जंतर-मंतर आंदोलन कई खतरनाक सवाल भी खड़े करता है!

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से आशा है कि अब हालात में सुधार होगा। दिल्ली में जो हुआ, उसमें बहुत से ऐसे छात्र भी थे, जिनको वास्तविक और सच्ची शिकायतें थीं। वे ईमानदारी से यह सोच कर आए, कई अपने पिता और माता के साथ भी पहुंचे, कि यह वास्तविक छात्र आंदोलन है। उनका दुख और वेदना एक पिता ही समझ सकता है। वे बच्चे अपनी जी-जान लगाकर मेहनत करते हैं, लेकिन विद्यालयों में शिक्षा होती नहीं, अध्यापक कोचिंग क्लासेज के संचालन में रुचि लेते हैं। वहां हजारों रुपए फीस देकर अलग से पढऩा पड़ता है और फिर पेपर लीक होने की लगातार घटनाओं से, जो अनेक प्रांतों में हो रही हैं, बच्चे की मेहनत पर पानी फिर जाता है। वे किसके पास जाएं? उनके माता-पिता और बच्चे किसी नेता या अफसर के पास नहीं जा सकते।
उनके चारों ओर का वातावरण ऐसा है कि हर नेता चाहे वह किसी भी पार्टी का हो, केवल एक पहचान से जाना जाता है-अहंकार, पद और पैसे का असीम ऐश्वर्य, जो न कभी मिलते हैं, न फोन उठाते हैं, न उनके सचिव, उप-सचिव ढंग से बात करते हैं और उनके साथ देशी-विदेशी गाडिय़ों का काफिला, मल्टीप्लैक्स-अपार्टमैंट्स की संपदा जुड़ी रहती है। किसी अध्यापक, दुकानदार, सामान्य नौकरी या व्यवसाय करने वाले की उन तक पहुंच का सवाल ही नहीं उठता।
उस पर अच्छे अंक लाने पर भी आरक्षण का भेदभाव बच्चे का मनोबल तोड़ देता है । वह देखता है कि उससे आधे से भी कम अंक लाने वाला उससे बेहतर कालेज और उसके बाद उससे बेहतर नौकरी पा लेता है। कालेज ही नहीं, जाति का आरक्षण ही नहीं, बल्कि प्रदेश का निवासी होने का आरक्षण भी एक प्रांत से दूसरे प्रांत के बीच भेदभाव बढ़ाता है। फिर वह अपनी आंखों से देखता है कि हर मंत्री, सांसद, विधायक के बच्चे विदेश पढऩे गए हैं। आई.ए.एस., आई.पी.एस. अफसरों के बच्चों का भी यही शौक है। सवाल उठता है कि जो आरक्षण का भी हकदार नहीं है और जो विदेश भी नहीं जा सकता, उसका क्या होगा?
