अवैध बस्तियों पर बुलडोजर से पहले जवाबदेही क्यों नहीं? शहरों के फैलते संकट पर बड़ा सवाल

पिछले कुछ वर्षों में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर आशियाना बना लेने का चलन बढ़ा है। आज यह एक गंभीर समस्या के रूप में सामने है। महानगरों से लेकर छोटे शहर तक, कोई भी इससे अछूता नहीं है। इसका मुख्य कारण रोजगार की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन है। शहरों में ढांचागत सुविधाएं सीमित और महंगी हैं, जबकि उनकी आबादी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में गरीब परिवारों के सामने आवास का संकट होता है और वे खाली पड़ी सरकारी जमीन पर पहले अपना अस्थायी आशियाना बनाते हैं और बाद में कुछ लोग वहां स्थायी ढांचा या पक्का मकान बना लेते हैं। राज्य सरकारों की ओर से ऐसी बस्तियों को हटाने के लिए समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं, जिनका व्यापक स्तर पर विरोध भी होता है। कई बार ऐसे मामले अदालत तक पहुंच जाते हैं। सवाल है कि इस तरह की बस्तियों को बसने ही क्यों दिया जाता है, जिन्हें बाद में हटाने के लिए सरकारी मशीनरी का उपयोग करना पड़ता है। इससे न केवल सरकारी कोष पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, बल्कि बेदखल किए गए परिवारों के सामने भी कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं।
हाल के दिनों में दिल्ली, मेरठ, हल्द्वानी, कानपुर सहित देशभर के अनेक शहरों में अतिक्रमण कर बनाए गए आशियानों को हटाने से जुड़ी घटनाएं सामने आई हैं। उत्तराखंड के हल्द्वानी रेलवे भूमि प्रकरण में प्रदेश उच्च न्यायालय ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाते हुए इसे ‘मानवीय मुद्दा’ माना और कहा कि हजारों लोगों को एक झटके में बेघर नहीं किया जा सकता। हालांकि, बाद में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि भूमि रेलवे की है और कब्जाधारियों का उस पर कोई वैधानिक अधिकार नहीं है, मगर राज्य सरकार को प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के विकल्पों पर विचार करना चाहिए। इस तरह के मामलों में एक प्रश्न हमेशा अनुत्तरित रह जाता है कि सार्वजनिक उपयोग की भूमि जैसे सड़क, पार्क, विद्यालय या अस्पताल के लिए आरक्षित भूखंड या फिर रेलवे और वन विभाग की जमीन पर वर्षों तक अवैध बस्तियां कैसे बस जाती हैं।
यह आश्चर्यजनक है कि इन बस्तियों में मकानों को बिजली-पानी के कनेक्शन दिए जाते हैं और इनसे नियमित रूप से गृह कर भी वसूला जाता है। कई लोग अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर यहां अपने लिए घर खरीदते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब यह सब हो रहा होता है, तब प्रशासन कोई कदम क्यों नहीं उठाता? यदि मकानों का निर्माण अवैध तरीके से किया जाता है, तो प्रारंभिक स्तर पर ही इन्हें क्यों नहीं रोका जाता? क्या यह केवल नागरिकों की भूल है, या फिर प्रशासनिक लापरवाही? स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब वर्षों बाद अचानक इन बस्तियों को अवैध घोषित कर ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी जाती है। बुलडोजर जब चलता है, तो केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं गिराता, बल्कि यह उन परिवारों के सपनों, सुरक्षा और भविष्य को भी कुचल देता है, जिन्होंने वहां अपना बसेरा बनाकर नई जिंदगी की शुरुआत की थी।
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यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि क्या एक सामान्य नागरिक से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह वर्षों पुराने भूमि अभिलेखों की गहराई से जांच करे? अगर वह ऐसा नहीं कर पाता, तो क्या वह अपराधी बन जाता है? या फिर असली दोषी वे लोग हैं, जिन्होंने इस पूरे तंत्र को संचालित किया यानी माफिया, दलाल और वे अधिकारी, जिन्होंने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया? न्याय केवल यह कह देने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि अवैध निर्माण हटाया जाए। न्याय का वास्तविक उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि इस बात पर गौर किया जाए कि अवैध निर्माण किसकी लापरवाही से हुआ। बिना जवाबदेही तय किए केवल कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है।
एक मूलभूत प्रश्न यह भी है कि क्या सरकार अपनी भूमि और सड़कों की चौड़ाई का नियमित संरक्षण एवं चिह्नांकन नहीं कर सकती? जब देश में जनगणना जैसे व्यापक कार्य संभव हैं, तो क्या समय-समय पर सार्वजनिक भूमि का भौतिक सत्यापन नहीं हो सकता?
