अमरीका से व्यापार समझौते की उम्मीद

भारत और अमरीका के बीच जारी द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ता के तहत भारत को सहयोग और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के बीच एक संतुलित और दृढ़ रुख अपनाना होगा। भारत को राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी…
हाल ही में 21 अक्टूबर को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि भारत और अमरीका एक नए व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि दोनों देश समझौता करने के इच्छुक हैं और यह नया सौदा पिछले सभी द्विपक्षीय समझौतों से काफी अलग होगा। ट्रंप का यह बयान अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के हालिया भारत दौरे के दौरान आया। मार्को ने 20 से 22 अक्टूबर के बीच भारत दौरे के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अन्य शीर्ष नेताओं के साथ व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग के मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। रुबियो ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के जामनगर संयंत्र का दौरा किया और भारत की इस अनूठी रिफायनिंग क्षमता की सरहाना की। रुबियो ने यह भी कहा कि भारत-अमरीकी व्यापार वार्ता अब अंतिम और तकनीकी स्तर पर पहुंच चुकी है। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ दशकों में वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक मानचित्र पर भारत और अमरीका के संबंध एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक साझेदारी के रूप में उभरे थे, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में ये संबंध अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई आर्थिक नीतियों, संरक्षणवादी दृष्टिकोण और सख्त टैरिफ रणनीति के कारण एक चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं।
आज भारत के समक्ष एक तरफ अमरीकी बाजार में अपने मजबूत निर्यात को सुरक्षित रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ रूस से रियायती दरों पर अपनी ऊर्जा जरूरतों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने का रणनीतिक संतुलन साधने का दबाव है। इस खींचतान के बीच हालिया अमरीकी नीतिगत फैसले, वीजा नियमों में अत्यधिक सख्ती, जेनेरिक दवाओं पर प्रस्तावित शुल्क की चुनौतियों के बावजूद अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप और विदेश मंत्री रुबियो की हालिया सकारात्मक टिप्पणियों से भारत और अमरीका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) एक नई पटकथा के साथ उभरते हुए दिखाई दे रहा है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद से लेकर 2016 तक भारत और अमरीका के बीच व्यापारिक और आर्थिक संबंधों में एक प्रभावी दौर देखने को मिला। वर्ष 2000 मैं दोनों देशों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 6 गुना बढक़र अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया। इस दौरान अमरीकी बाजार में भारतीय आईटी सेवाओं, फार्मास्युटिकल उत्पादों, कपड़ों और रत्नों की मांग में जबरदस्त इजाफा हुआ, जिससे भारत की आर्थिक साख वैश्विक स्तर पर स्थापित हुई। इस आर्थिक प्रगति को 2008 के ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौते और 2016 में भारत को मिले मेजर डिफेंस पार्टनर के दर्जे से गहरा रणनीतिक बल मिला। रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण के नए द्वार खुलने के साथ-साथ भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी कंपनियों जैसे टीसीएस, इन्फोसिस और विप्रो ने अमरीकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस दौरान एच-1बी वीजा नीति ने भारतीय कुशल पेशेवरों को अमरीका में कार्य करने और वैश्विक पहचान बनाने के पर्याप्त अवसर प्रदान किए। निवेश के दृष्टिकोण से भी यह दौर बेहद समृद्ध रहा, जहां 2000 से 2016 के बीच माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, जीई, आईबीएम और बोइंग जैसी शीर्ष अमरीकी कंपनियों ने भारत के तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोबाइल और रक्षा क्षेत्रों में भारी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई किया। साथ ही भारतीय कंपनियों ने भी अमरीकी बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
