एमएसपी की गारंटी नहीं

देश की राजधानी दिल्ली में 12 मार्च तक धारा 144 लागू कर दी गई है। हरियाणा के करीब 15 जिलों में भी निषेधाज्ञा की स्थिति है। जाहिर है कि हालात सामान्य नहीं हैं। एक बार फिर किसान संगठनों ने लामबंद होकर ‘दिल्ली कूच’ का आह्वान किया है। भारतीय किसान यूनियन (राकेश टिकैत समूह) ने 16 फरवरी को ‘भारत बंद’ का आह्वान किया है। किसानों ने अपने आंदोलन के लिए संवेदनशील समय चुना है। देश में आम चुनाव की गतिविधियां आरंभ हो गई हैं। ऐसे मौके पर अपनी मांगों को लेकर भारत सरकार को झुकने पर बाध्य किया जा सकता है। राजधानी में एक माह तक लगातार धारा 144 लागू करने की स्थिति देशहित में नहीं है। दिल्ली के तीन बॉर्डर पर किलेबंदी भी की गई है। सडक़ पर लोहे की कीलें गाडऩा, कंटीली तारें, लोहे और सीमेंट के विशालकाय अवरोधक, भारी कंटेनर और डंपर लगाकर रास्ते रोकने के दृश्य बीते किसान आंदोलन की यादें ताजा कर रहे हैं। हरियाणा के कई जिलों में तो मोबाइल इंटरनेट और बल्क एसएमएस की सेवाओं पर पाबंदियां चस्पां कर दी गई हैं। दिल्ली बॉर्डर और पंजाब-हरियाणा में सुरक्षा बलों और पुलिस के हजारों जवान तैनात किए गए हैं, मानो यह कोई भारत-पाकिस्तान सीमा हो और युद्ध के आसार हों! भारत सरकार और किसानों के बीच मतभेद और विवादास्पद समस्याएं सनातन रही हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा और गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय की किसान नेताओं के संग बैठक और बातचीत बेनतीजा रही हैं, लेकिन बिजली कानून, 2020 को रद्द करने, लखीमपुर के किसानों को मुआवजा, पिछले आंदोलन में मारे गए किसानों के परिजनों को मुआवजा, किसानों पर दर्ज आपराधिक मामलों की वापसी आदि मुद्दों पर लगभग सहमति बन गई है, लेकिन बुनियादी गतिरोध न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के गारंटी कानून पर है।
जब करीब दो साल पहले किसान आंदोलन समाप्त किया गया था, तब खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इन मांगों को लेकर किसानों को आश्वस्त किया था। सवाल है कि सरकार एमएसपी पर अपनी नीति को स्पष्ट क्यों नहीं करती? यदि एमएसपी गारंटी कानून व्यावहारिक, संभव नहीं है, तो सरकार किसानों को अपना फैसला क्यों नहीं बताती? क्या आम चुनाव के मद्देनजर यह जोखिम नहीं उठाया जा सकता? वैसे भारत सरकार सिर्फ 23 फसलों पर ही एमएसपी की घोषणा करती है। उनमें भी गेहूं और धान की फसलों की खरीद ही एमएसपी पर होती है, क्योंकि खाद्य सुरक्षा और भंडारण के लिए सरकार को इन फसलों की व्यापक खरीद करनी पड़ती है। सरकार जिन 81 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज बांटती है, उसके लिए भी थोक में बंदोबस्त करना अनिवार्य है। इसके बावजूद करीब 12-14 फीसदी किसानों को ही खरीद का लाभ मिल पाता है। शेष 85 फीसदी से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं। वे सरकारी खरीद के दायरे में बहुत कम आ पाते हैं। इसके अलावा, सरकार के लगातार प्रचार के बाद मोटे अनाज में अब बाजरे की खेती का क्षेत्र बढ़ा है, लिहाजा उसकी खरीद भी बढ़ी है। बाजरे का एमएसपी अच्छा-खासा घोषित किया जाता है। आंदोलित किसानों की सनातन और निरंतर मांग रही है कि एमएसपी गारंटी कानून बनाया जाए। इसके मायने होंगे कि सरकार ने कागज पर उतना दाम दिलाने का वायदा किया है। खेती तो क्या, किसी भी उत्पाद का मूल्य सरकार तय नहीं कर सकती। यदि किसान संकट में हैं, तो अन्य समुदाय भी अपने आर्थिक और कारोबारी संकट लेकर सडक़ पर उतर सकते हैं। सरकार किस-किस को गारंटी देती रहेगी? लिहाजा ऐसा कानून अव्यावहारिक है। अलबत्ता पिछला आंदोलन वापस लेने के बाद भारत सरकार ने एक विशेष समिति का गठन किया था, जिसमें कुछ किसान प्रतिनिधियों को भी रखा गया था, लेकिन आज तक एमएसपी का मुद्दा अनसुलझा ही है। प्रधानमंत्री मोदी ने जिन वर्गों को चुना है, उनमें गरीब, युवा, नारी के साथ किसान भी हैं। किसान आर्थिक तौर पर आज भी विपन्न है।


