राष्ट्रीय

पानी बचाना अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी

बारिश की अनिश्चितता, भूजल का अंधाधुंध दोहन और जलस्रोतों पर अतिक्रमण ने पानी के संकट को गंभीर बना दिया है। सवाल केवल पानी की उपलब्धता का नहीं, बल्कि उसे बचाने और न्यायपूर्ण ढंग से इस्तेमाल करने की जिम्मेदारी का भी है। नीति आयोग ने 2018 में अनुमान लगाया था कि 2030 तक भारत में पानी की जितनी खपत होगी, वह तब उपलब्ध पानी से दोगुनी होगी। यह उस समय का पूर्वानुमान था, आज की स्थिति का माप नहीं लेकिन चिंता अभी से करनी होगी क्योंकि जल संरक्षण की जरूरत को समझने के लिए यह पर्याप्त चेतावनी है। 
पानी की एक-एक बूंद बचाने की अपील की जाती है तो यह सवाल उठना ही चाहिए कि पानी बर्बाद करने की कीमत आखिर कौन चुकाता है और उसकी वसूली किससे होती है? विकास के नाम पर कहीं तालाब पाटकर इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं, कहीं बरसाती नालों के रास्ते पर बस्तियां बस जाती हैं और कहीं जमीन में पानी पहुंचाने वाली खुली जगहों पर कंक्रीट बिछा दिया जाता है। फिर बारिश में शहर डूबते हैं और गर्मी में पानी की किल्लत। ऐसे विकास की कीमत आने वाली पीढिय़ों को चुकानी पड़ेगी, यह स्पष्ट है।

जल आंदोलन की शुरुआत अपने घर से : एक टैलीविजन कार्यक्रम में एक प्रसिद्ध अभिनेता ने मजाक में बताया कि उनकी पत्नी तब तक नहाती रहती है, जब तक सोसाइटी के दूसरे निवासियों के घरों में पानी आना बंद न हो जाए और वे शिकायत करने न पहुंच जाएं। बात हंसी-मजाक में कही गई होगी लेकिन इसके पीछे छिपी मानसिकता पर विचार जरूरी है। घंटों शॉवर के नीचे बैठे रहना, गाडिय़ों को लगातार बहते पानी से धोना, हाथ धोते समय नल खुला छोडऩा और टंकी भरने के बाद भी पानी बहने देना, ये ऐसी आदतें हैं, जिन्हें हमने सामान्य मान लिया है। दलील दी जाती है कि पानी का बिल भरते हैं, जितना चाहे इस्तेमाल करें। सरकारी आपूर्ति कम हो तो मोटर लगाकर भूजल निकाल लेते हैं। सार्वजनिक नलों से पानी बहता रहता है और पाइपलाइनें रिसती रहती हैं।

दूसरी ओर लाखों घरों की महिलाएं सुबह उठकर सोचती हैं कि आज नल से पानी आएगा या टैंकर के भरोसे रहना पड़ेगा। किसान आसमान की ओर देखकर फसल का भविष्य तलाशता है और शहर का परिवार पीने का साफ पानी खरीदने को मजबूर है। किसी के लिए पानी सुविधा है, तो किसी के लिए रोज का संघर्ष। संकट बढऩे पर पानी बेचने वालों की चांदी है। जीवन की बुनियादी सुविधा मुनाफे का साधन है। प्रश्न उठता है कि जल संरक्षण केवल व्यक्तिगत सदाचार है या सामाजिक न्याय और क्या किसी को भी यह अधिकार है कि वह जल बर्बाद करे, जबकि इसकी एक बूंद जीवन बचा सकती है?

