आजाद भारत के पथ-प्रदर्शक

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के इस विशेष अवसर पर मैं प्रत्येक भारतवासी को हार्दिक बधाई देता हूं। इसके साथ ही, मैं उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को आदरपूर्वक नमन करता हूं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।अंडमान में राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल का मेरा दौरा एक और अत्यंत प्रेरणादायक क्षण था।
इसी जेल में भारत माता के महान सपूत श्री वीर सावरकर जी, श्री योगेंद्र शुक्ला जी, श्री बटुकेश्वर दत्त जी, श्री शचींद्र नाथ सान्याल जी और कई अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को औपनिवेशिक ताकतों द्वारा कैद कर काल-कोठरियों में रखा गया था। आज भी राष्ट्रीय स्मारक की ये दीवारें उन वीरों के साहस, उन्हें दी गई यातनाओं और उनके महान बलिदानों की कहानियां सुनाती प्रतीत होती हैं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इस यात्रा ने मुझे उन सभी राष्ट्रीय नायकों को श्रद्धांजलि के रूप में यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया, जिन्होंने करोड़ों लोगों के दिलों में देशभक्ति की आग जलाई और देश को स्वतंत्रता प्राप्ति की राह पर अग्रसर किया।
9 अगस्त को जब हम ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का स्मरण कर रहे थे, मुझे अंडमान द्वीप समूह में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरूआत करने का अवसर मिला। वर्ष 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान करते हुए देश को ‘करो या मरो’ का ओजस्वी नारा दिया था। इस आह्वान के परिणामस्वरूप पूरे देश में स्वतंत्रता प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हो गई थी।
स्वतंत्रता सेनानियों की गौरवमयी गाथा : स्वतंत्रता सेनानी चाहे उत्तर में कश्मीर से हों या दक्षिण में तमिलनाडु से, पश्चिम में गुजरात से हों या पूर्व में असम से-देश के प्रत्येक क्षेत्र, वर्ग, आयु की महिलाओं और पुरुषों ने भारत माता की स्वतंत्रता के सांझा लक्ष्य के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रतिरोध की अमर पहचान बनीं रानी लक्ष्मीबाई जी की वीरता, मंगल पांडे जी का साहस और बाल गंगाधर तिलक जी की वह निर्भीक उद्घोषणा—‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’—स्वतंत्रता की ओर बढ़ते देश के प्रत्येक कदम को शक्ति प्रदान करती रही। इसी क्रम में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लई जी ने भारत का पहला स्वदेशी जहाजरानी (शिपिंग) व्यवसाय शुरू करके औपनिवेशिक शासन के आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती दी। इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं था, बल्कि आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्र में भी लड़ा गया था। भगत सिंह जी, राजगुरु जी और सुखदेव जी के क्रांतिकारी विचारों ने आने वाली पीढिय़ों को आजादी के लिए त्याग और बलिदान का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। वहीं रानी गाइदिनल्यू जी के अटूट जज्बे ने पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला को प्रज्वलित रखा।
असम की युवा वीरांगना कनकलता बरुआ जी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का नेतृत्व करते हुए, अपने हाथों में राष्ट्रीय ध्वज थामे अदम्य साहस के साथ कदम आगे बढ़ाए और अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। भगवान बिरसा मुंडा जी और कई अन्य जनजातीय नेताओं ने भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया। इतिहास के पन्नों में ऐसी अनगिनत गाथाएं हैं, जो साहस, संघर्ष, धैर्य और दृढ संकल्प से भरी हुई हैं। इन सभी कहानियों ने मिलकर वीरता और बलिदान की एक समृद्ध विरासत का निर्माण किया है। ये हमें स्मरण कराती हैं कि भारत की स्वतंत्रता अनगिनत वीरों के संयुक्त प्रयासों से प्राप्त हुई थी और उनकी विरासत आज भी आने वाली पीढिय़ों को प्रेरित करती है।
स्वतंत्रता आंदोलन में तिरुपुर का योगदान: इस स्वतंत्रता दिवस पर मैं तिरुपुर कुमारन जी को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं, जिन्हें जनमानस में ‘कोडी काथा कुमारन’ अर्थात् ‘ध्वज की रक्षा करने वाले कुमारन’ के नाम से जाना जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मेरे गृह नगर तिरुपुर में उन्होंने आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। मृत्यु को सामने देखते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को जमीन पर नहीं गिरने दिया। इसी कारण उन्हें यह सम्मानजनक उपाधि प्राप्त हुई थी।
अल्पायु में ही कुमारन जी के हृदय में देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित हो उठी थी। ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ के नारे से प्रेरित होकर वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। महात्मा गांधी जी के आदर्शों से अत्यधिक प्रभावित होकर कुमारन जी ने लोगों, विशेषकर युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत करने के लिए ‘देशबंधु युवा संघ’ की स्थापना की। कुमारन जी का दृढ़ विश्वास था कि सच्ची स्वतंत्रता तभी प्राप्त की जा सकती है, जब लोग विदेशी हुकूमत के अत्याचारों के प्रति जागरूक हों और उसके विरुद्ध लडऩे का साहस एवं स्पष्ट दृष्टिकोण विकसित करें।
मैं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की उस पहल की सराहना करता हूं, जिसके माध्यम से राष्ट्रीय आंदोलन के उन गुमनाम नायकों को देश के सामने लाया जा रहा है, जिनका योगदान लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में उपेक्षित रहा था। मैं सभी ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। इस ऐतिहासिक अवसर पर आइए, हम अपनी मातृभूमि के प्रति अपने दायित्वों पर विचार करें और अपनी प्रतिबद्धता को पुन: सुदृढ़ करें। इस अमृतकाल में 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के लिए स्वयं को समर्पित करें और देश की प्रगति एवं समृद्धि के लिए मिलकर कार्य करें।-सी.पी. राधाकृष्णन



