तकनीकी

अदृश्य चेहरे

मुझे जानकारी नहीं कि अर्थशास्त्री एडम स्मिथ द्वारा दिए गए ‘अदृश्य हाथ या इनविजि़वल हैंड्स’ के सिद्धांत के पहले या बाद किसी अनुसंधानी ने ‘अदृश्य चेहरे या इनविजि़वल फेस’ की थ्योरी गढ़ी है या नहीं। हां, जॉर्जिया तकनीकी संस्थान ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है जो लोगों की व्यक्तिगत तस्वीरों के लिए अदृश्य डिजिटल मास्क बनाता है ताकि अवांछित ऑनलाइन चेहरे की पहचान को रोका जा सके। इससे पहले केवल पढ़ा या सुना ही था कि गिरगिट ख़तरों से अपनी रक्षा के लिए रंग बदलता है। अब उसी तजऱ् पर एक नई एआई-संचालित तकनीक लोगों की तस्वीरों को ऑनलाइन गोपनीयता के ख़तरों से बचा रही है। इस नए मॉडल का नाम कैमेलियन रखा गया है। लेकिन फिक्र नॉट, हमारे देश के महान नाला वैज्ञानिक भी पिछले तीन दशकों से चेहरे से सम्बन्धित कई प्रयोग कर रहे हैं। हालांकि उन्हें किसी से ख़तरा नहीं। पर हाल ही में उन्होंने चुनावों के दौरान दक्षिण में चुनावी सभा के लिए गिरगिट की तरह अपना रंग बदला। पर उनकी देखा-देखी देश में इन दिनों एक अजीब फैशन चल पड़ा है। लोग घरों से निकलने पर अपने असली चेहरे घरों में छोडक़र ही निकलते हैं। हर नुक्कड़, हर गली, हर कार्यालय, हर मंच पर आपको बिना असली चेहरों के घूमते हुए लोग मिल जाएंगे। लोगों के असली चेहरे अदृश्य हो चुके हैं। जो दिखते हैं, वे केवल ‘पब्लिक वजऱ्न’ है, सुन्दर, चमकदार, सुसंस्कृत, और मौके के हिसाब से रंग बदलने वाले। झुन्नू लाल जी इसी तरह चेहरे बदलने में इतने माहिर हैं कि सुबह-सुबह जब मंदिर जाते हैं तो माथे पर तिलक, कलाई में कलावा, हाथ में माला, और होंठों पर मधुर मुस्कान बिखरी रहती है। उन्हें देखकर भगवान पता नहीं क्या सोचते होंगे, पर जैसे ही मंदिर की सीढिय़ां उतरते हैं, मोबाइल पर पहला कॉल लगाते हुए मुख्य अभियंता को धमकाते हैं, ‘अरे! आपने वो टेंडर किसी और को कैसे दे दिया?

देख लेना, अब बात ऊपर तक पहुंचेगी।’ उन्हें ऊपर वालों पर इतना भरोसा है कि उन्हें कभी उनके असली चेहरे देखने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। बस नारंगी और हरे नोटों पर गांधी जी का असली चेहरा देखते ही सारे काम मोबाइल पर हो जाते हैं। लेकिन अब भगवान उनके जैसे भक्तों के पाखंड से इतने आजिज़ आ गए हैं कि उन्होंने अपने भक्तों के बारे में सोचना ही छोड़ दिया है। शायद इसलिए बुद्ध कहते हैं कि ओढ़ा चेहरा छोड़ते ही व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त हो जाता है। अब लोग स्वयं ही अपने वास्तविक चेहरों को तिलांजलि देते हुए मौके के हिसाब से अपना रंग और चेहरा बदलने में इतने माहिर हो चुके हैं कि वे आईने में अपना असली चेहरा देखकर डर जाते हैं। आधुनिक युग में हर रोज़ मनोरोगियों की संख्या बढऩे के बावजूद वे इसे न्यू नार्मल मानते हैं। इसलिए राजनीति, विशेषकर भारतीय राजनीति में वही लोग सफल रहते हैं जो दिन में कम से कम दस बार अपना चेहरा या कपड़े बदलते हैं। हां, वैश्विक परिदृश्य पर भले ऐसे लोगों की कोई क़द्र न हो, पर अपने देश में ये महामानव से कम नहीं समझे जाते। मिसाल के लिए अमरीका के ताऊ ट्रंप, इजऱायल के बीबी चाचू और भारत के अवतारी फकीर इसी श्रेणी में आते हैं। राजनीति में अदृश्य चेहरे एक तरह से बाबा रामदेव के कारपोरेट ‘योग’ का अनिवार्य अंग बन चुके हैं। नेता जी मंच पर खड़े होकर कहते हैं, ‘हम जनता के सेवक हैं।’ भीड़ तालियां पीटती है, और नेता जी का चेहरा दमक उठता है। जैसे ही कैमरा और माइक हटता है, वह चेहरा कहीं गायब हो जाता है। अब केवल चुनावी गणित, समीकरण और अगला चुनाव दिखता है। इसलिए जनता अब चेहरा नहीं, पोस्टर पहचानती है। लोग इतने समझदार हो चुके हैं, जो चेहरा लगा कर वे हर रोज़ मज़दूरी करने जाते हैं, रैली ख़त्म होते ही उसे ओढ़ लेते हैं। इस अदला-बदली में लोगों के पास इतने चेहरे हो चुके हैं कि अगर कभी गलती से अंतर आत्मा के पुकारने पर जब उन्हें ढ़ूंढऩे पर भी जब अपना असली चेहरा नहीं मिलता तो कातर स्वर में पुकार उठते हैं, ‘तुम ढूंढ़े रे गोपाल मैं खोई गैया तेरी।’

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