संपादकीय

विदेशी हिंडनबर्ग के नए आरोप और विपक्ष का समर्थन…

 ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ की अपनी विश्वसनीयता अमरीका में ही सवालिया है, उसके खिलाफ जांच जारी है, हिंडनबर्ग कोई प्रामाणिक, वेद-पुराण सरीखी कंपनी नहीं है कि जिस पर भारत आंख मूंद कर विश्वास कर सके। फिर भी इस विदेशी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में विश्वास कर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो सवाल किया है कि सेबी प्रमुख का इस्तीफा अभी तक क्यों नहीं लिया गया? यदि बाजार में छोटे निवेशकों का नुकसान होगा, तो कौन जिम्मेदार होगा? इन सवालों से बेपरवाह देश की शेयर मार्केट ने इस बार हिंडनबर्ग की रपट को सिरे से खारिज कर दिया है। सेंसेक्स सिर्फ 56.99 अंक और निफ्टी 20.50 अंक ही लुढक़े, अलबत्ता निवेशकों का बाजार यथावत रहा। सवाल हिंडनबर्ग की रपट पर हैं कि बाजार तो शांत और स्थिर है, लेकिन देश की सियासत क्यों उबल रही है? हिंडनबर्ग आने वाले समय में भारत के प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश सरीखे संवैधानिक चेहरों पर भी कालिख पोत सकती है। किस-किस के इस्तीफों और जेपीसी की मांग करते रहेंगे?

उसके अपने हित और मुनाफे हैं, जिनके लिए वह किसी भी औद्योगिक समूह अथवा संवैधानिक हस्ती को निशाना बनाती रही है। हिंडनबर्ग की अपनी विश्वसनीयता अमरीका में ही सवालिया है, उसके खिलाफ जांच जारी है, लेकिन हमारी सियासत ऐसी है मानो हिंडनबर्ग की रपट के जरिए कोई ‘रहस्य’ खुल गया हो! हिंडनबर्ग की भारत में पहली रपट करीब 18 माह पूर्व सार्वजनिक हुई थी। उसमें अडानी समूह निशाने पर था। उसकी कंपनियों में शेयरों की हेराफेरी और धनशोधन सरीखे सवालों के जरिए आरोप लगाए गए थे। रपट का असर ऐसा हुआ कि अडानी की संपत्ति 120 अरब डॉलर से घटकर 39.9 अरब डॉलर तक लुढक़ आई थी। समूह के शेयर औंधे मुंह गिरे थे। तब समूह के चेयरमैन गौतम अडानी दुनिया के तीसरे सबसे अमीर उद्योगपति थे और एशिया में वह नंबर वन पर थे। बहुत नुकसान हुआ था, लेकिन समूह को कलंकित नहीं किया जा सका। मामला सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा और सेबी की जांच को ‘उचित’ माना गया। अदालत ने कहा कि सीबीआई या एसआईटी जांच की जरूरत नहीं है, प्रतिभूति और बाजार की नियामक सेबी ही सक्षम एजेंसी है। बहरहाल हिंडनबर्ग ने एक बार फिर अपनी रपट जारी की है। उसमें अडानी समूह के साथ-साथ सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच को भी निशाने पर लिया है। आरोप सही हैं या पूर्वाग्रही हैं, सेबी प्रमुख और उनके पति का स्पष्टीकरण कितना प्रामाणिक है, हम उन पर टिप्पणी नहीं कर सकते, क्योंकि यथार्थ हमारे सामने नहीं है। हम उनके निवेश को भी नहीं जानते, लेकिन कुछ भी जाने बिना ही कांग्रेस ने इसे ‘महाघोटाला’ करार दे दिया है और संयुक्त संसदीय कमेटी (जेपीसी) की जांच की मांग की है। विपक्ष के नेता चिल्लाने लगे हैं कि सेबी की भी जांच की जाए।

उसकी कार्यप्रणाली संदिग्ध है। यही नहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तो सवाल किया है कि सेबी प्रमुख का इस्तीफा अभी तक क्यों नहीं लिया गया? यदि बाजार में छोटे निवेशकों का नुकसान होगा, तो कौन जिम्मेदार होगा? इन सवालों से बेपरवाह देश की शेयर मार्केट ने इस बार हिंडनबर्ग की रपट को सिरे से खारिज कर दिया है। सेंसेक्स सिर्फ 56.99 अंक और निफ्टी 20.50 अंक ही लुढक़े, अलबत्ता निवेशकों का बाजार यथावत रहा। सवाल हिंडनबर्ग की रपट पर हैं कि बाजार तो शांत और स्थिर है, लेकिन देश की सियासत क्यों उबल रही है? हिंडनबर्ग आने वाले समय में भारत के प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश सरीखे संवैधानिक चेहरों पर भी कालिख पोत सकती है। किस-किस के इस्तीफों और जेपीसी की मांग करते रहेंगे? क्या हिंडनबर्ग ही भारत की आर्थिक गतिविधियों और नियामक संस्थाओं की कसौटी है, जिस पर सभी की ईमानदारी को आंका जा रहा है? अडानी समूह के साथ कांग्रेस की राज्य सरकारें तो हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाओं पर समझौते करती रही हैं, लेकिन हिंडनबर्ग की रपट आते ही पार्टी के नेता अडानी को ‘अर्थव्यवस्था का खलनायक’ मानने लगते हैं। यह दोगलापन स्वीकार्य नहीं है। यदि हिंडनबर्ग इतनी प्रामाणिक कंपनी है, तो कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकारों के दौरान कई घोटाले सामने आए, उन पर रपटें क्यों नहीं प्रकाशित की गईं?

क्या यह मोदी-विरोध और भारत-विरोध का ही एजेंडा है? भारत में एक रपट के आधार पर न तो आर्थिक अराजकता और अस्थिरता की आशंका है और न ही ऐसी विदेशी ताकतें कामयाब होंगी। भाजपा और सरकार निश्चिंत रहें, लेकिन ऐसी निरंकुश और फर्जी रपटें जारी की जाती रहेंगी, उसके मद्देनजर सरकार की रणनीति क्या है? हिंडनबर्ग ने एक बार फिर हरकत की है, इस पर चुप नहीं बैठा जा सकता, जैसा कि वित्त मंत्रालय का बयान आया है। सर्वोच्च अदालत फिर जाना चाहिए और न्यायिक फैसला लेना चाहिए। वित्त मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति सेबी प्रमुख को बुलाए और विस्तार से घटनाक्रम समझाने की कोशिश करे। हालांकि सेबी प्रमुख ने शुरुआती बयान दिया है और अडानी समूह में किसी भी तरह के निवेश को खारिज किया है। अडानी ने भी सभी आरोपों को खारिज कर दिया है

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