राजनीति

पंजाब विधानसभा चुनाव : नशा, कानून-व्यवस्था और कर्ज होंगे मुख्य मुद्दे

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों का माहौल बनना शुरू हो गया है। इन चुनावों में नशों का संकट, बिगड़ती कानून-व्यवस्था और राज्य पर बढ़ते कर्ज का बोझ मुख्य राजनीतिक मुद्दे बन सकते हैं। बेरोजगारी, किसानी संकट और औद्योगिक विकास की मंदी भी इनसे जुड़े अहम सवाल हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए यह 5 सालों की कारगुजारी का इम्तिहान होगा, जबकि कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के लिए लोगों के सामने अपना बदला हुआ नजरिया पेश करने की चुनौती होगी।

नशों का मुद्दा इस बार चुनावी चर्चा के केंद्र में रहने के संकेत दे रहा है। 2022 के चुनावों के समय आम आदमी पार्टी ने नशों के खात्मे का वादा किया था। सरकार बनने के बाद नशा मुक्त पंजाब के लिए कई मुहिमें चलाई गईं लेकिन नशों की उपलब्धता और युवाओं में इसकी लत के बारे में चिंताएं जारी हैं। अक्तूबर 2026 में नशों विरुद्ध आवाज उठाने वाले परविंदर सिंह झोटा की मानसा में हत्या ने इस मुद्दे को फिर से राजनीतिक केंद्र में ला दिया है। 

चुनावों में असल सवाल यह होगा कि नशों की सप्लाई करने वाले बड़े नैटवर्क को किस हद तक तोड़ा गया, तस्करों के वित्तीय स्रोतों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई और नशा छुड़ाऊ इलाज व पुनर्वास की सुविधाओं में कितना इजाफा हुआ। सिर्फ गिरफ्तारियों या ऐलानों की गिनती से नशा मुक्त पंजाब का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता। इसके लिए पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को मिलकर काम करना पड़ेगा। नशों के कारोबार से जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ नशे की लत के शिकार नौजवानों का इलाज भी सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए।

दूसरा बड़ा मुद्दा कानून-व्यवस्था का है। गैंगस्टरों की गतिविधियों, फिरौती, गोलीबारी, गैर-कानूनी हथियारों और संगठित अपराध की घटनाएं लोगों की सुरक्षा के बारे में चिंता पैदा करती हैं। व्यापारियों, उद्योगपतियों और आम नागरिकों को सुरक्षित माहौल देना किसी भी सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है। विरोधी पार्टियां इन घटनाओं को सरकार की नाकामी के तौर पर पेश करेंगी, जबकि सरकार को अपनी कार्रवाइयों के नतीजे सामने रखने होंगे। हर घटना की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई और आपराधिक नैटवर्क को तोडऩा लोगों का भरोसा बहाल करने के लिए जरूरी है।

तीसरा महत्वपूर्ण सवाल पंजाब की वित्तीय स्थिति का है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में राज्य का वित्तीय घाटा राज्य के कुल घरेलू उत्पाद का 4.1 फीसदी, यानी लगभग 39,971 करोड़ रुपए अनुमानित किया गया है। राजस्व घाटा भी लगभग 21,955 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। ये बजट अनुमान हैं, अंतिम खर्चे के आंकड़े नहीं। फिर भी यह राज्य के सामने खड़ी वित्तीय चुनौती की गंभीरता को दर्शाते हैं। कर्ज की किस्तों और ब्याज की अदायगी के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रोजगार के लिए उपलब्ध स्रोतों पर दबाव पड़ता है। सरकार को बताना होगा कि आमदनी बढ़ाने, औद्योगिक निवेश लाने और खर्चों को संतुलित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।

यह मुद्दा सिर्फ आम आदमी पार्टी तक सीमित नहीं। कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल को भी यह स्पष्ट करना होगा कि वे लोक-कल्याण की योजनाओं को जारी रखते हुए पंजाब की अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत करेंगे। कांग्रेस के लिए चुनौती सरकार की कमजोरियों को उजागर करने के साथ अपनी संगठनात्मक एकजुटता और बदली हुई नीति पेश करने की है। भाजपा को नशों, सुरक्षा और आर्थिक प्रबंधन के बारे में अपना पक्ष रखने के साथ किसानों, ग्रामीण मतदाताओं और सिख भाईचारे में भरोसा बढ़ाना पड़ेगा। अकाली दल को अपनी पारंपरिक पंथक और ग्रामीण वोट पर पकड़ फिर से मजबूत करने के लिए लोगों का विश्वास हासिल करना होगा। किसी संभावित भाजपा-अकाली गठबंधन का चुनावी प्रभाव सीटों के बंटवारे, उम्मीदवारों और स्थानीय हालात पर निर्भर करेगा।

बेरोजगारी, नौजवानों का विदेशों की तरफ पलायन, किसानों की आमदनी और उद्योगों की मंदी भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। पंजाब को नए उद्योग, निजी निवेश, कौशल प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने की जरूरत है। किसानों के लिए फसली विभिन्नता के साथ पक्के बाजार और लाभकारी भाव यकीनी बनाने के लिए सभी पार्टियों को अपना विजन बताना होगा। 2027 के चुनावों में राजनीतिक पाॢटयों की कारगुजारी और भविष्य की योजनाएं अधिक महत्वपूर्ण होंगी। आखिरकार, चुनाव सिर्फ सत्ता बदलने का मौका नहीं, बल्कि सरकारों को जवाबदेह बनाने का लोकतांत्रिक साधन है। पंजाब का भविष्य उस राजनीतिक सोच से जुड़ा है, जो इन गंभीर समस्याओं को नारों से आगे ले जाकर ठोस, पारदर्शी और लंबे समय के हलों में बदल सके।-इकबाल सिंह चन्नी

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