राजनीति

मोदी के आह्वान का विरोध व आलोचनाएं केवल राजनीतिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पैट्रोलियम पदार्थों के हर संभव न्यूनतम उपयोग के साथ अन्य अपीलों व कदमों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में आलोचना व विरोध के स्वर ज्यादा हैं। प्रधानमंत्री ने 10 मई को देशवासियों से मुख्यत: 3 अपीलें कीं, जिनमें एक साल तक सोने की खरीद टालने, गैर जरूरी विदेश यात्राएं न करने और पैट्रोल-डीजल की बचत के लिए वर्क फ्रॉम होम और कार पूङ्क्षलग व सार्वजनिक यातायात का ज्यादा इस्तेमाल करना शामिल है। 

हालांकि विपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया है। कहा जा रहा है कि चुनाव तक प्रधानमंत्री को संकट नहीं दिखा और अचानक दिख गया। पैट्रोल-डीजल के दाम बढ़े हैं तो आरोप यह है कि बस केवल चुनाव तक रोका गया था। इस तरह की अनेक आलोचनाएं हो रही हैं और होती रहेंगी। प्रधानमंत्री ने अपील के बाद मंत्रिमंडल की बैठक में जाते समय अपने काफिले को कम किया तथा केवल 2 गाडिय़ां दिखाई थीं। गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एवं अन्य मंत्रियों ने भी अपने काफिले से गाडिय़ों की संख्या कम की। इसके बाद पूरे देश से इस तरह की तस्वीरें और निर्णय आए, जहां भाजपा सरकारों के मंत्रियों ने अपने काफिले में गाडिय़ों की संख्या में कटौती की, स्वयं तथा सरकारी अधिकारियों के कार्यालय जाने की व्यवस्था में बदलाव किया और कई जगह सप्ताह में निश्चित दिन वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की अनुमति दी गई। इस तरह के कदमों से कई बार आशंका पैदा होती है मानो देश गंभीर संकट में है और लोगों से मितव्ययिता यानी कम खर्च करने को कहा जा रहा हो। विरोध और प्रतिक्रियाएं भी संदेहों को बढ़ावा देतीं हैं।

वस्तुत: विरोध व आलोचनाओं में राजनीति ज्यादा है। कुछ गलतफहमियां भी पैदा की जा रही हैं। यह केवल विदेशी मुद्रा वाले खर्च में कमी करने संबंधी अपील है। फिर प्रधानमंत्री ने अपील की है, कोई नियम-कानून नहीं बना कि जिससे न मानने वालों के विरुद्ध कार्रवाई हो जाए। दूसरे, इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत की अर्थव्यवस्था बड़े संकट में है। प्रधानमंत्री की अपील में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ की भी बात है।  भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास गति संतोषजनक है। विदेशी मुद्रा भंडार भी लगभग 697 अरब डॉलर है, जो 11 महीने के आयात के लिए पर्याप्त है। महंगाई थोक मूल्य सूचकांक में वृद्धि हुई है लेकिन खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर नियंत्रण में है। किंतु भारत एक बड़ा आयातक देश है। हम कच्चे तेल का करीब 89 प्रतिशत आयात करते हैं तो सोने का 90 प्रतिशत से ज्यादा। हमारे कुल आयात बिल में 4 मदों में सबसे ज्यादा खर्च हैं। कच्चे तेल पर 2025-26 में कुल 134.7 अरब डॉलर का खर्च आया तो सोने पर 72 अरब डॉलर, खाने के तेल पर 19.5 अरब डॉलर और उर्वरक पर 14.5 अरब डॉलर।  

ईरान अमरीका इसराईल युद्ध ने पूरी दुनिया में उथल-पुथल पैदा की है। होर्मुज संकट ने एशिया, यूरोप, अफ्रीका तीनों के लिए समस्या पैदा की है, जिसका समाधान नहीं हो रहा। युद्ध कब समाप्त होगा, क्या मोड़ लेगा, कहना कठिन है। कोई वैश्विक संस्था इतनी प्रभावी नहीं जो व्यापार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, समुद्री परिचालन आदि के अंतर्राष्ट्रीय नियमों को लागू करा सके। पूरी दुनिया की आपूर्ति शृंखला बाधित ही नहीं है उथल-पुथल के दौर में है।