माता-पिता जमीन-जायदाद गिरवी रखकर, बेचकर अपने सुख कम करके बच्चे के भविष्य के लिए सब कुछ करने को तैयार रहते हैं। सब जानते हैं कि आजकल नगर-नगर में युवाओं का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन चल रहा है। न्यूजीलैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, यूक्रेन, कजाखस्तान, चीन, यहां तक कि ईरान में भी हजारों की संख्या में भारतीय छात्र पढऩे जाते हैं। क्या किसी अधिकारी या नेता ने बाकी सब काम छोड़कर इस विषय पर सोचा कि ऐसा क्यों होता है और छात्रों तथा उनके अभिभावकों को इस भयंकर तनाव तथा संत्रास से मुक्त करने का मार्ग क्या हो सकता है? जब तक वे धरना, प्रदर्शन, अनशन न करें, उनमें से अनेक तो हर सीमा तोड़कर भी बढ़ जाते हैं, तब तक न कोई समाधान की बात करता है न बात करने आता है। यही सबसे बड़ा दुख है। 22 बच्चों ने आत्महत्या कर ली। कोई उनके माता-पिता से पूछने गया? 15-18-20 साल का बच्चा जब अपनी जान लेना तय करता है तो धरती फट जानी चाहिए। पर उस शहर के अफसर, नेता, विधायक, सांसद, मंत्री किसी को इस बात की वेदना नहीं होती कि ऐसा क्यों हुआ और यदि हुआ तो उसके समाधान के लिए वह मिथ्या चाटुकारिता छोड़कर आवाज उठाए, जहां तक उसकी ऊपर आवाज जा सके वहां तक जाए। पर वे बच्चे पर ही दोष मढ़ते रहे, उन्हें व्यवस्था में कोई दोष नहीं दिखा।
बालीवुड से लेकर दक्षिण की सब फिल्मों में पुलिस का जो चित्रण होता है, वह सरकार का सैंसर बोर्ड ही पास करता है । उनमें पुलिस को बर्बर, निर्दयी, धनवानों और नेताओं की दलाल दिखाया जाता है। सरकार ही पुलिस की ऐसी छवि बनने की अनुमति देती है, फिर अपेक्षा करती है कि पुलिस की बर्बरता का शिकार होने वाले बच्चे पुलिस के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो जाएं। यह सच है कि जम्मू-कश्मीर और पंजाब पुलिस ने आतंकवादियों के खिलाफ बहुत कठिन युद्ध जान हथेली पर रखकर लड़ा। उसका सम्मान होना चाहिए, पर न तो हम पुलिस सुधार करना चाहते हैं और न ही अफसरशाही और न्यायपालिका में परिवर्तन लाते हैं। संत्रस्त नागरिक निराश और कुंठित होकर क्रुद्ध ही तो हो सकता है। छोटे बच्चों-बच्चियों में इतना ज्यादा क्रोध क्यों आया, इसका कारण समझना कठिन नहीं।
जिन लोगों ने जंतर-मंतर आंदोलन के समाचार नजदीक से देखे हैं, उनके सामने अनेक खतरनाक सवाल भी खड़े हुए हैं। जिस प्रकार स्कूल-कालेज जाने वाली बच्चियों ने अपशब्द और अश्लील शब्द बोले, पढ़ी-लिखी महिलाओं ने वीडियो पर कहा कि अगर तुमको पुलिस वाला दिखे तो उसको थप्पड़ मारो, उसकी वर्दी फाड़ दो, जमाते इस्लामी और अनेक जिहादी संगठनों द्वारा वहां भोजन परोसा गया, विदेशों से हजारों थाली भोजन के आर्डर आए, जिस तरह से निहंगों ने पंजाब में एक पंजाबी महिला को घेर कर उस पर हमला किया था, परंतु उसकी जिन्होंने कभी ङ्क्षनदा या विरोध नहीं किया, वैसे लोग जंतर-मंतर पर गाडिय़ों के ऊपर तलवार भांजते हुए सरकार और पुलिस के खिलाफ नारे लगा रहे थे, हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान कर रहे थे, प्रधानमंत्री को अपशब्द बोल रहे थे एवे नीट परीक्षा से त्रस्त छात्र नहीं थे। यह गहरी जांच का विषय है। ये बातें अभिभावकों द्वारा बच्चों के पालन-पोषण पर भी सवाल खड़ा करती हैं।
एक ओर जम्मू-कश्मीर में हवलदार अशफाक हुसैन भारत माता की रक्षा करते हुए शहीद हो जाता है, दूसरी तरफ शिक्षा पद्धति से सच्चाई में त्रस्त छात्रों के साथ अनेक प्रकार के तत्व मिलकर एक नया नैरेटिव बना देते हैं। अगर यह स्थिति भी हमें कठोर आत्मनिरीक्षण तथा व्यवहार और आचरण में परिवर्तन की ओर न ले जाए, तो इस देश की रक्षा करना कठिन होगा।-तरुण विजय