ट्रंप काल में शुरू हुई संरक्षणवादी नीतियों, टैरिफ और वीजा पाबंदियों से ठीक पहले तक दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते मुक्त और रणनीतिक सहयोग की मजबूत नींव पर लगातार आगे बढ़ते रहे। ऐसे में अब अमरीका से व्यापार समझौते की संभावनाओं का सुकूनदेह परिदृश्य उभरकर दिखाई दे रहा है। हाल ही में 17 अक्टूबर को अमरीकी प्रशासन द्वारा लींडसे ग्राहम अधिनियम के तहत रूसी तेल खरीददारों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के कठोर फैसले को 60 दिनों के लिए स्थगित करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है। मध्य पूर्व के तनाव और यूक्रेन-रूस संघर्ष से उपजे ऊर्जा संकट के बीच अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत की ऊर्जा जरूरतों और स्रोतों के विविधीकरण की सराहना की है। रूस से प्रतिस्पर्धी दरों पर कच्चा तेल खरीदने की इस छूट से भारत में ईंधन की लागत नियंत्रित रहेगी और घरेलू बाजार में महंगाई का दबाव कम होगा। इसके साथ ही इस फैसले ने टेक्सटाइल, लेदर, जेम्स एंड ज्वेलरी और इंजीनियरिंग सामान जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों के भारतीय निर्यातकों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को अल्पकालिक अनिश्चितता से बचाकर अंतरराष्ट्रीय ऑर्डरों का प्रवाह बनाए रखने में मदद की है। नि:संदेह तेल टैरिफ पर 60 दिनों की राहत के बावजूद, आव्रजन और वीजा नियमों में सख्ती के कारण भारतीय आईटी पेशेवरों, कॉर्पोरेट जगत और चिकित्सा विशेषज्ञों पर संकट गहराता जा रहा है। एच-1बी वीजा पर लगाए गए 1 लाख डॉलर के अतिरिक्त शुल्क को एक वर्ष के लिए बढ़ाने और जांच प्रक्रिया को बेहद सख्त करने से बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों के पंजीकरण में 92 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि कुल मंजूर एच-1बी वीजा में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 71 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त नौकरी छूटने के बाद मिलने वाले 60 दिनों के वैधानिक ग्रेस पीरियड को खत्म करने का नया प्रस्ताव भारतीय पेशेवरों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता है, क्योंकि नौकरी समाप्त होते ही उनका कानूनी गैर-आप्रवासी दर्जा खत्म हो जाएगा और उन्हें तुरंत अमरीका छोडक़र पुन: आवेदन करने की बाध्यता होगी। ऐसे में अमरीका से आर्थिक अनिश्चितता और संरक्षणवाद के इस दौर में भारत को केवल रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय अपने राष्ट्रीय आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए एक दीर्घकालिक और बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। अमरीका और यूरोपीय संघ पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए लैटिन अमरीका, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व के गैर-पारंपरिक बाजारों में भारतीय उत्पादों की पैठ बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ लंबित मुक्त व्यापार समझौतों को तेजी से अंतिम रूप देना होगा।
घरेलू स्तर पर उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं का विस्तार करना होगा और सेवा क्षेत्र को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर तथा उच्च प्रौद्योगिकी की दिशा में अपग्रेड करना होगा ताकि अमरीकी नीतियों के झटकों का प्रभाव न्यूनतम किया जा सके। भारत और अमरीका के बीच जारी द्विपक्षीय व्यापार समझौते की वार्ता के तहत भारत को सहयोग और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के बीच एक संतुलित और दृढ़ रुख अपनाना होगा। भारत को कृषि, डेयरी और एमएसएमई जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी क्योंकि इन क्षेत्रों से भारत की विशाल आबादी की आजीविका जुड़ी हुई है। इसके साथ ही औषधियों, वस्त्र, हस्तशिल्प और जेम्स एंड ज्वेलरी पर अमरीकी टैरिफ दरों को शून्य या न्यूनतम स्तर पर लाने के लिए भारत को कड़ा मोलभाव करना होगा, ताकि भारतीय निर्यातकों को अमरीकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता रहे। अंतत: अमरीका द्वारा मिली 60 दिनों की यह राहत भले ही अस्थायी और अल्पकालिक हो, लेकिन यह भारत के लिए महज एक सांकेतिक छूट नहीं है। यह 60 दिनों का समय भारत को नए सिरे से संजोने का एक प्रभावी अवसर प्रदान करता है।
डा. जयंती लाल भंडारी



