संपादकीय

ऐसी संसद का औचित्य

हम आपको 20 अगस्त, 2010 का एक घटनाक्रम बताते हैं। तब केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार थी। डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और मीरा कुमार लोकसभा स्पीकर थीं। उस दिन लोकसभा की कार्यवाही स्थगित हो चुकी थी, लेकिन सरकार के समर्थक दलों के 60 से अधिक सांसद लोकसभा हॉल में ही मौजूद थे। उनमें सपा के मुलायम सिंह यादव, राजद के लालू प्रसाद यादव, जनता दल-यू के शरद यादव समेत उन सांसदों ने एक ‘नकली संसद’ का आयोजन किया। अंग्रेजी में इसे ‘मॉक पार्लियामेंट’ कहते हैं। उसकी कृत्रिम कार्यवाही के मद्देनजर लालू यादव को ‘प्रधानमंत्री’ बनाया गया और वे सभी सांसद ‘टे्रजरी सीटों’ पर बैठ गए। दिलचस्प यह है कि तत्कालीन भाजपा संसदीय दल के उपनेता गोपीनाथ मुंडे को ‘कृत्रिम स्पीकर’ की भूमिका दी गई। यह दीगर है कि पार्टी आलाकमान ने उन हरकतों के लिए मुंडे को खूब फटकार लगाई। कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई। उस ‘नकली संसद’ का आयोजन कैबिनेट द्वारा पारित किए गए सांसद वेतन, भत्ते आदि के बिल और ‘मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया’ बिल के विरोध में किया गया था। यह ड्रामा करने वाले सांसद चाहते थे कि उनका वेतन ज्यादा बढ़ाया जाए। बहरहाल तत्कालीन स्पीकर मीरा कुमार को जब उस नाटक की जानकारी मिली, तो उन्होंने ‘नकली संसद’ के आयोजकों को फटकार लगाई, निराशा व्यक्त की और उसे ‘असंसदीय’ तथा ‘असंवैधानिक’ आचरण करार दिया। आज उसी मीरा कुमार ने ‘एक और नकली संसद’ की अध्यक्षता की है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार गुप्ता के खिलाफ महाभियोग के ‘जन-संस्करण’ पर चर्चा तय की गई थी। यह ‘नकली संसद’ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के सरकारी आवास पर आयोजित की गई। यदि 2010 का आचरण और आयोजन ‘असंसदीय’ और ‘असंवैधानिक’ था, तो कांग्रेस का यह नाटक भी गलत और आपत्तिजनक है। क्या मौजूदा स्पीकर ओम बिरला कांग्रेस नेता से स्पष्टीकरण मांगेंगे? क्या नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी इस संदर्भ में ‘असंसदीय’ करार दिए जा सकते हैं? बेशक कांग्रेस का यह प्रयास कुंठित और निराशाजनक है, क्योंकि संसद का ‘नकली संस्करण’ पेश नहीं किया जा सकता। संसद सडक़ पर नहीं लाई जा सकती। पहले यह आयोजन ‘अशोका होटल’ में किया जाना था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी। बेशक सीईसी या किसी अन्य संवैधानिक पदासीन व्यक्ति के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद में लाने को कांग्रेस और विपक्ष स्वतंत्र हैं। उन्हें संसदीय अधिकार भी प्राप्त हैं, लेकिन लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में सभापति (देश के उपराष्ट्रपति) को भी विशेषाधिकार हैं कि वे ऐसे प्रस्ताव स्वीकार करें या उन्हें खारिज कर दें।

उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। इसी साल मार्च-अप्रैल में भी कांग्रेस और ‘इंडी गठबंधन’ के दलों ने सीईसी के ही खिलाफ ‘महाभियोग’ प्रस्ताव के नोटिस दिए थे। जितने सांसदों के हस्ताक्षर होने अनिवार्य हैं, उनसे अधिक ही दस्तखत कराए गए थे, लेकिन उन नोटिसों और प्रस्ताव को ‘विचारणीय’ नहीं माना गया, लिहाजा खारिज कर दिए गए। कांग्रेस इस निर्णय की कुछ भी व्याख्या करे। अब नए सिरे से ये प्रस्ताव संसद में ही पेश किए जा सकते हैं। चूंकि ‘महाभियोग’ एक संसदीय और संवैधानिक प्रक्रिया है, लिहाजा उस पर संसद में ही विचार किया जा सकता है। संसद में न्यायाधीश के खिलाफ भी महाभियोग प्रस्ताव पेश किए जा चुके हैं, लेकिन आज तक यह प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका है, क्योंकि यह बेहद लंबी और पेचीदा प्रक्रिया है। उसका नकली संस्करण स्वीकार्य नहीं है, लिहाजा यह आयोजन दंडनीय भी होना चाहिए। राहुल गांधी लोकसभा चुनाव, 2024 के बाद से ही ‘वोट चोरी’ का मुद्दा उठाते रहे हैं। बिहार चुनाव के दौरान यह ‘चरम’ पर था, लेकिन कांग्रेस के हिस्से मात्र 6 विधायक ही आए। उसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, बंगाल, असम आदि के विधानसभा चुनावों को भी ‘वोट चोरी’ माना जाता है और खडग़े यहां की सरकारों को ‘चोरी की सरकारें’ करार देते हैं। यह मुद्दा सर्वोच्च अदालत में भी कई बार उठा है, अदालत ने विपक्ष से ‘वोट चोरी’ के सबूत मांगे हैं, लेकिन नहीं दे पाए। राष्ट्रपति को भी ज्ञापन सौंपा था, उन्होंने भी सबूत मांगे थे, आज तक उपलब्ध नहीं करा पाए। अब 1 नवंबर को कांग्रेस-इंडी गठबंधन की जो रैली होनी है, उसका बुनियादी मुद्दा भी यही है। रैली से पहले ‘हवा’ बनाने के लिए ‘नकली संसद’ का आयोजन किया गया। इस राजनीति का क्या औचित्य है?

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button