‘तुमसे पहले वो जो इक शख्स…’, क्या यह शेर आप मोदी जी को सुना सकती हैं? भक्त का सवाल

पिछले सप्ताह जब नरेंद्र मोदी और उनके भक्तों ने जश्न मनाया इस बात को लेकर कि अब उनका शासनकाल किसी दूसरे प्रधानमंत्री से ज्यादा लंबा रहा है, तो संयोग से मुझे एक पूर्व मोदी-भक्त मिला।
भक्त से पूर्व भक्त क्यों हो गया है, जब मैंने पूछा तो उसने जवाब यह दिया, ‘मैंने आपका एक इंटरव्यू देखा था प्रधानमंत्री इंदर मार गुजराल के साथ, जिसमें आपने उनको यह शेर सुना कर चेताया- ‘तुमसे पहले वो जो इक शख्स यहां तख्तनशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था’।
क्या यह शेर आप मोदी को भी सुनाने की हिम्मत रखती हैं? क्या सच यह नहीं कि मोदी मिलते उन्हीं पत्रकारों से हैं, जो उनके भक्त होते हैं?’
शेर पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब का है, सो पहली बात यह है कि किसी पाकिस्तानी शायर का शेर सुना कर मैं फौरन उस सूची में आ जाऊंगी, जिनमें देश के दुश्मनों के नाम लिखे जाते हैं।
मोदी को सुनाने का सवाल नहीं है, लेकिन पिछले हफ्ते जब मोदी के कसीदे हर तरफ से सुनाई दिए, तो यह शेर बहुत याद आया।
इंदिरा गांधी के जमाने से मैं राजनीति पर लिखती आई हूं और सच पूछिए, पहली बार मैंने किसी प्रधानमंत्री की इतनी खुशामद देखी है एक दिन में। वह भी सिर्फ इसलिए कि अब मोदी जवाहरलाल नेहरू के सत्ता में रहने का रिकॉर्ड तोड़ चुके हैं।
इंदिरा गांधी वास्तव में अपने आपको खुदा समझने लग गई थीं और प्रधानमंत्री रही थीं मोदी से कोई चार साल ज्यादा, लेकिन लगातार नहीं। मगर उन्होंने भी इस तरह का जश्न कभी नहीं मनाया था। आपातकाल में भी नहीं, जब लोकतंत्र को ताक पर रख दिया गया था।
तो नरेंद्र मोदी में क्या है, जो अपनी खुशामद इतना पसंद करते हैं?
ऐसा नहीं है कि उनके दौर में विकास के कई सारे काम नहीं हुए। जब 2014 में प्रधानमंत्री बने थे पहली बार, तो देश में केवल 74 हवाईअड्डे थे, आज 160 हैं।
एक्सप्रेस-वे का निर्माण इतनी तेजी से हुआ है कि जहां ये 1,000 किलोमीटर ही थे, अब 6,700 किलोमीटर हैं।
मेट्रो अगर उनके आने से पहले सिर्फ पांच महानगरों में थी, आज 20 शहरों में है।
ऊपर से मोदी के आने के बाद डिजिटल तरीकों से कई सरकारी योजनाएं चलने लग गई हैं, जिससे भ्रष्ट अफसरों की कमाई कम हुई है।
अब 48.3 फीसद से 71.1 फीसद भारतीयों के बैंक खाते खुल गए हैं, सो समाज कल्याण योजनाओं का पैसा सीधा बैंकों में जाता है।
गांवों में भी स्वच्छ भारत, उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और जन धन योजनाओं ने ग्रामीण भारत की शक्ल बदल डाली है। यह छोटी बात नहीं है।
मेरी अपनी राय में मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही है कि उन्होंने सत्ता में उन लोगों की हिस्सेदारी बढ़ाई है, जिनको कभी सपने में भी राजनीति में आने की उम्मीद नहीं थी।
मुझे वह जमाना अच्छी तरह याद है, जब सत्ता में ऊंचे ओहदों पर सिर्फ वही लोग पहुंच सकते थे, जिनको अच्छी अंग्रेजी आती थी। सो एक छोटा-सा क्लब बन गया था मेरे जैसे लोगों का, जिनकी पढ़ाई आला अंग्रेजी स्कूलों में हुई थी।
याद है मुझे कि तकरीबन हर ऊंचे ओहदे पर थे मेरी जान-पहचान के वे लोग, जो दून स्कूल, मेयो कॉलेज और सनावर जैसे आला निजी स्कूलों में पढ़ाई करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस में उच्च शिक्षा के लिए जाते थे और वहां से कई आगे जाते थे ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज में।
वास्तव में अंग्रेजों की औलाद थे हम।
अब इतना बदलाव आ गया है कि पत्रकारिता से लेकर राजनीति के ऊंचे गलियारों में हिंदी भाषी लोग राज करते हैं।
यह अच्छी बात है।
मेरी शिकायत मोदीजी से यह है कि उन्होंने इन नए लोगों को आदतें वही डाल दी हैं, जो पुराने लोगों की थीं।
राजा-महाराजाओं की तरह रहने लग गए हैं ये नए भारत के नए लोग।
आलीशान कोठियों में, बड़ी-बड़ी गाड़ियों के होते हैं उनके काफिले और बिल्कुल उसी किस्म की डिजाइनर चीजें खरीदते हैं, जो पुराने शासक पसंद करते थे।
मोदी के मंत्रिमंडल में कई मंत्री हैं, जिनके बच्चे न सिर्फ अमेरिका में पढ़ने जाते हैं, बल्कि वहां पहुंचने के बाद नौकरी भी ढूंढ़ लेते हैं और अपने इस गरीब वतन को त्याग कर बन जाते हैं पूरी तरह से अमेरिकी।
भूल जाते हैं हमारे शहरों की गंदी-बेहाल गलियां और हमारे गांवों की धूल-मिट्टी और गंदा पानी।
मोदी चाहते तो देश की राजनीतिक संस्कृति बदल सकते थे, लेकिन उन्होंने इस तरफ ध्यान तक नहीं दिया है।
न ही उन्होंने ध्यान दिया है शिक्षा पर।
भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्रियों का शासन आज चलता है तकरीबन सारे भारत में, लेकिन सरकारी स्कूल उतने ही रद्दी हैं, जो पहले थे।
नतीजा यह कि देश के युवाओं की समस्या यह है कि स्कूल में अगर अच्छे नंबर लेकर किसी कॉलेज में पहुंच भी जाते हैं, तो वहां भी पढ़ाई इतनी बेकार है कि ग्रेजुएट बनने के बाद भी वे बेरोजगार रहते हैं।
इसलिए कि आज के दौर में जो अर्धशिक्षित हैं, उनके लिए अच्छी नौकरी मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। रही बात सरकारी नौकरी मिलने की, तो यहां आरक्षण के जरिए मिल जाती है, लेकिन दिन-ब-दिन सरकारी नौकरियों की संख्या कम होती जा रही है। सो इतने मायूस हो जाते हैं हमारे युवा कि भारत पर उनका भरोसा कम होता जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी का बनना इशारा करता है इस मायूसी की तरफ और आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री की समस्याएं बढ़ती जाएंगी।
जश्न तो मना चुके हैं अपने लंबे शासनकाल का, लेकिन जैसे उस पूर्व भक्त ने मुझे याद दिलाया, उनको शायद किसी ने याद नहीं दिलाया है- ‘तुमसे पहले वो जो इक शख्स यहां तख्तनशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था।’-तवलीन सिंह