पूर्वजों की विरासत को क्यों भुला दिया : हमारे पूर्वजों ने तालाब, कुएं, बावडिय़ां और जौहड़ बनाकर पानी संभालने की व्यवस्थाएं विकसित की थीं। उनकी जगह आज हमारे पास ऊंची इमारतें और चौड़ी सड़कें हैं लेकिन क्या जानबूझकर यह भूल गए कि इस तथाकथित विकास से शहरों में प्राकृतिक जलस्रोतों को संरक्षित रखने और पानी को जमीन के भीतर पहुंचाने की क्षमता कमजोर हो जाएगी? जहां बारिश का पानी जमीन में समा सकता था, वहां पक्के निर्माण कर दिए गए। तालाबों पर अतिक्रमण हुआ और पानी का जो कुदरती रास्ता था, उसे पक्की तरह बंद कर दिया। अब पानी को तो कहीं से गुजरना ही था। तो हुआ यह कि बारिश में जगह-जगह जहां रास्ता मिला जलभराव हो गया और गर्मियों में पानी का संकट हो गया। सामने पानी है लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं क्योंकि वह गंदगी और बीमारी का ठिकाना बन चुका है। इसे कहते हैं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना।

मौसम का बदलता मिजाज इस संकट को और गंभीर बनाता है। कहीं बारिश कम होती है, कहीं अचानक मूसलाधार। भारी बारिश में पानी का बड़ा हिस्सा सतह पर बहने लगता है, विशेषकर उन इलाकों में, जहां जमीन कंक्रीट से ढकी हो। देश के सभी विकसित कहे जाने वाले इलाकों में जरा सी बारिश जनसामान्य का जोखिम बढ़ा देती है। कोसते हैं कि बारिश का मजा किरकिरा हो गया और दुआ करते हैं कि वर्षा कभी न हो लेकिन फिर गर्मी से निजात नहीं मिलती। भारत में भूजल का बड़ा हिस्सा सिंचाई में इस्तेमाल होता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, देश की 6,746 आकलन इकाइयों में से 751 अति-दोहित श्रेणी में थीं, जहां भूजल निकासी वाॢषक पुनर्भरण से अधिक थी। कुछ क्षेत्रों में धान और गन्ने जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के विस्तार तथा भूजल पर निर्भर सिंचाई ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई, उपयुक्त स्थानों पर ड्रिप और सिं्प्रकलर तकनीक तथा मिट्टी में नमी बनाए रखने के तरीके अपनाने की बजाय खुलकर खेतों में पम्प चलाए, जिससे न जाने कितना पानी बर्बाद हुआ। और हां, किसान को केवल पानी बचाने का उपदेश देना नहीं बल्कि कम पानी वाली फसल उगाने पर उचित मूल्य, बाजार और सरकारी सहायता मिलनी चाहिए।

जमीन के भीतर जमा पानी को ऐसी पूंजी समझिए, जिसे खर्च करने के साथ फिर से जमा करना भी जरूरी है। यदि निकासी लंबे समय तक प्राकृतिक पुनर्भरण से अधिक रहे, तो भूजल स्तर गिरता है। इसलिए बोरवैल की निगरानी, वर्षाजल संचयन और स्थानीय जरूरत के अनुसार दोहन पर नियंत्रण जरूरी। घरेलू सीवेज और उद्योगों तथा कल कारखानों से रसायन और कचरा सीधे नदियों या अन्य स्रोतों में सभी कानूनों का उल्लंघन करते हुए पहुंचाने के कारण पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जल संरक्षण का अर्थ केवल अधिक पानी जमा करना नहीं, बल्कि उसे प्रदूषित होने से बचाना भी है। 

राजनीति हर बात पर, नदियां और पानी कहां है : व्यक्तिगत जिम्मेदारी आवश्यक है लेकिन उससे सरकार की जवाबदेही कम नहीं होती। सवाल करना चाहिए कि सत्ताधारी दल और विपक्ष हमारे लिए साफ और लगातार मिलने वाले पेयजल का इंतजाम करने के लिए क्या कर रहे हैं? अनेक देशों की तरह घर के हरेक नल से 24 घंटे स्वच्छ जल कब मिलने लगेगा और जल मंत्री और संबंधित विभाग के अधिकारियों को समय पर काम पूरा न करने के लिए क्यों उपयुक्त सजा नहीं दी गई? जल संरक्षण को चुनावी वादे से आगे बढ़ाकर निरंतर चलने वाली नीति क्यों नहीं बनी? पानी प्रकृति का उपहार है, उसकी रक्षा हमारा कत्र्तव्य है। आज सवाल यह नहीं कि पानी हमारे पास कितना बचा है, सवाल यह है कि जो पानी बचा है, उसे बचाने के लिए हम अब और कितनी देर इंतजार करेंगे?-पूरन चंद सरीन

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