जरा हट के

… तेलंगाना के इस पत्थर के सामने नहीं बोला जाता झूठ, आज भी यहीं सुलझते हैं झगड़े

हैदराबाद. आज के हाईटेक और डिजिटल दौर में जहां दुनिया जीपीएस, सैटेलाइट नक्शों और अदालती कानूनों से चल रही है, वहीं तेलंगाना के ग्रामीण अंचलों में सामाजिक ताने-बाने को जोड़े रखने और न्याय देने का केंद्र आज भी एक पत्थर है. इसे स्थानीय लोग बोड्डू राय या बोड्रई कहते हैं. तेलुगु भाषा में बोड्डू का मतलब नाभि और राय का मतलब पत्थर होता है. गाँव के ठीक बीचों-बीच या मुख्य रास्ते पर स्थापित यह गोल पत्थर महज़ कोई कलाकृति नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए गाँव का असली रखवाला और सर्वोच्च मार्गदर्शक है. सदियों पुरानी यह लोक-मान्यता आज भी तेलंगाना के गाँवों में पूरी श्रद्धा के साथ जिंदा है. इतिहास के जानकार बताते हैं कि प्राचीन समय में जब भी नए गाँवों की स्थापना होती थी, तब इसी नाभि-पत्थर को केंद्र बिंदु मानकर गाँव की चारों दिशाओं की सीमाओं का निर्धारण किया जाता था.

दिलचस्प बात यह है कि आज भी किसी बड़े सामाजिक विवाद या आपसी लड़ाई को सुलझाने के लिए गाँव के बुजुर्ग इसी पत्थर के पास चौपाल लगाते हैं. ग्रामीणों का अटूट विश्वास है कि इस पवित्र स्थान पर खड़ा होकर कोई भी व्यक्ति झूठ बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता, जिससे यहाँ होने वाले फैसले सबको मान्य होते हैं. आधुनिक अदालतों और पुलिस थानों के चक्कर लगाने के बजाय ग्रामीण आज भी अपनी पारंपरिक न्याय व्यवस्था पर भरोसा करते हैं. यह पत्थर सदियों से बिना किसी भेदभाव के गाँव में शांति और सौहार्द बनाए रखने का माध्यम बना हुआ है, जिसके सामने अमीर और गरीब सभी सिर झुकाते हैं.

धार्मिक अनुष्ठान, त्योहार और बोड्रई प्रतिष्ठा उत्सव
गाँव में कोई भी छोटा-बड़ा त्योहार हो, जैसे बतुकम्मा या बोनालु, उसकी पहली पूजा इसी बोड्डू राय पर होती है. घर में शादी हो या बच्चे का जन्म, लोग यहाँ माथा टेकना नहीं भूलते. सालों या दशकों में एक बार जब नई बोड्डू राय की स्थापना या उसका कायाकल्प किया जाता है, तो उसे बोड्रई प्रतिष्ठा कहा जाता है. इस 3 से 5 दिनों के भव्य उत्सव के दौरान पूरा गाँव एक रंग में रंग जाता है. शहरों या विदेशों में बस चुके लोग भी इस दौरान अपनी जड़ों की ओर लौटते हैं. यह उत्सव ग्रामीणों को आपसी भेदभाव भुलाकर एकजुट होने का संदेश देता है.

Advertiसांस्कृतिक धरोहर और आधुनिकता के बीच समन्वय
यह अनोखी परंपरा साबित करती है कि आधुनिकता चाहे जितनी बढ़ जाए, लेकिन अपनी संस्कृति और लोक-मान्यताओं से जुड़ाव ही समाज को असली मजबूती देता है. यह पत्थर सिर्फ गाँव की सीमा नहीं तय करता, बल्कि लोगों के दिलों को भी आपस में जोड़कर रखता है. आज के बदलते परिवेश में भी तेलंगाना के युवाओं का इस पारंपरिक नाभि-पत्थर के प्रति आदर यह दर्शाता है कि लोक-संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं. डिजिटल युग में भी यह प्राचीन पत्थर सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश कर रहा है.

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