निष्पक्ष आलोचना ठीक है, लेकिन जजों पर बेबुनियाद आरोप नहीं लगाने चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक वकील के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही में दखल देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि जजों पर लगाए गए लापरवाह और बेबुनियाद आरोप न्यायिक स्वतंत्रता की नींव पर ही चोट करते हैं, जिसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।
इस वकील ने बॉम्बे हाई कोर्ट के एक मौजूदा जज पर कई आरोप लगाए थे, जिनमें यह आरोप भी शामिल था कि वह किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हुए हैं। वकील की दलील को खारिज करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि इस तरह के आरोप अगर बिना रोक-टोक के चलते रहें तो उनमें न्याय व्यवस्था पर लोगों के भरोसे को कम करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।’जजों के खिलाफ आरोप पुख्ता सबूतों पर आधारित होने चाहिए’
बेंच ने कहा, “हालांकि जवाबदेही और जांच-पड़ताल एक संवैधानिक लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं, लेकिन किसी जज के खिलाफ निजी प्रकृति के आरोप पुख्ता सबूतों पर आधारित होने चाहिए और उन पर पूरी तरह से कानून के मुताबिक ही कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा न होने पर वे न्यायिक स्वतंत्रता की पूरी बुनियाद को ही कमजोर करने का जोखिम पैदा करते हैं।”
पीठ ने कहा कि न्यायिक फैसलों की निष्पक्ष, तर्कसंगत और नेकनीयत आलोचना करने में कुछ भी गलत नहीं है और यह लोकतांत्रिक चर्चा का एक वैध पहलू है। साथ ही किसी भी मुकदमेबाज को निस्संदेह यह अधिकार है कि वह किसी उच्चतर मंच के समक्ष इन फैसलों की सत्यता पर सवाल उठा सके।
‘प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाना हल्की बात नहीं’
हालांकि, पीठ ने यह भी कहा गया कि ऐसी चुनौती की वैधता, न्यायिक निर्णय की सभ्य और संयमित आलोचना पर निर्भर करती है न कि न्यायाधीश की ईमानदारी या निष्पक्षता पर लगाए गए परोक्ष आरोपों पर।
कोर्ट ने कहा, “एक न्यायिक फैसले के सही होने पर सवाल उठाने और संबंधित जज पर निजी आरोप लगाकर अपनी शिकायत को निजी बनाने के बीच एक साफ फर्क बनाए रखना जरूरी है।” कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी वकील का प्रेस कॉन्फ्रेंस करके और सार्वजनिक रूप से एक मौजूदा जज पर आरोप लगाना, कोई हल्की बात नहीं मानी जा सकती।