यदि कोई परिवार लंबे समय से किसी सरकारी भूखंड पर निवास कर रहा है और उसके पास आधार, पैन एवं मतदाता पहचान पत्र जैसे प्रमाण हैं, तो यह व्यवस्था की विफलता है। ऐसे लोगों के लिए तत्काल पुनर्वास या आर्थिक सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरा, उन व्यक्तियों और अधिकारियों से भी मुआवजा वसूला जाना चाहिए, जिन्होंने इस अव्यवस्था को जन्म दिया। भू एवं राजस्व विभाग में हर स्तर पर इस समस्या पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है और प्रशासनिक सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। इस समस्या की जड़ का एक पहलू यह है कि अधिकारियों के स्थानांतरण के साथ जिम्मेदारी भी धुंधली पड़ जाती है। हर नया अधिकारी पूर्ववर्ती अधिकारी की ओर संकेत कर स्वयं को उत्तरदायित्व से अलग कर लेता है।
कायदे से स्थानांतरण के समय कार्यक्षेत्र की भौतिक और अभिलेखीय स्थिति का अनिवार्य सत्यापन होना चाहिए। स्थानांतरित होने वाले अधिकारी को लिखित रूप से प्रमाणित करना चाहिए कि उसके कार्यकाल में कोई अनियमितता लंबित नहीं है और पदभार ग्रहण करने वाला अधिकारी भी यह सुनिश्चित करे कि उसने सभी दस्तावेजों की जांच और भौतिक सत्यापन कर लिया है। यह परस्पर उत्तरदायित्व की व्यवस्था अधिकारियों को एक-दूसरे से जोड़ेगी और लापरवाही तथा मिलीभगत पर प्रभावी अंकुश लगाएगी।
आज तकनीकी युग में किसी भी समस्या का हल असंभव नहीं है। यदि सरकार चाहे, तो प्रत्येक सार्वजनिक भूमि का डिजिटल भू-अभिलेखीकरण कर उसे सार्वजनिक पोर्टल से जोड़ा जा सकता है। ऐसे में प्रत्येक भूखंड की वास्तविक स्थिति, स्वामित्व और उपयोग की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध होने से कोई भी नागरिक संपत्ति खरीदने से पूर्व उसकी वैधानिक स्थिति स्वयं जांच सकेगा।
इसके अलावा एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता शहरों की नियोजन व्यवस्था (मास्टर प्लान) में भी है। सामान्यतः किसी शहर का मास्टर प्लान 15-20 वर्षों की अवधि के लिए बनाया जाता है, मगर विडंबना यह है कि कई बार यह योजना वर्षों तक लंबित रहती है।
देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां मास्टर प्लान 2021 की अवधि समाप्त होते ही मास्टर प्लान 2041 प्रभावी हो जाना चाहिए था, मगर यह अभी तक अधिसूचना और संशोधन प्रक्रिया में लंबित है। जब देश की राजधानी में ही शहरी नियोजन की स्थिति इतनी अनिश्चित है, तो अन्य महानगरों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
ऐसे में आम नागरिकों से भूमि उपयोग और वैधानिक जटिलताओं की पूर्ण समझ की अपेक्षा करना कितना व्यावहारिक है, यह स्वयं एक गंभीर प्रश्न है। अगर मास्टर प्लान को वार्ड-स्तर तक विभाजित कर डिजिटल सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाए, तो न केवल आम नागरिक धोखाधड़ी से बचेंगे, बल्कि भू-माफिया, अवैध बस्तियां बसाने वाले और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत पर भी प्रभावी रोक लगेगी।
इसलिए सरकार को कार्रवाई से पहले जवाबदेही तय करनी चाहिए, क्योंकि जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक न्याय केवल निर्णय नहीं, बल्कि एक अधूरा सत्य बना रहता है। अब समय आ गया है कि बुलडोजर से पहले व्यवस्था सुधारी जाए, क्योंकि उन्नत शहर केवल ऊंची इमारतों से नहीं बनते, बल्कि स्पष्ट नियोजन और जवाबदेह व्यवस्था से बनते हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नतीजों में सत्ता परिवर्तन होने और BJP नेता शुभेंदु अधिकारी के सीएम बनने के बाद राज्य में पूर्ववर्ती सरकारों के भ्रष्टाचार संबंधी मामलों की जांच शुरूआत हो गई है। इस मामले में पूर्व सीएम ममता बनर्जी के भतीजे और डायमंड हार्बर से लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी भी निशाने पर हैं। उनकी 17 संपत्तियों की जांच हो रही है, जिसको लेकर नगर निगम ने नोटिस जारी किया है और संकेत दिए हैं कि सांसद की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर भी चलाया जा सकता है।



