संपादकीय

ट्रंप का ‘तूफान’ क्या है?

राष्ट्रपति टं्रप अब भी युद्धोन्मादी हैं। ईरान को ‘कब्रिस्तान-सा’ बनाने के बावजूद उनका दिल नहीं पसीजा है। उन्होंने अब भी किसी ‘तूफान’ के आने की धमकी दी है और दावा किया है कि उस तूफान को कोई रोक नहीं सकेगा। क्या टं्रप अब ईरान पर परमाणु हमला भी कर सकते हैं? अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के प्रमुख ने ईरान में परमाणु स्थितियों पर चिंता जताई है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के दुरुपयोग की आशंका भी व्यक्त की है। हालांकि हम किसी परमाणु दुर्घटना की संभावना को नहीं मानते, क्योंकि रूस के राष्ट्रपति पुतिन करीब 90 मिनट की बातचीत में राष्ट्रपति टं्रप को सचेत कर चुके हैं कि अब हमले के अंजाम बहुत बुरे और गंभीर होंगे। चीन भी ऐसे बयान दे चुका है और इसी माह टं्रप का चीन जाना प्रस्तावित है। बीती 28 फरवरी से जो विनाशकारी हमले ईरान पर किए गए हैं, बीच-बीच में युद्धविराम के ‘नाटक’ भी खेले गए हैं, तेल-गैस-खाद आदि की आवाजाही इस कदर बाधित हुई है कि दुनिया में ‘महामंदी’ के संकट फैलने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी महामंदी के आसार की चेतावनी दी है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास-दर 2 फीसदी से भी कम होने के संकेत मिल रहे हैं। यदि दुनिया में ऊर्जा-संकट, सप्लाई चेन का अवरुद्ध होना, खाद्य-संकट यूं ही जारी रहे, तो भुखमरी के हालात भी पुख्ता हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय कारोबार भी बैठ सकता है। खुद अमरीका के पेंटागन की रपट है कि अभी तक ईरान युद्ध पर 25 अरब डॉलर खर्च किए जा चुके हैं। यह राशि अधिक भी हो सकती है। पेंटागन ने 1.5 ट्रिलियन डॉलर के अतिरिक्त बजट की मांग संसद से की है, लेकिन अमरीकी संसद राष्ट्रपति टं्रप से पूछ रही है कि जब 2025 के हमले में ईरान के परमाणु एवं यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को तबाह कर दिया गया था, तो फिर यह युद्ध क्यों किया गया? राष्ट्रपति उसी परमाणु कार्यक्रम की नए सिरे से बात क्यों कर रहे हैं? क्या ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम आज भी जारी है? अब सैनिक और युद्धपोत मध्य-पूर्व के क्षेत्रों में क्यों मौजूद हैं?

क्या अमरीकी संसद राष्ट्रपति टं्रप को बाध्य कर सकती है कि वह सैनिकों की वापसी का आदेश दें? युद्ध पर 25 अरब डॉलर नासा के खर्च के बराबर है, जिसे टं्रप की सामंतवादी सोच ने यूं ही फूक दिया। कैबिनेट में उपराष्ट्रपति वेंस शुरू से ही युद्ध-विरोधी थे, लेकिन अब उनका युद्ध मंत्री हेगसेथ के साथ विवाद बढ़ गया है। उपराष्ट्रपति का गंभीर आरोप है कि युद्ध मंत्री राष्ट्रपति टं्रप को गलत ब्रीफ कर रहे हैं, लिहाजा ईरान से अभी तक अमरीका जीत नहीं पाया है। उपराष्ट्रपति का आग्रह है कि अब युद्ध को स्थायी विराम दिया जाना चाहिए। इस तरह युद्ध के मुद्दे पर टं्रप कैबिनेट विभाजित है और राष्ट्रपति ‘तूफान’ की धमकियां दे रहे हैं! पेंटागन भी राष्ट्रपति को गलत सूचनाएं दे रहा है। हकीकत यह है कि अमरीकी मिसाइलों, ड्रोन, थाड, पैट्रियट आदि वायु रक्षा प्रणालियों और अन्य हथियारों के भंडार काफी कम हो चुके हैं। रणनीतिक तौर पर यह अमरीका के लिए खतरनाक स्थिति है। हथियारों के पर्याप्त भंडारण के लिए अपेक्षित उत्पादन में 3-5 साल का वक्त भी लग सकता है। फिर भी टं्रप और पेंटागन की ओर से बयान दिए जा रहे हैं कि अब जो हमला अमरीका करेगा, उससे ईरान के बिजली संयंत्र, पुल, जल संयंत्र आदि तबाह कर दिए जाएंगे। सवाल है कि क्या अब भी राष्ट्रपति टं्रप को युद्ध जारी रखने की अनुमति संसद देगी अथवा चौतरफा दबावों के मद्देनजर टं्रप एकतरफा जीत की घोषणा करेंगे और युद्ध समाप्त होने लगेगा? क्या ईरान अमरीका को ऐसा करने देगा? सुप्रीम लीडर और आईआरजीसी के कमांडर भी अमरीका को धमका रहे हैं कि अमरीकी सैनिकों और जहाजों को आग लगा कर समंदर में डुबो दिया जाएगा। ईरान ने कुछ नए हथियार बनाए हैं या रूस से आयातित हैं, जिनका इस्तेमाल अब ईरान अमरीकी सैनिकों, जहाजों पर करेगा। ईरान के बहुत बुरे आर्थिक और कारोबारी हालात हैं। रोजी-रोटी भी मयस्सर नहीं है। आशंका है कि एक बार फिर वहां की जनता बगावत कर सडक़ों पर उतर सकती है। हमारा आकलन ऐसा नहीं है, क्योंकि ‘तूफान’ में ईरानी लामबंद रहते हैं। इस युद्ध का खामियाजा भारत समेत कई देशों को भुगतना पड़ रहा है। भारत में एक मई को कमर्शियल गैस के सिलेंडरों के दाम में बढ़ोतरी हो गई। शुक्रवार को खबर आ गई कि कमर्शियल गैस के रेट बढ़ गए हैं। इसके कारण होटलों व ढाबों में भोजन के दाम भी बढ़ गए हैं।

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