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देश वापसी की अपील के मायने

ऐसे भी बहुत से लोग हैं जिन्होंने बेहतर शिक्षा और उसके बाद एक अच्छी नौकरी के लिए भारत छोड़ा था, लेकिन अब उन्हें अमरीकी प्रशासन से बुरा बर्ताव मिल रहा है- खासकर वीजा से जुड़ी अनिश्चितता, मनाही तथा अन्य पाबंदियों के मामले में…

हाल ही में प्रौद्योगिकी, खासतौर पर आईटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में आत्मनिर्भरता के प्रबल समर्थक एवं वैश्विक स्तर पर जानी-मानी सॉफ्टवेयर कंपनी ‘जोहो’ के प्रोमोटर एवं पूर्व प्रमुख कार्यकारी अधिकारी श्रीधर वेम्बु ने अमरीका में रह रहे भारतीयों को एक खुला पत्र लिखकर देश वापस आकर भारत के भविष्य निर्माण हेतु सहायता की अपील कर देश और दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। उनकी इस अपील में मुख्य बात यह है कि भारत का विश्व में सम्मान भारत के प्रौद्योगिक विकास पर निर्भर करता है। पिछले लंबे समय से भारत ने दुनिया को अपनी प्रतिभा का निर्यात किया है, जिसे ब्रेनड्रेन कहा जाता है। उस समय भारत की वैश्विक स्तर की प्रौद्योगिकी के निर्माण में पिछड़ गया। लेकिन आज भारत के पास क्षमता है कि वो विश्वस्तरीय प्रौद्योगिकी के विकास पर आगे बढ़ सके। लेकिन उसे जल्द कर सकने के लिए पहली शर्त यह है कि शेष दुनिया में बसे भारतीय जो अवसरों के अभाव में देश छोड़ गए थे, वापस आएं। इससे पहले भी कई बार भारतीयों को वापस आने की अपील कई प्रमुख व्यक्ति समय-समय पर करते रहे हैं, लेकिन उस पर इतनी बहस कभी नहीं छिड़ी, जितनी श्रीधर वेम्बु के आह्वान के बाद छिड़ी है। उसका कारण यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारतीय मूल के लोगों को लेकर कई प्रकार के अशोभनीय वक्तव्य दे रहे हैं। पिछले काफी समय से वो लगातार कह रहे हैं कि विदेशियों के कारण अमरीकियों के लिए रोजगार के अवसर घट रहे हैं। उन्होंने बार-बार यह कहा है कि एच-1बी वीजा के प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए कंपनियां विदेशों से सस्ते श्रमिक लेकर आती हैं, जो अमरीकी कार्मिकों को रोजगार से बाहर कर देते हैं। इसलिए उन्होंने एच-1 बी वीजा के नियमों को कड़ा कर दिया है और विदेशी कार्मिकों की सख्ती से जांच-पड़ताल भी शुरू कर दी है।

गौरतलब है कि एच-1 बी वीजा के माध्यम से अधिकांश भारतीय अमरीका में सॉफ्टवेयर और अन्य प्रकार की प्रौद्योगिकी में कार्यरत हैं, इसके द्वारा अमरीकी और भारतीय कंपनियां भारतीयों को रोजगार प्रदान करती हैं। दिलचस्प बात यह है कि पूर्व में राष्ट्रपति ट्रंप भारतीयों लोगों और भारतीय नेतृत्व के प्रशंसक भी रहे हैं। पूर्व में वो यह कहते रहे कि भारत एक महान मित्र और रणनीतिक साझेदार है। हाउडी-मोदी जैसे कार्यक्रमों में उन्होंने भारतीय अमरीकी लोगों की भूरी-भूरी प्रशंसा भी की और कहा कि भारतीय अमरीकी अतुलनीय हैं और वे अमरीकी अर्थव्यवस्था में भारी योगदान भी दे रहे हैं। लेकिन हाल ही में उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर भारतीय लोगों और भारत के बारे में अपशब्द भी कहे हैं, जिसे भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा अज्ञानपूर्ण, अनुचित और भद्दे स्वाद का बताया गया है। राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान अमरीका में अमरीकी नागरिकता के जन्मसिद्ध अधिकार बारे में उनके वक्तव्य का एक हिस्सा था। हालांकि अमरीकी प्रशासन ने इस बयान के बाद कहा कि ट्रंप भारत को एक महान देश मानता है और इसके नेतृत्व को अपना अच्छा मित्र समझता है। इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत समेत अपने लगभग सभी व्यापार साझेदारों पर भारी टैरिफ लगाकार सभी देशों को नाराज करने का काम भी किया है, हालांकि अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय ने उनमें से अधिकांश टैरिफ को रद्द करने का निर्णय भी दिया है। श्रीधर वेम्बु की भारतीयों को वापस आकर अपने देश के प्रौद्योगिकी विकास में मदद करने की अपील आज के संदर्भ में दो कारणों से अधिक मायने रखती है, पहला, बदलते भू-राजनीतिक परिवेश में अमरीकी प्रशासन, विशेषतौर पर राष्ट्रपति ट्रंप के बयान और कार्यवाही, जिससे अमरीका में भारतीयों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। और दूसरा, भारत प्रौद्योगिकी की दृष्टि से प्रगति करने के लिए केवल तत्पर ही नहीं है, बल्कि उसकी संभावनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। एक समय था जब भारत प्रौद्योगिकी दृष्टि से काफी पीछे था, और हमारे श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों जैसे आईआईटी, मेडिकल और इंजनियरिंग कॉलेजों के ग्रेजुएट, प्रबंधन विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और पेशेवर भारत में प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते अपनी प्रतिभा के अनुरूप रोजगार नहीं पा सकते थे। ऐसे में हमारे श्रेष्ठ युवाओं ने विदेशों की ओर रुख कर लिया।