अभी तक आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा की काफी हद तक भरपाई निर्यात तथा रेमिटैंस यानी विदेश में कार्यरत या रहने वाले भारतीयों द्वारा भेजी गई विदेशी मुद्रा से हो जाती थी। इस कारण चालू खाते का घाटा हमेशा नियंत्रण में रहा। वर्ष 2024 में विदेशी में रहने वाले भारतीयों द्वारा भेजे गए धन की मात्रा 138 अरब डालर थी। अप्रैल से सितम्बर 2025 तक यह पिछले वर्ष के 64.7 अरब डॉलर से बढ़कर 73 अरब डालर हो गया था। खाड़ी युद्ध और वैश्विक संकट के कारण इसमें व्यापक कमी की संभावना पैदा हो गई है। इसी तरह वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल निर्यात (माल और सेवाएं) 4.22 प्रतिशत बढ़कर 860 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जबकि आयात लगभग 6.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 979 अरब डॉलर तक पहुंचा। आपूॢत शृंखला बाधित होने से हमारे निर्यात पर प्रभाव पड़ रहा है। किंतु मूल्य बढ़ते रहने के बावजूद आवश्यक आयातों को रोकना संभव नहीं। अगर सब कुछ ऐसे ही रहा तो वित्त वर्ष 2026 में चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 0.8 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 में 2.2 प्रतिशत तक जा सकता है। यह करीब 84.5 अरब डॉलर हो सकता है। यह घाटे में लगभग 3 गुना वृद्धि होगी। 

कच्चे तेल के दाम 26 फरवरी के 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं। सोने की कीमत लगातार बढ़ रही है। पिछले वर्ष हमने 11.40 लाख करोड़ का तेल आयात किया तथा 6.50 लाख करोड़ के आसपास का सोना। इस वर्ष तेल का आयात बिल 17 लाख करोड़ और  सोने का 10 लाख करोड़ हो सकता है। पिछले वर्ष हमने लगभग 470 टन सोना आयात किया। अगर 1 वर्ष तक सोना न खरीदें तो तूफान नहीं आ जाएगा। इनमें 50 प्रतिशत गिरावट आ गई तो 35-36 अरब डॉलर बचते हैं। अगर आप पैट्रोल-डीजल में 20 प्रतिशत की भी कटौती कर लेते हैं तो यह भी 35-36 अरब डालर हो जाता है।

जहां तक तेलों के दाम बढ़ाने की बात है तो दुनिया में कौन-सा देश है जहां दाम नहीं बढ़े? तेल कंपनियां प्रतिदिन करीब 1000 करोड़ रुपए का घाटा उठा रही हैं। सरकार पैट्रोल पर 8 रुपए और डीजल पर 6 रुपए शुल्क घटा चुकी है। खाद की 2200 रुपए की बोरी 242 रुपए में मिल रही है। लगभग 82 देशों में पैट्रोल-डीजल की राशनिंग हो रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया में तेल 50 प्रतिशत और यूरोप में 20 प्रतिशत महंगा हो चुका है। भारत में इसे नियंत्रित रखा गया है। आम लोगों की प्रतिक्रिया यही है कि जब वैश्विक संकट है तो दाम बढ़ेंगे ही और अनेक कह रहे हैं कि ज्यादा बढऩे की उम्मीद कर रहे थे यह कम है। इसका अर्थ हुआ आम लोग इसके लिए तैयार हैं।

विदेशी मुद्रा भविष्य की चुनौतियों के बीच सुरक्षा की गारंटी है। 1991 में विदेशी मुद्रा संकट के कारण प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सरकार को 67 टन सोना विदेश में गिरवी रखकर 2000 करोड़ डॉलर का कर्ज लेना पड़ा था। उसके बाद नरसिम्हा राव सरकार को भी 45 दिनों में करीब 47 टन सोना और गिरवी रखना पड़ा, ताकि भारत 4000 करोड़ डॉलर कर्ज प्राप्त कर सके और आयात बिल का भुगतान संभव हो। वैसी नौबत फिर न आए, इसलिए आवश्यक है कि वैश्विक परिस्थितियों को समझते हुए देश एकजुट होकर प्रधानमंत्री की अपील माने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहे।– अवधेश कुमार

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