संपादकीय

एक देश, एक संहिता क्यों?

समान नागरिक संहिता न तो सही है और न ही पूरी तरह गलत है। इसे लागू करने की भी जल्दी नहीं है, क्योंकि न तो संवैधानिक बाध्यता है और न ही तुरंत आवश्यकता है। गोवा भाजपा-शासित राज्य है, वहां नागरिक संहिता कानून के तौर पर लागू है। उत्तराखंड विधानसभा में नागरिक संहिता का बिल पेश किया जा चुका है। वह पारित भी हो जाएगा। गुजरात और असम ने भी ऐसी ही जुबान बोलनी शुरू कर दी है। ये सभी भाजपाई राज्य हैं। ऐसा नहीं है कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार संबंधी लैंगिक अन्याय को किसी ने संबोधित नहीं किया। केरल का उदाहरण सामने है, जहां 1975 में हिंदू विवाह कानून में संशोधन कर उत्तराधिकार अधिकारों में महिला को समानता दी गई। दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र ने भी उसका अनुसरण किया और कानून में सुधार किया। लैंगिक अपराध और दोष अब भी होंगे। ऐसा भी नहीं है कि लिव इन रिलेशनशिप की आड़ में ऐयाशी और टाइम पास संबंधों पर लगाम कसने के लिए समान नागरिक संहिता ही एकमात्र विकल्प है। उसके लिए अलग बिल पारित कर कानून बनाया जा सकता है। लिव इन के लिए बाकायदा पंजीकरण या माता-पिता की सहमति आदि के जो प्रावधान उत्तराखंड बिल में किए गए हैं, वे तत्संबंधी कानून में भी किए जा सकते हैं। वैसे भी लिव इन को नियंत्रित करने और विनियमित करने का काम नागरिक संहिता का नहीं है। यह नैतिक-पुलिस का ही उदाहरण है। बिल के मुताबिक, यदि लिव इन के पंजीकरण में विलंब होता है, तो आपको जेल में डाला जा सकता है और जुर्माना भी ठोंका जा सकता है।

लिव इन संबंधी प्रावधान मध्यकालीन सामाजिक संहिता के हिस्से लगते हैं। बहरहाल ऐसा भी नहीं है कि समान नागरिक संहिता से भारतीय जीवन पर पश्चिमी संस्कृति के अंधड़ के प्रभाव नहीं पड़ेंगे अथवा उनसे मुक्त हुआ जा सकेगा। हम तो संविधान और लोकतंत्र के लिए पश्चिम के ही मुखापेक्षी रहे हैं। सांस्कृतिक निशान कैसे मिट सकते हैं? सिर्फ बहुविवाह, हलाला, विवाह-तलाक के समान अधिकार और उत्तराधिकार के लिए, एक राज्य के स्तर पर, नागरिक संहिता की कोई तार्किकता नहीं है। बेशक संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को रखा गया है और सरकार से अपेक्षा की गई है कि वह अपने नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करेगी। दरअसल जब संविधान बनाया जा रहा था और आज की सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक परिस्थितियों में बड़े गहरे फासले हैं। संविधान में भी 100 से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। सर्वोच्च अदालत ने भी नागरिक संहिता लागू करने की पैरवी की है।

उसके कथन का नए सिरे से अध्ययन और मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यदि देश में एक ही नागरिक संहिता की जरूरत है, तो केंद्र की मोदी सरकार नए जनादेश के बाद उस पर कार्रवाई शुरू करे। चुनावों से पहले राज्य-दर-राज्य में इसे लागू करना ‘अन्याय की राजनीति’ है, क्योंकि एक बहुत बड़ा भारतीय वर्ग इसके खिलाफ है। वे सडक़ों पर उतरेंगे, आंदोलन करेंगे, अराजकता और कानूनहीनता फैलेगी। क्या आम चुनाव से पहले ऐसा माहौल बनाना भी राजनीतिक रणनीति है? दरअसल समान नागरिक संहिता 1951 में ‘जनसंघ’ के गठन से ही प्रमुख बुनियादी एजेंडे का हिस्सा रही है। भाजपा ने भी उसे धारण किया और चुनाव घोषणा-पत्रों में भी उसे शामिल रखा। अब भाजपा देश के 17-18 राज्यों में सत्तारूढ़ है, केंद्र में भी बीते 10 साल से उसकी सरकार है, लिहाजा वह एजेंडा पूरा किया जा रहा है। एजेंडे में से अनुच्छेद 370 पूरा किया जा चुका है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से भगाने का एजेंडा फिलहाल हाशिए पर है। अयोध्या राम मंदिर बन रहा है। अब समान नागरिक संहिता की बारी है। यदि इरादा सामाजिक परिवर्तन और समरूपता का है, तो नागरिक संहिता ‘राष्ट्रीय’ होनी चाहिए। राज्य स्तर पर प्रयासों से क्रांतिकारी बदलाव संभव नहीं।

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