स्वास्थ्य

कोई झेल जाता है बड़ी-बड़ी असफलता, कुछ छोटी मुसीबत में ही मान लेते हैं हार, जानें इसके पीछे का मनोविज्ञान

बेगूसराय: आमतौर पर लोग थकान को सिर्फ शारीरिक कमजोरी से जोड़कर देखते हैं लेकिन, मनोविज्ञान में थकान का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है. बेगूसराय के जाने-माने मनोवैज्ञानिक और एसोसिएट मेंबर ऑफ द इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियर्स, इंडिया, इंजीनियर आर. शंकर (Er R. Shankar) ने लोकल 18 पर मानसिक थकान को लेकर पूरी जानकारी दी. उन्होंने बताया कि वास्तविक थकान वह स्थिति है, जब किसी व्यक्ति की मानसिक क्षमता जवाब देने लगती है. जब दिमाग यह स्वीकार कर ले कि “अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, अब मेरी मदद करने वाला कोई नहीं है, अब मैं कुछ नहीं कर सकता”, तो मनोविज्ञान की भाषा में इसे मानसिक थकान (Mental Fatigue) या मेंटली यील्ड (Mentally Yield) करना कहा जाता है.

दो प्रकार की होती है थकान
आपको बता देंकि मनोवैज्ञानिक आर शंकर के अनुसार, थकान मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं. पहली शारीरिक थकान, जो रोजमर्रा के काम, मेहनत और व्यायाम के बाद महसूस होती है. आराम करने और अच्छी नींद लेने के बाद यह सामान्य रूप से दूर हो जाती है. दूसरी मानसिक थकान, जो शरीर से नहीं बल्कि दिमाग से जुड़ी होती है. कई बार व्यक्ति शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ होता है, लेकिन उसका मस्तिष्क आगे सोचने, निर्णय लेने या कोई नया प्रयास करने की स्थिति में नहीं रहता. उसे लगता है कि अब कोई रास्ता नहीं बचा है और आगे बढ़ने का कोई अर्थ नहीं है.

मानसिक थकान को उदाहरण से समझिए
लोकल 18 पर उदाहरण देते हुए बताया कि मान लीजिए दो बच्चे हैं. पहला बच्चा लगातार पांच बार परीक्षा में असफल हुआ, लेकिन उसके अंदर छठी बार परीक्षा देने का उत्साह और ऊर्जा अभी भी है. इसका मतलब है कि वह मानसिक रूप से थका नहीं है. दूसरा बच्चा पहली ही बार परीक्षा में असफल होने के बाद दोबारा कोशिश करने की इच्छा खो देता है. उसके अंदर आगे लड़ने की ऊर्जा खत्म हो जाती है. मनोवैज्ञानिक भाषा में यही मानसिक थकान है, जहां व्यक्ति मानसिक रूप से हार मान लेता है.

हर इंसान का मस्तिष्क अलग और थकान की लिमिट भी अलग
मनौवैज्ञानिक बताते हैं कि दुनिया के हर व्यक्ति की थकान की सीमा यानी फटीग लिमिट (Fatigue Limit) अलग-अलग होती है. इसकी वजह यह है कि हर इंसान का मस्तिष्क अलग तरीके से काम करता है. हर व्यक्ति का सोचने, महसूस करने, व्यवहार करने, प्रतिक्रिया देने और तर्क करने का पैटर्न अलग होता है. यही कारण है कि कोई व्यक्ति बड़ी से बड़ी असफलता के बाद भी संभल जाता है, जबकि कोई छोटी-सी निराशा के बाद ही टूट जाता है.

मानसिक थकान का इलाज क्या है?
मानसिक थकान के उपाय पर मनोवैज्ञानिक आर शंकर कहते हैं कि इसे समझने के लिए मस्तिष्क की न्यूरोलॉजिकल अभिव्यक्ति को समझना जरूरी है. उनके अनुसार यदि मस्तिष्क की न्यूरो सेंसिटिविटी जरूरत से ज्यादा कम हो जाती है, तो व्यक्ति की थकान सहने की क्षमता भी कम हो जाती है. ऐसे लोग कम काम करने के बाद ही थकान महसूस करने लगते हैं, जल्दी चिड़चिड़े यानी इरिटेट हो जाते हैं और छोटी-छोटी परिस्थितियों में मानसिक रूप से दबाव महसूस करने लगते हैं.

उनका कहना है कि यदि किसी तरह मस्तिष्क की न्यूरो सेंसिटिविटी को बेहतर बनाया जाए, तो व्यक्ति की मानसिक सहनशक्ति बढ़ सकती है और वह चुनौतियों का सामना पहले से अधिक मजबूती के साथ कर सकता है. यानी मानसिक थकान केवल काम की अधिकता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि व्यक्ति का मस्तिष्क परिस्थितियों को किस तरह समझता और संभालता है.

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