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शिक्षा के लिए घटता बजट चिंताजनक

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बहुप्रतीक्षित इस्तीफे के कारण आंदोलनकारी छात्रों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है, लेकिन सरकार इसे अपनी उपलब्धि मानकर शांत नहीं बैठ सकती। उसे शिक्षा क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जो अब तक काफी उपेक्षित रहा है।प्राथमिकता की इस कमी को केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय (जिसे पहले मानव संसाधन मंत्रालय कहा जाता था) के लिए किए गए वित्तीय आबंटन में देखा जा सकता है। सैंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सी.एम.आई.ई.) के इकोनॉमिक आऊटलुक मॉड्यूल द्वारा संकलित डाटा पिछले एक दशक के दौरान शिक्षा क्षेत्र को दी गई उपेक्षा को उजागर करता है।

डाटा वास्तविक आबंटित राशि को ध्यान में नहीं रखता (जो कि मुद्रास्फीति और कुल धन के आबंटन में वृद्धि के कारण हर साल बढ़ती है), बल्कि यह विभिन्न मंत्रालयों को आबंटित धनराशि के प्रतिशत पर केंद्रित है। डाटा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यू.पी.ए. शासन के दौरान बजट आबंटन की तुलना में वर्तमान व्यवस्था में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा तेजी से गिरा है। केंद्रीय बजट में इसका हिस्सा 2013-14 में 4.6 प्रतिशत था, जो एन.डी.ए. सरकार द्वारा किया गया अंतिम बजट आबंटन था और यह 2025-26 में घटकर महज 2.5 प्रतिशत रह गया है। इस प्रकार, मंत्रालय के लिए आबंटन पिछली सरकार में मिले हिस्से का आधा रह गया है। मंत्रालय को 2 विभागों-स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा-के लिए आबंटन मिलता है। डाटा दिखाता है कि स्कूली शिक्षा विभाग का हिस्सा 12 साल पहले की तुलना में अब आधे से भी कम है, जबकि उच्च शिक्षा विभाग का हिस्सा अब पहले की तुलना में केवल 60 प्रतिशत है। महत्वपूर्ण रूप से, इसके विपरीत, सड़कों और राजमार्गों के निर्माण के लिए आबंटन पिछले 12 वर्षों में 3 गुना बढ़ गया है।

युवाओं को कौशल प्रदान करने के लिए बनाई गई बहुप्रचारित योजना भी विफल हो गई है। 2015-16 में सरकार द्वारा एक नया मंत्रालय बनाया गया था। यह वास्तव में एक बेहतरीन विचार था लेकिन कौशल विकास मंत्रालय के लिए आबंटन का हिस्सा इसके गठन के वर्ष में केवल 0.06 प्रतिशत था, जो अब और घटकर 0.05 प्रतिशत हो गया है। शिक्षा मंत्रालय का नेतृत्व करने के लिए मंत्रियों का चयन भी सरकार द्वारा दी गई कम प्राथमिकता को दर्शाता है। एन.डी.ए. के तहत पहली शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी थीं, जिनकी अपनी शैक्षिक योग्यता पर सवाल उठाए गए थे। यहां तक कि धर्मेंद्र प्रधान भी इतने महत्वपूर्ण मंत्रालय का नेतृत्व करने के लिए उपयुक्त नहीं थे।

चूंकि शिक्षा क्षेत्र समवर्ती सूची के अंतर्गत आता है, इसलिए नीति निर्माण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें दोनों जिम्मेदार हैं। सभी राज्यों द्वारा औसत आबंटन भी 2008-2009 में 14 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 13 प्रतिशत हो गया है। हालांकि संसाधनों के आबंटन में यह गिरावट केंद्र सरकार जितनी तीव्र नहीं है, फिर भी कुछ राज्य भी पिछड़ रहे हैं। सकल नामांकन अनुपात (जी.ई.आर.), जो उस आयु वर्ग की कुल जनसंख्या से विभाजित कुल नामांकित छात्रों की संख्या है, पर एक नजर डालने से कुछ राज्यों द्वारा शिक्षा के प्रति उपेक्षा दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, बिहार का जी.ई.आर. केवल 45, जबकि केरल का 94 है। इस प्रकार, एक ओर शिक्षा क्षेत्र के लिए आबंटित संसाधनों में कमी आई है और दूसरी तरफ एक त्रुटिपूर्ण परीक्षा प्रणाली मौजूद है। हालिया छात्र असंतोष का कारण नीट प्रश्न पत्र लीक होना था, लेकिन पिछले एक दशक के दौरान प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न पत्र लीक होने की लगभग 150 घटनाएं हुई हैं। 45 ऐसे बड़े परीक्षा लीक की जांच से पता चला कि इनमें से केवल 2 मामलों में ही दोषियों को सजा मिली, जबकि बाकी कानूनी कार्रवाई में अटके हुए हैं।

यदि हमें एक मजबूत राष्ट्र और अर्थव्यवस्था के रूप में उभरना है, तो शिक्षा, विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा, सरकार के ध्यान का केंद्र होनी चाहिए। दुर्भाग्य से, यह सबसे उपेक्षित क्षेत्रों में से एक बना हुआ है। शिक्षा को हमारी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकॢषत करना चाहिए लेकिन कम वेतन और खराब कामकाजी परिस्थितियों के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा। छात्रों का आंदोलन शिक्षा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधारों का कारण बनना चाहिए और इसे केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए एक समिति गठित करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए।-विपिन पब्बी

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