इन युवाओं ने उन देशों के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन भी किया। गौरतलब है कि अमरीका में सिर्फ 1.5 प्रतिशत भारतीय मूल के लोग हैं, जिनमें से दो तिहाई अप्रवासी हैं और एक तिहाई का जन्म वहां हुआ है। लेकिन खास बात यह है कि अपनी मेहनत, शिक्षा और सामथ्र्य के कारण वे औसत अमरीकी लोगों से कई गुणा ज्यादा कमाते हैं और अमरीका के राजस्व में उनका हिस्सा 6 प्रतिशत है। अमरीकी सरकार को भारतीय मूल के लोगों से 300 अरब डालर राजस्व की प्राप्ति होती है। भारतीय मूल के लोग विभिन्न समूहों की तुलना में उच्चतम आय प्राप्त करने वाला वर्ग है। भारतीयों की अमरीका के सबसे ज्यादा आमदनी वाले प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य और वित्त जैसे क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति है। उनकी शिक्षा और पेशेवर कुशलता बहुत अधिक है और यही नहीं उद्यमशीलता और व्यवसायों के स्वामित्व के नाते भी उनकी विशेष भूमिका है। कई बड़ी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भारतीय मूल के हैं। जितना पैसा भारतीय मूल के लोग टैक्सों में देते हैं, उससे कहीं कम वो सामाजिक सुरक्षा और अन्य प्रकार के सरकारी लाभ लेते हैं। लेकिन भारत में कुछ लोगों ने इस अपील को बहुत सकारात्मक रूप से नहीं लिया है, और वे श्रीधर वेंबू की आलोचना कर रहे हैं। लेकिन साथ ही कई लोग उनका समर्थन भी कर रहे हैं। यह जाहिर है कि भारतीय मूल के जो लोग वहां एक या उससे ज्यादा पीढिय़ों से रह रहे हैं, उनके लिए अपना सामान समेटकर भारत वापस लौटना आसान नहीं है- भले ही वे भारत से प्यार करते हों और भारत की विकास गाथा में विश्वास रखते हों। ऐसे बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि पर्यावरण, बुनियादी ढांचा, जीवन स्तर, नौकरी और व्यवसाय के अवसर भारत की तुलना में अमरीका में कहीं बेहतर हैं। कुछ लोग तो जान-बूझकर अपने बच्चों की शिक्षा के उद्देश्य से अमरीका चले गए हैं।

इसलिए श्रीधर वेम्बु की अपील का अमरीका में ही रुके रहने के उनके फैसले पर बहुत ही सीमित असर पड़ सकता है। लेकिन, ऐसे भी बहुत से लोग हैं जिन्होंने बेहतर शिक्षा और उसके बाद एक अच्छी नौकरी के लिए भारत छोड़ा था, लेकिन अब उन्हें अमरीकी प्रशासन से बुरा बर्ताव मिल रहा है- खासकर वीजा से जुड़ी अनिश्चितता, मनाही तथा अन्य पाबंदियों के मामले में। ऐसे बहुत से लोग हैं जो भारत में अवसर देखते हैं- वहां के फलते-फूलते स्टार्टअप और व्यावसायिक अवसरों के कारण, और भारत की नवाचार, तकनीकी विकास और तेजी से बेहतर होते बुनियादी ढांचे की दिशा में हो रही प्रगति के कारण। ऐसे भी बहुत से लोग हैं जिनके मन में अपनी मातृभूमि के प्रति देशभक्ति की भावना है और उन्होंने इस बारे में सोचना शुरू कर दिया है, और वे वास्तव में भारत वापस लौट भी रहे हैं। ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो भारत के साथ अपने मजबूत रिश्ते बनाए हुए हैं- वे तकनीक के विकास में मदद कर रहे हैं, व्यवसायों और स्टार्टअप में निवेश कर रहे हैं, और भारत के साथ अपने करीबी संबंध बनाए हुए हैं। ऐसा लगता है कि यह सब रातों-रात तो नहीं होगा, लेकिन देर-सवेर, भारतीय मूल के लोग- जिनमें ग्रीन कार्ड और अमरीकी पासपोर्ट धारक, तथा भारतीय पासपोर्ट वाले एनआरई भी शामिल हैं- भारत की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इसके पीछे देशभक्ति की भावना, बेहतर विकास के अवसर, अच्छा बुनियादी ढांचा, जीवन की सुगमता आदि कारण हो सकते हैं। लेकिन, हमें यह समझना होगा कि यह समय ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) के बजाय ‘ब्रेन गेन’ (प्रतिभा लाभ) के लिए एक बहुत ही उपयुक्त अवसर है।

डा. अश्वनी महाजन

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