संपादकीय

‘विदेशी साजिशों’ की राजनीति

विदेशी ताकतों की साजिश’ एक राजनीतिक मुहावरा बन कर रह गया है। यह आज की राजनीति में ही नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी ने भी अपने प्रधानमंत्री काल के दौरान जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई को ‘सीआईए एजेंट’ करार दिया था। जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे, तब राममनोहर लोहिया सरीखे समाजवादी नेता को भी ‘विदेशी एजेंट’ करार दिया गया था। भारत में ऐसा कोई भी प्रधानमंत्री नहीं हुआ, जिसके कालखंड में ‘विदेशी ताकतों की साजिश और हस्तक्षेप’ के आरोप न लगाए गए हों। आज सत्तारूढ़ भाजपा यह आरोप नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) राहुल गांधी पर चस्पां करने में जुटी है। यहां तक बयान दिए गए हैं कि राहुल गांधी विदेश जाते हैं, वहां संदिग्ध लोगों से मिलते हैं, उनके साथ साजिशें तैयार करते हैं और फिर भारत लौट कर देश-विरोधी एजेंडा लागू करते हैं। यह राजनीति मुद्दाहीन, नागरिक समस्याओं और संकटों से विरक्त और देश को स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी इस संदर्भ में एक कदम आगे बढ़ गए हैं। उन्होंने नेता प्रतिपक्ष का नाम नहीं लिया, लेकिन एक सार्वजनिक मंच से कहा कि ‘फेल्ड प्रॉडक्ट’ को लॉन्च करने के लिए कुछ लोग देश की प्रतिष्ठा को ही मिट्टी में मिला देने पर तुले हैं। प्रधानमंत्री ने एक बार फिर कांग्रेस को ‘परजीवी’ करार दिया और कहा कि कांग्रेस के एक परिवार से ही पार्टीवाले परेशान और दुखी हैं। कांग्रेस नेता जब अकेले में मिलते हैं, तो वे अपनी पीड़ा और अन्याय बयां करते हैं। आखिर एक ही ‘फेल्ड प्रॉडक्ट’ को कितनी बार लॉन्च किया जाएगा? इतनी लॉन्चिंग तो श्रीहरिकोटा में भी नहीं होती, जितनी कांग्रेस में एक ही आदमी की हुई है। बेशक प्रधानमंत्री मोदी ने नाम नहीं लिया, लेकिन दुनिया जानती है कि कांग्रेस में वह परिवार और चेहरा कौन है और ‘फेल्ड प्रॉडक्ट’ किसे कहा जा रहा है? देश में आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने नेता प्रतिपक्ष के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। राहुल गांधी की राजनीति को ‘अराजक’, ‘हंगामाखेज’ और ‘तोडफ़ोड़ वाली’ करार दिया जा रहा है।

सवाल है कि यदि राहुल गांधी देश-विरोधी साजिशों और गतिविधियों में संलिप्त हैं, तो उन पर आपराधिक केस दर्ज कर उन्हें जेल में डाल देना चाहिए। कानूनी फैसला अदालत करेगी। अराजक राजनीति का एक उदाहरण इतिहास में दर्ज होगा, जब मार्च, 1974 में तत्कालीन ‘जनसंघ’ के युवा नेताओं-सुशील मोदी और रविशंकर प्रसाद-के नेतृत्व में बिहार के ‘राजभवन’ का घेराव करने की कोशिशें की गईं। मुख्यमंत्री के काफिले का घेराव किया गया, विधानसभा भवन में आग लगाने की कोशिश की गई, विधानसभा सचिव के आवास-दफ्तर का भी घेराव कर तोड़-फोड़ की गई। उस किस्म की राजनीति ने जन-जीवन को भी अस्त-व्यस्त किया। जयप्रकाश नारायण ने उन कोशिशों, कथित आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन को ‘क्रांति’ मानने से इंकार कर दिया था। हम आपसे ही पूछना चाहते हैं कि क्या वे सड़किया प्रदर्शन ‘अराजक’ नहीं थे? आज रविशंकर प्रसाद भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं। सुशील मोदी ‘दिवंगत’ हो चुके हैं। यदि वह राजनीति अराजक, हंगामेदार नहीं थी, तो कमोबेश राहुल गांधी ने किसी सरकारी आवास, भवन में आग लगाने की न तो कोशिश की है, न ऐसा आह्वान किया है और न ही साजिश रची है। वह सड़किया मार्च के दौरान ‘आकाशवाणी भवन’ में जरूर घुसे थे, लेकिन एक पेड़ के नीचे धरने पर बैठे रहे, अलबत्ता हम उसे ‘अवैध सेंधमारी’ मानते हैं। भाजपा और मोदी सरकार के प्रवक्ता आज तक यह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि ‘विदेशी साजिश’ में कौन-कौन संलिप्त रहा है और किसने, कितनी फंडिंग की है। ले-देकर जॉर्ज सोरोस का नाम ही दोहराया जाता रहा है। दुनिया जानती है कि वह वैचारिक तौर पर भारत के खिलाफ रहा है और भारत-विरोधी बयानबाजी भी करता रहा है। मोदी सरकार ने साढ़े 12 साल के कालखंड में उसे ‘भारत का दुश्मन’ करार क्यों नहीं दिया? उसके खिलाफ केस दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू क्यों नहीं की? भारत के एनजीओ को उसकी फंडिंग क्यों नहीं रोकी? क्यों प्रतिबंधित नहीं किया? देश-विरोधी साजिश, अंतत:, देशद्रोह होता है और उसका बाकायदा नया कानून भी मौजूद है। सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन तो संवैधानिक अधिकार है। जन-सैलाब से परेशानी हो सकती है, लेकिन वह देश के खिलाफ विदेशी साजिश कैसे हो सकती है? जनहित के मसलों पर विरोध प्रदर्शनों की तो इजाजत होनी चाहिए।

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