां भी तृणमूल के बागी गुट से मुलाकात और सौदेबाजी हुई। हम सौदेबाजी इसलिए कह रहे हैं कि उन बैठकों में तय हुआ होगा कि आपको एनडीए का हिस्सा कैसे बनना है और अंतत: भाजपा में कैसे शामिल होना है? कोई लालच या आकर्षण नहीं होगा, तो कोई भी विधायक या सांसद बगावत क्यों करेगा? असंतोष और बगावत किसी भी राजनीतिक दल में संभव है और इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा है। यह तोड़ा-फोड़ी की कवायद तब चल रही थी, जब तृणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में शिरकत कर रही थीं। दोनों स्थानों के बीच करीब 1.5 किलोमीटर का फासला होगा। ममता अपने सांसदों को पाला बदलने से रोक नहीं पाईं, क्योंकि भाजपा में बागियों को राजनीतिक भविष्य ‘चमकीला’ दिख रहा था। जिन सांसदों ने ममता बनर्जी की 15-साला सत्ता के दौरान ‘मलाई’ चाटी, ममता को देवी-तुल्य मानते रहे, ममता की पार्टी के चुनाव चिह्न और उनके राजनीतिक आह्वानों के सहारे चुनाव जीत कर लोकसभा में आए, आज वे तृणमूल को दलालों, चोरों, डकैतों और रेपिस्ट (बलात्कारी) की पार्टी करार दे रहे हैं।

वाह! क्या संसदीय राजनीति है और दलबदल-विरोधी कानून है? बेशक यह कानून बागी गुट के दो-तिहाई सदस्यों को अलग गुट बनाने और उसकी मान्यता की अनुमति देता है, लेकिन यह कानून भी लक्ष्यहीन और बेमकसद साबित हुआ है। यदि तृणमूल के सांसदों को टूटना ही था, तो वे भाजपा नेता के आवास पर क्यों गए? भाजपा नेता ने अघोषित आमंत्रण क्यों दिया था? मुख्यमंत्री भी संयोगवश नहीं पहुंचे। जाहिर है कि भाजपा नेतृत्व में ही तय हुआ है कि चुनाव में करारी शिकस्त के बाद तृणमूल को तोड़ा जाए, यह काम आसान होगा और एनडीए में एक घटक के तौर पर शामिल किया जाए। दरअसल भाजपा-एनडीए को संसद के दोनों सदनों में अपनी संख्या बढ़ानी है, ताकि उन संविधान संशोधन विधेयकों को आसानी से पारित किया जा सके, जिनके लिए सदन में दो-तिहाई बहुमत अनिवार्य है। प्राथमिकता परिसीमन बिल की है, जिसके आधार पर ही महिला आरक्षण कानून लागू किया जा सकता है। राज्यों से सांसदों की सीटें बढ़ाई जा सकती हैं। सत्ता पक्ष बीते संसद सत्र में यह बिल 54 मतों से पारित नहीं करा सका था। अब तृणमूल के 20 बागी सांसदों ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखा है कि उन्हें ‘अलग गुट’ के तौर पर मान्यता दी जाए। अब वे एनडीए का हिस्सा बनना चाहते हैं, लिहाजा बैठने की व्यवस्था भी उसी के अनुरूप की जाए। यह निर्णय स्पीकर को करना है, लेकिन मूल तृणमूल के नेता ऐसे प्रस्ताव पर 20 सांसदों के हस्ताक्षरों पर सवाल उठा रहे हैं। दरअसल हमारा बुनियादी सवाल यह है कि भाजपा तृणमूल के बिखराव को प्रश्रय क्यों दे रही है?

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