संपादकीय

भारत की गरीबी के अर्धसत्य

क्या भारत में गरीबी ‘नगण्य’ स्तर पर आ रही है? क्या बहुत जल्द ‘गरीबी-रेखा’ की अवधारणा और मानकता समाप्त हो जाएंगी? क्या 285-400 रुपए रोजाना की आमदनी ‘सामान्य स्थिति’ है? गरीबी से उबरना है? देश के कण-कण, चप्पे-चप्पे, गली-मुहल्लों में जो गरीब परिवार दिखाई देते हैं, क्या उनमें से अधिकतर गरीबी से बाहर निकल आए हैं और सामान्य आय-वर्ग में शामिल हो चुके हैं? आरएसएस के सरकार्यवाह (महामंत्री) दत्तात्रेय होसबाले ने 375 रुपए से भी कम रोजाना कमाने वालों को ‘गरीबी’ की श्रेणी में रखा था, जिसमें करोड़ों भारतीय बताए गए थे, क्या उस आकलन और सर्वेक्षण का अर्थशास्त्र गलत था? पश्चिम बंगाल से उप्र तक की पट्टी में देश के करीब 57 फीसदी गरीब माने जाते रहे हैं, क्या उनमें से अधिकतर गरीबी से बाहर निकल आए हैं? देश में ऐसी कॉन-सी क्रांति या औद्योगिक विकास हुआ है, जिनसे गरीबी 3 फीसदी से भी कम पर आने का निष्कर्ष बताया जा रहा है? विश्व बैंक ने भारत की गरीबी पर जो रपट जारी की है, उसकी प्रामाणिकता और विश्वसनीयता कितनी है? भारत में गरीबी और गरीब के आंकड़े विश्व बैंक ने खुद तो जमा नहीं किए। भारत सरकार, मंत्रालयों और एजेंसियों ने जो डाटा मुहैया कराया होगा, विश्व बैंक ने उन्हीं का विश्लेषण किया होगा! तो उस आधार पर कैसे माना या दावा किया जा सकता है कि भारत में गरीबी बहुत कम हो चुकी है और करीब 50 करोड़ लोग, 2011-23 के दौरान, गरीबी-रेखा से बाहर आ चुके हैं? विश्व बैंक की रपट के मुताबिक, भारत में ‘अत्यधिक गरीबी’ 3 डॉलर (करीब 285 रुपए) रोजाना के मानक स्तर पर 27.1 फीसदी से घट कर मात्र 2.6 फीसदी रह गई है? यह ‘अत्यधिक गरीबी’ क्या होती है? यह शब्दावली किसने तय की और क्या सभी को स्वीकार्य है? बहरहाल 12 साल के कालखंड में साढ़े 3 साल यूपीए सरकार के हैं, शेष कालखंड मोदी सरकार का है। इन सालों में 49.6 करोड़ लोग गरीबी-रेखा से बाहर आए हैं।

निम्न मध्यम आय-वर्ग में रोजाना 4.2 डॉलर (करीब 400 रुपए) कमाने और जीवनयापन करने वालों की आबादी 57.7 फीसदी से घट कर 16.1 फीसदी पर आ गई है। इसी स्तर पर 2026 की गरीबी-दर 14.2 फीसदी से घट कर 2028 में 12.1 फीसदी तक लुढक़ सकती है। इस विश्लेषण और इन निष्कर्षों पर कई सवाल हैं। भारत में औसतन 300-400 रुपए रोजाना कमाने वाले को ‘गरीब’ नहीं मानेंगे, तो क्या वह ‘सामान्य’ श्रेणी में गिना जाएगा? सरकारों ने न्यूनतम वेतन 18,000 रुपए से 24,000 रुपए तक तय कर रखा है। औसतन मजदूर भी 600-700 रुपए की दिहाड़ी मांगता है। विश्व बैंक के हिसाब से 9000-12,000 रुपए माहवार कमाई, आय वाले को ‘गरीब’ नहीं मानना चाहिए, लेकिन औसत किसान की आमदनी 10,000 रुपए माहवार भी नहीं है। उसे मजदूरी करनी पड़ती है। किसानी से 5000 रुपए भी नहीं मिलते। खेती पर 42 फीसदी कार्यबल आश्रित है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भी कृषि का योगदान 16-18 फीसदी है। यह डाटा भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो और विश्व बैंक का है। जिन आधारों पर गरीबी-उन्मूलन के दावे किए जा रहे हैं, उनके अपने ‘अद्र्धसत्य’ हैं। यह एक अलग विश्लेषण का विषय है, लिहाजा इसे यहीं छोड़ते हैं। ‘गरीबी हटाओ’ इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल से एक बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है। इसी आधार पर उन्होंने 1971 का चुनाव जीत लिया था। बाद में कुछ और प्रधानमंत्री भी गरीबी-उन्मूलन के दावे करते रहे। भारत सरकार में इसका बाकायदा एक मंत्रालय है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपनी योजनाओं के जरिए गरीबी मिटाने के लगातार दावे किए हैं। विश्व बैंक उनकी राजनीति को पुख्ता करता है, लेकिन यह सच भी देश के सामने आना चाहिए कि देश पर करीब 215 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। यह भी यथार्थ है कि वित्त वर्ष 2026-27 में अभी तक बेरोजगारी दर 14.6 फीसदी से बढ़ कर 15.9 फीसदी हो गई है।

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